Jahangir and Nur Jahan: The Love, Power and Intrigue Behind the Mughal Throne


भारत में मुगल शासन
जहाँगीर — कला, प्रेम, न्याय और सत्ता के बीच एक मुगल सम्राट की कहानी
“अकबर ने जिस विशाल साम्राज्य को अपनी शक्ति और दूरदर्शिता से खड़ा किया था, उसके सिंहासन पर अब उसका पुत्र बैठने वाला था—एक ऐसा शासक जिसे इतिहास ने ‘जहाँगीर’ के नाम से याद किया।”

मुगल साम्राज्य के इतिहास में नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का शासनकाल एक अलग ही रंग लिए हुए है। उसके पिता अकबर महान एक महान विजेता, प्रशासक और साम्राज्य निर्माता थे। जहाँगीर ने अपने पिता की तरह विशाल साम्राज्य का निर्माण नहीं किया, लेकिन उसके शासनकाल में मुगल कला, चित्रकला, प्राकृतिक अध्ययन, साहित्य और दरबारी संस्कृति ने असाधारण विकास किया। जहाँगीर का जीवन केवल सिंहासन और युद्धों की कहानी नहीं है।

यह एक ऐसे राजकुमार की कहानी है जिसने अपने पिता के विरुद्ध विद्रोह किया, सत्ता के लिए संघर्ष किया, प्रेम किया, नशे और विलासिता की आलोचनाओं का सामना किया, कला को संरक्षण दिया और अंततः नूरजहाँ जैसी प्रभावशाली महिला के साथ मिलकर मुगल दरबार की राजनीति को एक नया रूप दिया।



जहाँगीर कौन था?
नूरुद्दीन मुहम्मद सलीम, जिसे इतिहास में जहाँगीर के नाम से जाना जाता है, मुगल सम्राट अकबर का पुत्र था।
उसका जन्म 31 अगस्त 1569 को फतेहपुर सीकरी में हुआ था।
उसकी माता मरियम-उज़-ज़मानी थीं, जो आमेर के राजपूत शासक राजा भारमल के परिवार से थीं।
जहाँगीर का जन्म अकबर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण घटना था क्योंकि लंबे समय तक अकबर को पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था।
इसी संदर्भ में सूफी संत शेख सलीम चिश्ती से जुड़ी प्रसिद्ध परंपरा सामने आती है।


शेख सलीम चिश्ती और राजकुमार सलीम
अकबर का फतेहपुर सीकरी के सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के प्रति गहरा सम्मान था।
लोकप्रिय परंपरा के अनुसार, अकबर ने संतान प्राप्ति के लिए उनकी आध्यात्मिक कृपा की कामना की थी।
इसके कुछ समय बाद अकबर के घर पुत्र का जन्म हुआ।

अकबर ने उसका नाम सलीम रखा, जो शेख सलीम चिश्ती से जुड़ा हुआ था।
इसी कारण राजकुमार सलीम के जन्म की कहानी मुगल इतिहास और फतेहपुर सीकरी की परंपरा में विशेष स्थान रखती है।
हालाँकि इतिहासकार इस घटना के अलग-अलग पहलुओं को अलग-अलग स्रोतों के आधार पर देखते हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि शेख सलीम चिश्ती का अकबर और फतेहपुर सीकरी के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान था।


राजकुमार सलीम का बचपन
सलीम का पालन-पोषण एक शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के राजकुमार के रूप में हुआ।
अकबर ने उसे सैन्य और प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ देना शुरू किया।
लेकिन जैसे-जैसे सलीम बड़ा हुआ, उसके और उसके पिता के बीच संबंधों में तनाव पैदा होने लगा।
सलीम को लगता था कि उसे शासन में पर्याप्त स्वतंत्रता नहीं मिल रही है।
दूसरी ओर, अकबर अपने साम्राज्य की स्थिरता को लेकर चिंतित था।
धीरे-धीरे पिता और पुत्र के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ती गई।


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अकबर और सलीम के बीच संघर्ष
सलीम ने अपने पिता के जीवनकाल में ही स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति स्थापित करने की कोशिश की। 1599 के आसपास उसने अकबर के विरुद्ध विद्रोह किया और इलाहाबाद को अपना राजनीतिक केंद्र बनाया। उसने स्वतंत्र रूप से दरबार चलाने और सिक्के जारी करने जैसी गतिविधियाँ भी कीं।

यह अकबर के लिए गंभीर चुनौती थी। लेकिन अकबर ने अंततः अपने पुत्र को क्षमा कर दिया। यह संबंध पूरी तरह कभी सामान्य नहीं हुआ, लेकिन सलीम अंततः अकबर का उत्तराधिकारी बना।



1605 — जहाँगीर का राज्यारोहण
27 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु हुई।
इसके बाद सलीम मुगल सिंहासन पर बैठा।
उसने नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह ग़ाज़ी की उपाधि धारण की।
“जहाँगीर” का अर्थ सामान्यतः “दुनिया को जीतने वाला” माना जाता है। इस प्रकार मुगल साम्राज्य का चौथा सम्राट अब सत्ता में आ चुका था। उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—

अकबर द्वारा बनाए गए विशाल साम्राज्य को स्थिर बनाए रखना।


जहाँगीर की न्याय की जंजीर
जहाँगीर के शासन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कहानियों में से एक है—
“न्याय की जंजीर”

कहा जाता है कि जहाँगीर ने आगरा किले के बाहर एक स्वर्ण जंजीर लगवाई थी, जिससे कोई भी व्यक्ति सीधे सम्राट तक अपनी शिकायत पहुँचा सके। इस जंजीर को लोकप्रिय रूप से “जंजीर-ए-अद्ल”, अर्थात न्याय की जंजीर कहा जाता है।

इस कहानी ने जहाँगीर की छवि एक न्यायप्रिय शासक के रूप में मजबूत की। हालाँकि इतिहासकार इस व्यवस्था के वास्तविक उपयोग और विवरण को स्रोतों की रोशनी में सावधानी से देखते हैं, लेकिन यह कथा जहाँगीर की राजकीय छवि का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।


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जहाँगीर और नूरजहाँ — मुगल इतिहास की सबसे प्रसिद्ध जोड़ी
जहाँगीर के शासन की चर्चा नूरजहाँ के बिना अधूरी है।
नूरजहाँ का वास्तविक नाम मेहर-उन-निसा था।
वह एक प्रभावशाली, बुद्धिमान और राजनीतिक रूप से सक्षम महिला थीं।

जहाँगीर ने 1611 में उनसे विवाह किया।
विवाह के बाद नूरजहाँ का प्रभाव मुगल दरबार में तेजी से बढ़ा।
वह केवल सम्राट की पत्नी नहीं थीं।
उन्होंने राजनीति, प्रशासन, दरबारी नियुक्तियों और शाही निर्णयों में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।


नूरजहाँ का राजनीतिक प्रभाव
जहाँगीर के शासन के बाद के वर्षों में नूरजहाँ का प्रभाव इतना बढ़ गया कि इतिहास में एक शक्तिशाली “नूरजहाँ गुट” का उल्लेख मिलता है। उनके परिवार के कई सदस्य दरबार में प्रभावशाली पदों पर पहुँचे।

उनके पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग, जिन्हें इतिमाद-उद-दौला की उपाधि मिली, मुगल प्रशासन के महत्वपूर्ण अधिकारी बने।
उनके भाई आसफ़ ख़ाँ भी अत्यंत प्रभावशाली व्यक्ति बने।
नूरजहाँ की बेटी लाडली बेगम भी शाही परिवार की राजनीति से जुड़ी थीं।
इस प्रकार नूरजहाँ का परिवार मुगल दरबार की सत्ता संरचना में महत्वपूर्ण बन गया।



नूरजहाँ — केवल महारानी नहीं, एक प्रभावशाली व्यक्तित्व
नूरजहाँ की भूमिका केवल राजमहल तक सीमित नहीं थी। उनका प्रभाव कई क्षेत्रों में दिखाई देता है—

* राजनीतिक निर्णय
* दरबारी नियुक्तियाँ
* कला और स्थापत्य
* वस्त्र और फैशन
* शाही मुहर
* सिक्कों की परंपरा
* दान और परोपकार
कुछ सिक्कों पर नूरजहाँ का नाम या उससे जुड़ी अभिव्यक्तियाँ भी मिलती हैं, जो उनकी असाधारण राजनीतिक स्थिति का संकेत देती हैं। मुगल इतिहास में इतनी प्रभावशाली महिला शासकीय व्यक्तित्वों में नूरजहाँ का स्थान विशेष है।


जहाँगीर और कला
यदि अकबर को एक महान साम्राज्य निर्माता कहा जाए, तो जहाँगीर को कला और चित्रकला का महान संरक्षक कहना उचित होगा। जहाँगीर को चित्रों में विशेष रुचि थी।

उसके शासनकाल में मुगल चित्रकला ने अत्यंत सूक्ष्म और प्राकृतिक शैली विकसित की। चित्रकार केवल राजा और दरबार के दृश्य नहीं बनाते थे, बल्कि—

* पक्षी
* पशु
* फूल
* पेड़-पौधे
* प्राकृतिक दृश्य
* दुर्लभ जीव
* व्यक्तियों के वास्तविक चेहरे
तक का बारीकी से चित्रण करते थे।


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उस्ताद मंसूर — प्रकृति को चित्रों में जीवंत करने वाला कलाकार
जहाँगीर के दरबार के सबसे प्रसिद्ध चित्रकारों में उस्ताद मंसूर का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। वह पक्षियों और जानवरों के अत्यंत सूक्ष्म चित्र बनाने के लिए प्रसिद्ध था। जहाँगीर स्वयं प्राकृतिक दुनिया के प्रति अत्यंत जिज्ञासु था।

वह दुर्लभ पशु-पक्षियों को देखता और उनके चित्र बनवाता था। इस कारण उसके शासनकाल की चित्रकला केवल कला नहीं रही, बल्कि प्राकृतिक इतिहास के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी बन गई।



जहाँगीर — प्रकृति का प्रेमी
जहाँगीर को प्रकृति से विशेष लगाव था।
उसने अपने संस्मरण “तुज़ुक-ए-जहाँगीरी” में प्रकृति, जानवरों, पौधों, यात्राओं और घटनाओं का उल्लेख किया है। वह किसी दुर्लभ पशु या पक्षी को देखकर उसके बारे में जानकारी दर्ज करवाता था।

उसके लेखन से पता चलता है कि वह प्राकृतिक दुनिया को केवल मनोरंजन की वस्तु के रूप में नहीं देखता था, बल्कि उसे समझने की जिज्ञासा भी रखता था। यही कारण है कि जहाँगीर को मध्यकालीन भारतीय इतिहास के उन शासकों में गिना जाता है जिनकी प्राकृतिक इतिहास में विशेष रुचि थी।



जहाँगीर और साहित्य
जहाँगीर स्वयं भी साहित्यिक रुचि रखता था।
उसकी आत्मकथा तुज़ुक-ए-जहाँगीरी मुगल इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।
इसमें उसके शासनकाल की राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ उसके निजी विचार, यात्राएँ, प्रकृति, दरबार और विभिन्न अनुभवों का वर्णन मिलता है। इससे हमें जहाँगीर के व्यक्तित्व को समझने में महत्वपूर्ण सहायता मिलती है।


मेवाड़ और मुगल साम्राज्य
अकबर के शासनकाल में मेवाड़ के साथ संघर्ष लंबे समय तक चला था। जहाँगीर के शासनकाल में इस संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली।

1615 में महाराणा अमर सिंह ने जहाँगीर के साथ समझौता स्वीकार किया। इस समझौते के बाद मेवाड़ और मुगल साम्राज्य के बीच लंबे संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हुआ। यह जहाँगीर की राजनीतिक उपलब्धियों में शामिल किया जाता है।


दक्कन की समस्या
जहाँगीर के शासनकाल में दक्कन भी मुगल राजनीति का महत्वपूर्ण क्षेत्र बना रहा। अहमदनगर और अन्य दक्कनी शक्तियों के साथ संघर्ष जारी रहा।

इसी दौर में मलिक अंबर एक अत्यंत प्रभावशाली दक्कनी नेता के रूप में सामने आए।

उन्होंने मुगलों के खिलाफ गुरिल्ला रणनीतियों का प्रभावी उपयोग किया और मुगल विस्तार के सामने कठिन चुनौती खड़ी की। जहाँगीर के शासनकाल में दक्कन पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं हो सका।


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जहाँगीर और अंग्रेज़ व्यापारी
जहाँगीर के शासनकाल में यूरोपीय व्यापारियों के साथ मुगल संपर्क बढ़ा। विशेष रूप से अंग्रेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने की कोशिश कर रही थी।

सर थॉमस रो इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में जहाँगीर के दरबार में आए और लगभग 1615 से 1619 तक भारत में रहे। उनका उद्देश्य मुगल साम्राज्य से अंग्रेज़ व्यापारियों के लिए सुविधाएँ प्राप्त करना था। जहाँगीर के समय अंग्रेज़ों को भारत में स्थायी राजनीतिक सत्ता नहीं मिली थी; उनका मुख्य उद्देश्य व्यापारिक संबंध स्थापित करना था। हालाँकि आने वाली शताब्दियों के इतिहास को देखते हुए यह संपर्क अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।



जहाँगीर और पुर्तगाली
जहाँगीर के समय भारत में पुर्तगाली भी महत्वपूर्ण समुद्री शक्ति थे।
मुगलों और पुर्तगालियों के बीच व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ संघर्ष भी हुआ।
पुर्तगाली समुद्री व्यापार पर अपना प्रभुत्व बनाए रखना चाहते थे, जबकि मुगल साम्राज्य अपने व्यापारिक हितों की रक्षा करना चाहता था। यह दौर भारत में यूरोपीय शक्तियों के बढ़ते संपर्क की शुरुआत के महत्वपूर्ण चरणों में से एक था।



जहाँगीर की प्रशासनिक व्यवस्था
जहाँगीर ने अपने पिता अकबर की अधिकांश प्रशासनिक व्यवस्थाओं को जारी रखा। उसने—

* मनसबदारी व्यवस्था
* सूबेदारी व्यवस्था
* राजस्व प्रणाली
* केंद्रीय प्रशासन
* सैन्य व्यवस्था
जैसी अकबर की संस्थाओं को बनाए रखा। यह उसकी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक समझ थी। उसने अकबर द्वारा बनाई गई व्यवस्था को पूरी तरह बदलने के बजाय उसे आगे बढ़ाया।


जहाँगीर की मुद्राएँ
जहाँगीर को सिक्कों में भी विशेष रुचि थी।
उसके शासनकाल के सिक्कों में कई प्रकार की कलात्मक और प्रयोगात्मक विशेषताएँ दिखाई देती हैं। उसने कुछ सिक्कों पर अपने नाम, उपाधियों और विशेष अभिव्यक्तियों का प्रयोग कराया।

कुछ प्रसिद्ध राशिचक्र (Zodiac) सिक्के भी उसके शासनकाल से जुड़े हैं। इन पर विभिन्न राशियों के प्रतीक बनाए गए थे। यह मुगल सिक्का-कला के इतिहास में एक असाधारण प्रयोग था। बाद में धार्मिक कारणों और शाही नीति में बदलाव के चलते इन सिक्कों को जारी रखने की अनुमति नहीं रही।


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जहाँगीर का व्यक्तित्व
जहाँगीर का व्यक्तित्व अत्यंत जटिल था। एक ओर वह—

कला प्रेमी, प्रकृति प्रेमी और साहित्यिक रुचि वाला सम्राट था। दूसरी ओर उसके शासन में—

दरबारी षड्यंत्र, उत्तराधिकार संघर्ष, विद्रोह और राजनीतिक तनाव भी मौजूद रहे। उसकी शराब और अफीम के सेवन की आदत का भी ऐतिहासिक स्रोतों में उल्लेख मिलता है। इन आदतों ने उसके स्वास्थ्य पर प्रभाव डाला और उसके शासन के अंतिम वर्षों में उसकी व्यक्तिगत स्थिति कमजोर हुई। इसी कारण उसके शासन के अंतिम चरण में नूरजहाँ का राजनीतिक प्रभाव और अधिक बढ़ गया।


राजकुमार खुर्रम — भविष्य का शाहजहाँ
जहाँगीर के कई पुत्र थे, लेकिन उनमें सबसे महत्वपूर्ण था—

राजकुमार खुर्रम
यही खुर्रम आगे चलकर शाहजहाँ बना।
शुरुआत में खुर्रम अपने पिता का पसंदीदा पुत्र और सफल सेनापति था।
उसने दक्कन और अन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लेकिन बाद में खुर्रम और जहाँगीर के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ गया।
इसमें उत्तराधिकार की राजनीति और नूरजहाँ के प्रभाव की भूमिका भी थी।



जहाँगीर और खुर्रम का संघर्ष
जहाँगीर के अंतिम वर्षों में उत्तराधिकार का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया था। नूरजहाँ चाहती थीं कि सत्ता पर उनका प्रभाव बना रहे। दूसरी ओर राजकुमार खुर्रम अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बनाए रखना चाहता था।

इन परिस्थितियों ने दोनों पक्षों के बीच तनाव पैदा किया। खुर्रम ने विद्रोह किया और कुछ समय तक संघर्ष जारी रहा। लेकिन अंततः राजनीतिक परिस्थितियाँ उसके पक्ष में आने लगीं। और जहाँगीर की मृत्यु के बाद वही मुगल सिंहासन का उत्तराधिकारी बना।


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जहाँगीर की अंतिम यात्रा
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में जहाँगीर का स्वास्थ्य काफी कमजोर हो चुका था। 1627 में वह कश्मीर की यात्रा से वापस लौट रहा था।

कश्मीर का प्राकृतिक सौंदर्य उसे बहुत पसंद था और वह अक्सर वहाँ जाता था। वापसी के दौरान उसकी तबीयत खराब हो गई। आखिरकार 28 अक्टूबर 1627 को पंजाब के क्षेत्र में, राजौरी के निकट, उसकी मृत्यु हो गई। उसकी आयु लगभग 58 वर्ष थी।


जहाँगीर का मकबरा
जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसके शव को लाहौर ले जाया गया। उसे शाहदरा, लाहौर में दफनाया गया। बाद में उसकी पत्नी नूरजहाँ के संरक्षण में वहाँ उसका भव्य मकबरा बनवाया गया।

जहाँगीर का मकबरा मुगल स्थापत्य का एक शानदार उदाहरण है। इसमें सुंदर संगमरमर, नक्काशी, जड़ाऊ सजावट और फारसी शैली के प्रभाव दिखाई देते हैं। आज यह लाहौर की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल है।


जहाँगीर के बाद शाहजहाँ
जहाँगीर की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संघर्ष शुरू हुआ। आखिरकार राजकुमार खुर्रम विजयी हुआ और शाहजहाँ के नाम से मुगल सम्राट बना। शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल साम्राज्य ने स्थापत्य कला की अभूतपूर्व ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। और इसी दौर में दुनिया की सबसे प्रसिद्ध इमारतों में से एक—

ताजमहल
का निर्माण हुआ। इस प्रकार जहाँगीर के बाद मुगल साम्राज्य इतिहास के एक और शानदार युग में प्रवेश कर गया।


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जहाँगीर की ऐतिहासिक विरासत
जहाँगीर का शासनकाल लगभग 22 वर्षों का था। उसने अपने पिता अकबर से एक विशाल साम्राज्य प्राप्त किया और उसे काफी हद तक सुरक्षित बनाए रखा। उसकी सबसे बड़ी विरासतों में शामिल हैं—

कला और चित्रकला
उसके शासनकाल में मुगल चित्रकला ने प्राकृतिक और यथार्थवादी शैली में अभूतपूर्व विकास किया।

प्रकृति का अध्ययन
पशु-पक्षियों और वनस्पतियों में उसकी रुचि ने प्राकृतिक चित्रण को बढ़ावा दिया।

राजपूत संबंध
मेवाड़ के साथ समझौते ने लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष को कम किया।

स्थापत्य
उसके समय और उसके परिवार के संरक्षण में मुगल स्थापत्य ने नई सजावटी शैली विकसित की।

साहित्य
तुज़ुक-ए-जहाँगीरी उसके शासनकाल को समझने का महत्वपूर्ण स्रोत है।

यूरोपीय संपर्क
उसके शासनकाल में अंग्रेज़ व्यापारियों और मुगल दरबार के बीच संपर्क बढ़ा।


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जहाँगीर के जीवन की प्रमुख घटनाएँ
1569 फतेहपुर सीकरी में सलीम का जन्म
1599 सलीम का अकबर के विरुद्ध विद्रोह
1605 अकबर की मृत्यु और सलीम का राज्यारोहण
1605 सलीम ने जहाँगीर की उपाधि धारण की
1611 नूरजहाँ से विवाह
1615-19 सर थॉमस रो का जहाँगीर के दरबार में रहना
1615 मेवाड़ के साथ महत्वपूर्ण समझौता
1620 के दशक दक्कन में मुगल संघर्ष जारी
1627 कश्मीर से लौटते समय जहाँगीर की मृत्यु
1627 खुर्रम का शाहजहाँ के रूप में सिंहासन पर बैठना


निष्कर्ष — जहाँगीर: एक अलग तरह का मुगल सम्राट
जहाँगीर को समझने के लिए उसे केवल अकबर का पुत्र या शाहजहाँ का पिता मानना पर्याप्त नहीं है।
वह स्वयं एक विशिष्ट व्यक्तित्व वाला सम्राट था।
उसने अपने पिता से एक विशाल साम्राज्य विरासत में पाया और उसे काफी हद तक सुरक्षित रखा।

उसने राजपूतों के साथ राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाया।
उसके शासन में मुगल चित्रकला ने असाधारण ऊँचाई प्राप्त की।
उसने प्रकृति और जीव-जंतुओं में असाधारण रुचि दिखाई।
उसने अपनी आत्मकथा में अपने जीवन और शासन की अनेक घटनाओं को दर्ज किया। और उसके जीवन में नूरजहाँ का प्रभाव मुगल इतिहास के सबसे दिलचस्प राजनीतिक अध्यायों में से एक बन गया।


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लेकिन उसके शासन में संघर्ष भी कम नहीं थे।
राजकुमारों के बीच उत्तराधिकार की राजनीति, दक्कन की चुनौती, दरबारी गुटबाजी और उसका कमजोर होता स्वास्थ्य उसके शासन की महत्वपूर्ण समस्याएँ थीं। फिर भी जहाँगीर का लगभग 22 वर्ष का शासन मुगल इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा।

अकबर ने मुगल साम्राज्य को शक्ति दी।
जहाँगीर ने उसमें कला और संस्कृति के रंग भरे।
और उसके बाद शाहजहाँ ने उसी साम्राज्य को स्थापत्य की भव्यता तक पहुँचाया। 28 अक्टूबर 1627 को जहाँगीर की मृत्यु के साथ एक युग समाप्त हुआ, लेकिन उसकी कला, चित्रकला, स्थापत्य और साहित्यिक विरासत आज भी जीवित है। लाहौर में स्थित उसका मकबरा आज भी उस सम्राट की याद दिलाता है, जिसने अपने शासनकाल में मुगल साम्राज्य को केवल तलवार और राजनीति से नहीं, बल्कि **कला, प्रकृति, संस्कृति और सौंदर्य** से भी एक अलग पहचान दी। जहाँगीर के बाद मुगल इतिहास का अगला अध्याय और भी अधिक भव्य होने वाला था—

शाहजहाँ का युग।
और उसी युग में मुगल वास्तुकला एक ऐसी ऊँचाई तक पहुँचने वाली थी, जिसका नाम आज पूरी दुनिया जानती है—

ताजमहल।


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