वर्जित वन: एक रहस्यमयी सफर
परिचय
ईश्वर की सबसे अद्भुत रचना—पृथ्वी। एक ऐसा संसार, जहाँ जीवन ने जन्म लिया, सभ्यताएँ बनीं, साम्राज्य उठे और समय के साथ इतिहास बनकर मिट गए। लेकिन...
अब इस पृथ्वी का अंत निकट है। एक ऐसी महाप्रलय, जिसकी कल्पना स्वयं मनुष्य ने कभी नहीं की। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मांड में केवल जीवन ही नहीं, बल्कि प्रकाश और अंधकार—दोनों का जन्म हुआ था। प्रकाश के साथ सत्य, धर्म, करुणा, शांति और मानवता का उदय हुआ।
वहीं अंधकार के गर्भ से जन्मीं वे काली शक्तियाँ, जिनका अस्तित्व केवल विनाश, छल, पाप और मृत्यु के लिए था। तब से लेकर आज तक यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं हुआ। यह युद्ध हमेशा चलता रहा...
बस इसके साक्षी बदलते रहे। आज का मनुष्य स्वयं को पृथ्वी का सबसे शक्तिशाली प्राणी मानता है। विज्ञान और तकनीक के सहारे उसने समुद्र की गहराइयों को नापा, अंतरिक्ष की सीमाओं को चुनौती दी और धरती की परतों में दबी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताओं को खोज निकाला। उसे लगता है कि वह इतिहास को पढ़ चुका है...
लेकिन सत्य यह है कि इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय आज भी उससे छिपा हुआ है। वह नहीं जानता कि ब्रह्मांड के अंधकार में छिपी महाविनाशकारी शक्तियाँ एक बार फिर जाग चुकी हैं। वे धीरे-धीरे पृथ्वी की ओर बढ़ रही हैं। और शायद...
वे पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। उधर मनुष्य भी अपने अहंकार, स्वार्थ, हिंसा और अधर्म में इतना डूब चुका है कि उसे अपने विनाश के कदमों की आहट तक सुनाई नहीं दे रही। धरती पर सत्य कमज़ोर पड़ रहा है… मानवता टूट रही है… और अंधकार पहले से कहीं अधिक प्रबल होता जा रहा है।
इसी बीच एक ऐसा रहस्य फिर से जीवित होने वाला है, जिसे सदियों पहले समय ने स्वयं अपनी परतों में छिपा दिया था।
एक दिव्य छड़ी… जिसका निर्माण स्वर्ग में हुआ था। कहा जाता है कि उसमें इतनी शक्ति समाई हुई है कि वह केवल किसी राज्य या संसार का नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड का भाग्य बदल सकती है।
प्रथम महाविनाश के बाद पृथ्वी पर जीवन को फिर से जन्म लेने में लाखों वर्ष लगे थे। लेकिन इस बार...
यदि वह दिव्य छड़ी किसी के हाथ लग गई...
तो इतिहास स्वयं को दोहराएगा नहीं। इस बार निर्णय केवल एक क्षण में होगा।
या तो उसी शक्ति से पृथ्वी का नव-निर्माण होगा...
या फिर ऐसा महाविनाश, जिसके बाद जीवन को लौटने का अवसर भी नहीं मिलेगा।सबसे बड़ा प्रश्न केवल इतना है—
वह दिव्य छड़ी कहाँ है?... उसकी वास्तविक शक्ति क्या है?..
और...
वह किसके हाथों में पहुँचेगी?.. क्योंकि जिस दिन वह छड़ी अपने वास्तविक स्वामी तक पहुँच जाएगी...
उसी दिन तय होगा—
इस सृष्टि का भविष्य।
नव-निर्माण..
या फिर सम्पूर्ण विनाश।
अध्याय 1 – बली स्टेशन
भारत के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों के बीच बसा बली एक छोटा-सा, लेकिन बेहद खूबसूरत रेलवे स्टेशन था। यहाँ ज़िंदगी शहरों की भागदौड़ से कोसों दूर, अपनी धीमी और शांत रफ्तार से चलती थी। सुबह के ठीक सात बजे थे।
पहाड़ों के पीछे से उगता सूरज अपनी सुनहरी किरणें घाटी में बिखेर रहा था। हल्की-हल्की धुंध अब धीरे-धीरे छंट रही थी और ठंडी हवा देवदार के पेड़ों से टकराकर मधुर संगीत-सी गूंज रही थी। पूरा वातावरण इतना शांत था कि दूर किसी पक्षी की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
अचानक उस सन्नाटे को चीरती हुई एक तीखी रेल-सीटी गूँजी। कुछ ही क्षणों में एक लंबी एक्सप्रेस ट्रेन तेज़ रफ्तार से प्लेटफ़ॉर्म पर आकर रुकी। ब्रेकों की आवाज़ के साथ धुएँ का हल्का गुबार हवा में फैल गया।
दरवाज़े खुलते ही यात्री उतरने लगे। कोई अपने परिवार के साथ था, कोई जल्दी-जल्दी बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था, तो कोई अपने सामान को संभाल रहा था। इसी भीड़ के बीच एक व्यक्ति धीरे-धीरे ट्रेन से नीचे उतरा।
उसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष रही होगी। उसने काले रंग का लंबा ओवरकोट पहन रखा था और उसके हाथों में दो बड़े चमड़े के बैग थे। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट थी और न ही कोई उत्साह—बस एक अजीब-सी गंभीरता थी।
प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखते ही उसने चारों ओर गहरी नज़र दौड़ाई, मानो वह यह सुनिश्चित कर रहा हो कि कोई उस पर नज़र तो नहीं रख रहा। कुछ पल बाद उसकी निगाह स्टेशन पर लगी बड़ी घड़ी पर गई।
समय—सुबह के ठीक 7:00 बजे।
उसने अपने दोनों बैग नीचे रखे और कोट की अंदरूनी जेब से एक पुरानी चाँदी की पॉकेट वॉच निकाली।
वह साधारण घड़ी नहीं थी। उसकी सतह पर कुछ अजीब प्रतीक उकेरे हुए थे, जो पहली नज़र में किसी प्राचीन भाषा के लगते थे। उसने घड़ी का ढक्कन खोला।
टिक... टिक... टिक...
घड़ी बिल्कुल स्टेशन की घड़ी के समय से मेल खा रही थी। उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ घड़ी बंद की और उसे वापस जेब में रख लिया। ऐसा लग रहा था मानो वह किसी तय समय का वर्षों से इंतज़ार कर रहा हो। अपने दोनों बैग उठाकर वह स्टेशन से बाहर निकल आया।
बाहर सड़क लगभग सुनसान थी। कुछ दुकानें अभी खुल रही थीं और चाय की एक दुकान से उठती भाप ठंडी हवा में घुल रही थी। वह टैक्सी की तलाश में इधर-उधर देखने लगा।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई—
"सर... टैक्सी चाहिए?"
उसने धीरे से मुड़कर देखा। करीब पचास वर्षीय एक टैक्सी चालक मुस्कुराते हुए उसके सामने खड़ा था।
"जी सर, कहाँ जाना है?" ड्राइवर ने विनम्रता से पूछा।
उस व्यक्ति ने बिना कोई भाव बदले उत्तर दिया—
"बी-2 ब्लॉक... हाउस नंबर 34।"
यह सुनते ही ड्राइवर के चेहरे की मुस्कान एक पल के लिए गायब हो गई। उसने उस व्यक्ति को कुछ क्षण तक ध्यान से देखा, फिर सामान्य बनने की कोशिश करते हुए बोला—
"जी... आइए। मैं आपको वहाँ छोड़ देता हूँ।"
दोनों टैक्सी में बैठ गए।
टैक्सी पहाड़ी रास्तों पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। करीब पच्चीस मिनट बाद वह एक ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी। सिग्नल का इंतज़ार करते हुए उस व्यक्ति ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क के दोनों ओर बने आलीशान मकान किसी यूरोपीय पहाड़ी शहर का एहसास करा रहे थे। हर घर के सामने रंग-बिरंगे फूल खिले थे और लकड़ी की सुंदर बालकनियाँ सुबह की धूप में चमक रही थीं।
लेकिन उसकी नज़र किसी घर की सुंदरता पर नहीं थी। वह हर घर का नंबर ध्यान से पढ़ रहा था… मानो उसे किसी खास मकान की तलाश हो। सिग्नल हरा हुआ और टैक्सी फिर चल पड़ी। कुछ मिनट बाद टैक्सी एक शांत गली के मोड़ पर आकर रुक गई। ड्राइवर ने इंजन बंद किया। उसने धीरे से पीछे मुड़कर उस व्यक्ति की ओर देखा। इस बार उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी।
टैक्सी ड्राइवर ने गाड़ी रोकते हुए धीमे स्वर में बोला—
"सर, बी-2 ब्लॉक आ गया है। आप सामने वाली गली में सीधे चले जाइए। गली के आखिर में आपको हाउस नंबर 34 मिल जाएगा।"
यह सुनते ही उस व्यक्ति के चेहरे पर पहली बार हल्का-सा बदलाव आया। उसने बिना कुछ कहे अपनी नज़र उस मकान पर टिकाए रखी… मानो उसे पहले से पता हो कि वहाँ उसका इंतज़ार कौन कर रहा है।
उस व्यक्ति ने टैक्सी से उतरकर अपने दोनों बैग नीचे रखे, जेब से पैसे निकाले और ड्राइवर की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"Thank you."
ड्राइवर ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया और टैक्सी वहाँ से चली गई। कुछ क्षण तक वह व्यक्ति वहीं खड़ा रहा। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई। उसे महसूस हुआ कि आसपास बने लगभग सभी मकान एक ही नक्शे पर बने हुए थे। रंग, बनावट और ऊँचाई—सब कुछ लगभग एक जैसा था। यदि घरों के नंबर न लिखे होते, तो उन्हें पहचान पाना लगभग असंभव था।
वह टैक्सी ड्राइवर के बताए रास्ते पर आगे बढ़ गया। गली में प्रवेश करते ही उसे एक अजीब-सी खामोशी ने घेर लिया। सुबह के सात बजे होने के बावजूद वहाँ दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। न बच्चों की आवाज़, न किसी वाहन का शोर और न ही किसी घर से आती कोई हलचल।
यह सन्नाटा उसे कुछ अस्वाभाविक लगा। फिर भी उसने अपने कदम नहीं रोके और हाउस नंबर 34 की तलाश में आगे बढ़ता रहा। कुछ दूर जाने पर उसकी नज़र एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। वह अपने घर के बाहर रखी एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बिल्कुल शांत बैठी थीं। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था और उनकी नज़रें सामने सड़क पर टिकी हुई थीं।
वह उनके पास पहुँचा और विनम्रता से बोला,
"माफ़ कीजिए... क्या आप मुझे हाउस नंबर 34 का रास्ता बता सकती हैं?"
बूढ़ी महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने सोचा कि शायद उन्होंने उसकी बात सुनी नहीं होगी। इसलिए वह थोड़ा और पास गया और दोबारा बोला,
"सुनिए... क्या आप मुझे हाउस नंबर 34 तक पहुँचने का रास्ता बता सकती हैं?"
फिर भी कोई जवाब नहीं मिला।
तभी घर के भीतर से लगभग बीस-बाईस वर्ष की एक युवती बाहर आई। उसने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए शांत स्वर में कहा,
"माफ़ कीजिए, मेरी दादी माँ बीमार हैं। वे न तो सुन सकती हैं और न ही बोल पाती हैं। आप किससे मिलना चाहते हैं?"
उस व्यक्ति ने विनम्रता से उत्तर दिया,
"मैं यहाँ पहली बार आया हूँ। मुझे बी-2 ब्लॉक के हाउस नंबर 34 में जाना है। क्या आप मुझे उसका रास्ता बता सकती हैं?"
युवती ने गली की ओर इशारा करते हुए कहा,
"आप सीधे आगे चलते जाइए। गली के आखिर में एक हरे और पीले रंग का मकान दिखाई देगा। वही हाउस नंबर 34 है।"
"बहुत-बहुत धन्यवाद।" उस व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा और आगे बढ़ गया।
कुछ ही मिनटों बाद वह गली के अंतिम छोर पर पहुँच गया।
वहाँ सचमुच एक हरे और पीले रंग का पुराना मकान था।
लोहे के पुराने गेट पर जंग लगी हुई थी और उसके ऊपर एक धातु की नेम प्लेट लगी थी, जिस पर धूल की परत जमी हुई थी। उसने हाथ से धूल हटाई।
उस पर साफ़ लिखा था—
"हाउस नं. 34"
उसने गहरी साँस ली, अपने दोनों बैग दरवाज़े के पास रखे और डोरबेल का बटन दबा दिया।
टन... टन...
अंदर कोई हलचल नहीं हुई।
उसने कुछ क्षण इंतज़ार किया और फिर दोबारा घंटी बजाई।
टन... टन...
इस बार भी कोई जवाब नहीं मिला।
तीसरी बार उसने डोरबेल दबाई।
घंटी की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
मैं अभी-अभी अपने कमरे में बिस्तर से उठा ही था कि अचानक डोरबेल की लगातार बजती आवाज़ ने मेरा ध्यान खींच लिया। मैंने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा।
सुबह के ठीक 7:50 बजे थे।
इतनी सुबह मेरे घर कौन आ सकता था?
घंटी लगातार तीन-चार बार बज चुकी थी।
फिर अचानक...
सब कुछ शांत हो गया।
डोरबेल की आवाज़ सुनकर मैं अनमने ढंग से अपने बिस्तर से उठा। सुबह-सुबह नींद पूरी नहीं हुई थी, इसलिए शरीर में भारीपन और चेहरे पर आलस साफ़ झलक रहा था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए मैं मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा।
जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, सामने खड़ा व्यक्ति मुझे बिल्कुल अपरिचित लगा।
उसकी उम्र लगभग चालीस से पैंतालीस वर्ष के बीच रही होगी। कद लगभग पाँच फीट, गेहुँआ रंग, चेहरे पर हल्की दाढ़ी और आँखों में अजीब-सी गंभीरता थी। उसने काली जैकेट के साथ सफेद शर्ट, काली पैंट और चमकते हुए काले जूते पहन रखे थे। उसके पास दो बड़े बैग रखे थे।
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही उसने मेरी ओर देखते हुए कहा,
"क्या आप अशोक जोशी हैं?"
मैंने हल्के आश्चर्य से उत्तर दिया,
"जी... मैं ही अशोक जोशी हूँ। कहिए, क्या बात है?"
उस व्यक्ति ने एक गहरी साँस ली, मानो वह कोई कठिन बात कहने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो।
फिर उसने धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा,
"मेरा नाम उमेश खन्ना है। मैं आपके पिताजी के साथ काम करता था। मुझे बेहद अफसोस के साथ आपको एक दुखद समाचार देना पड़ रहा है।"
मेरे चेहरे की मुस्कान उसी क्षण गायब हो गई।
वह आगे बोला,
"दो दिन पहले हम एक प्राचीन गुफा में खुदाई कर रहे थे। अचानक गुफा की छत का एक बड़ा हिस्सा भरभराकर गिर पड़ा। आपके पिताजी उसी मलबे के नीचे दब गए। हमने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन भारी चट्टानों और लगातार गिरते पत्थरों के कारण वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं हो सका। बचाव दल अभी भी मलबा हटाने में लगा है। हमें उम्मीद है कि एक-दो दिन के भीतर उनका पार्थिव शरीर बाहर निकाल लिया जाएगा।"
कुछ क्षण रुककर उसने अपने साथ लाए बैग मेरी ओर बढ़ा दिए।
"ये उनका सामान है... उन्होंने आखिरी बार इसी अभियान में इसका इस्तेमाल किया था।"
उसकी बात समाप्त होते ही ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। मेरे कानों में उसकी आवाज़ गूँज रही थी, लेकिन मेरा मन उस सच्चाई को स्वीकार करने से इंकार कर रहा था।
पिताजी... नहीं रहे...?
यह विचार ही मेरे भीतर तूफ़ान की तरह उठ रहा था। मेरी आँखें अनायास ही नम हो गईं। गला इतना भर आया कि शब्द भी मुश्किल से निकल रहे थे। मैंने काँपते हाथों से बैग लेते हुए बस इतना कहा,
"जी... धन्यवाद।"
उमेश खन्ना कुछ पल तक मेरी ओर देखते रहे। शायद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस समय मुझे कैसे सांत्वना दें। फिर उन्होंने चुपचाप सिर झुकाया और वहाँ से चले गए। दरवाज़ा बंद करने के बाद मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। पूरा घर अचानक मुझे बेहद सूना और खाली लगने लगा। कुछ मिनट बाद मैं पिताजी का सामान लेकर उनके कमरे में पहुँचा।
वह कमरा आज भी वैसा ही था, जैसा उन्होंने आखिरी बार छोड़कर गए थे। मेज़ पर खुली हुई किताबें, दीवारों पर लगे पुराने नक्शे, लकड़ी की अलमारियों में रखी प्राचीन वस्तुएँ और कमरे में फैली पुरानी किताबों की हल्की-सी महक... हर चीज़ उनकी मौजूदगी का एहसास करा रही थी। मैंने धीरे से बैग खोला और एक-एक करके उसमें रखा सामान बाहर निकालने लगा।
मेरे पिताजी, प्रोफेसर देवेंद्र जोशी, देश के सबसे प्रसिद्ध पुरातत्व खोजकर्ताओं में से एक थे। उनका जीवन प्राचीन सभ्यताओं, भूली-बिसरी संस्कृतियों और रहस्यमयी खजानों की खोज को समर्पित था। उन्होंने अपने जीवन में न जाने कितनी दुर्लभ और ऐतिहासिक वस्तुओं की खोज की थी। उनकी खोजों ने इतिहास की कई अनसुलझी पहेलियों को सुलझाया था। देश-विदेश के समाचार पत्र, वैज्ञानिक पत्रिकाएँ और इतिहास से जुड़ी मैगज़ीनें अक्सर उनकी उपलब्धियों को अपने मुखपृष्ठ पर प्रकाशित करती थीं। उनकी सफलता के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था। इतिहास की दुनिया में उनका नाम एक किंवदंती बन चुका था। लोग कहते थे—
"अगर दुनिया में कोई व्यक्ति हजारों साल पुरानी किसी खोई हुई वस्तु का सुराग ढूँढ़ सकता है, तो वह सिर्फ प्रोफेसर देवेंद्र जोशी हैं।"
उनकी मेहनत और सफलता ने हमारे परिवार को आर्थिक रूप से इतना सक्षम बना दिया था कि मुझे कभी नौकरी करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई।
उनके जीवन और खोजों पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं। कुछ प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं ने उन पर वृत्तचित्र और लघु फ़िल्में भी बनाई थीं। लेकिन दुनिया उन्हें जितना एक महान खोजकर्ता मानती थी, मेरे लिए वे उससे कहीं बढ़कर थे। वे मेरे पिता, मेरे शिक्षक और मेरे सबसे अच्छे मित्र थे। जब भी वे किसी अभियान से लौटते, सबसे पहले मुझे अपनी नई खोज दिखाई करते। वे घंटों बैठकर उस वस्तु का इतिहास, उसकी विशेषताएँ और उसे खोजने की पूरी कहानी सुनाते। फिर मुस्कुराकर कहते,
"अशोक... किसी भी खजाने को खोजने से पहले इतिहास को समझना सीखो। खजाने नक्शों से नहीं, धैर्य और ज्ञान से मिलते हैं।"
उनकी यही बातें बचपन से मेरे मन में बस गई थीं। पिताजी एक आदत कभी नहीं छोड़ते थे। वे हर अभियान का पूरा विवरण अपनी निजी डायरी में लिखा करते थे। कहाँ गए... क्या मिला... किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा... और आगे कहाँ जाना है—सब कुछ।
उनकी डायरी केवल एक नोटबुक नहीं थी, बल्कि उनके जीवन की पूरी यात्रा का दस्तावेज़ थी। मैंने हमेशा एक बात महसूस की थी। वे कभी एक जगह ज़्यादा दिन नहीं रुकते थे। एक अभियान पूरा होते ही वे बिना आराम किए दूसरे अभियान की तैयारी शुरू कर देते। उन्हें देखकर अक्सर लगता था… मानो वे किसी ऐसी रहस्यमयी चीज़ की तलाश में हों, जिसके बारे में दुनिया को अभी तक कोई जानकारी ही न हो।
मैं पिताजी के कमरे में रखे बड़े लकड़ी के बक्से के सामने बैठा था। धीरे-धीरे मैं उसमें रखा सामान बाहर निकालने लगा। बक्से में उनके कपड़े, जूते, खुदाई में इस्तेमाल होने वाले कुछ औज़ार और कई दुर्लभ प्राचीन वस्तुएँ रखी थीं। हर वस्तु को हाथ में लेते ही उनसे जुड़ी कोई-न-कोई याद मेरे मन में ताज़ा हो जाती। मैं एक-एक वस्तु को ध्यान से देख ही रहा था कि तभी मेरी नज़र उन प्राचीन वस्तुओं के नीचे दबी एक काली चमड़े की डायरी पर पड़ी। मैंने उसे सावधानी से बाहर निकाला। डायरी के ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"प्रोफेसर देवेंद्र जोशी"
मैं कुछ पल तक उसे देखता ही रह गया। अजीब बात यह थी कि मैंने अपने पूरे जीवन में पिताजी के हाथों में यह डायरी कभी नहीं देखी थी। वे अपनी हर यात्रा में एक भूरी डायरी साथ रखते थे, लेकिन यह काली डायरी मेरे लिए बिल्कुल नई थी। मेरे मन में उत्सुकता और बढ़ गई। मैं डायरी लेकर अपने कमरे में आ गया। कमरे में पहुँचकर मैंने दरवाज़ा बंद किया, कुर्सी खींचकर मेज़ के सामने बैठ गया और धीरे से डायरी खोली। पहला पन्ना खुलते ही मेरी नज़र उस पर लिखी एक छोटी-सी पंक्ति पर पड़ी।
वह किसी ऐसी प्राचीन भाषा में लिखी थी जिसे मैं पढ़ नहीं सकता था। उस भाषा के अक्षर किसी साधारण लिपि जैसे नहीं थे। वे किसी रहस्यमयी प्रतीक की तरह दिखाई दे रहे थे। मैंने उसे पढ़ने की कोशिश की, लेकिन एक भी शब्द समझ नहीं आया। मैंने सोचा कि शायद आगे के पन्नों में इसका अर्थ मिल जाए। मैंने दूसरा पन्ना पलटा। और अगले ही पल मैं ठिठक गया। पूरे पन्ने पर एक युवती का अद्भुत स्केच बना हुआ था।
इतना जीवंत कि पहली नज़र में वह किसी तस्वीर जैसा प्रतीत हो रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, लंबे काले बाल, चेहरे पर अद्भुत तेज और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान...
ऐसा सौंदर्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैं तुरंत समझ गया कि यह स्केच पिताजी ने ही बनाया है। क्योंकि वे अपने हर स्केच के दाएँ ऊपरी कोने में अपने नाम का एक छोटा-सा विशेष चिन्ह बनाया करते थे। वही चिन्ह इस चित्र पर भी मौजूद था। मैं उस चित्र को देर तक देखता रहा। मेरे मन में एक ही प्रश्न बार-बार उठ रहा था—
"यह लड़की कौन है...?"
क्या वह सचमुच इस दुनिया की थी? या फिर किसी प्राचीन कथा का हिस्सा? और सबसे बड़ा सवाल...
पिताजी उससे कब और कहाँ मिले थे?
इन सवालों का उत्तर जानने की उत्सुकता अब और बढ़ चुकी थी। मैंने तुरंत अगला पन्ना पलटा। तीसरे पन्ने पर किसी अत्यंत प्राचीन स्थान का विस्तृत वर्णन लिखा था। शब्दों से ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह स्थान किसी भूले-बिसरे इतिहास का हिस्सा हो। मैं आगे पढ़ता गया। कुछ पन्नों बाद एक ऐसे रहस्यमयी जंगल का उल्लेख मिला, जो कभी धरती का सबसे सुंदर वन माना जाता था। वहाँ हमेशा हरियाली रहती थी, दुर्लभ जीव-जंतु निवास करते थे और कहा जाता था कि देवताओं का आशीर्वाद उस भूमि पर सदैव बना रहता था।
लेकिन एक दिन… वह पूरा जंगल अचानक वीरान हो गया। पिताजी ने लिखा था कि उस विनाश के पीछे अंधकार लोक का एक शक्तिशाली पिशाच था। एक ऐसा शैतान, जिसका उद्देश्य केवल विनाश था। वह देवताओं का अस्तित्व मिटाकर पूरी पृथ्वी पर अंधकार का साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।
ऐसा साम्राज्य, जहाँ न प्रकाश हो...
न आशा...
और न ही जीवन।
डायरी में आगे लिखा था—
"सृष्टि की शुरुआत से ही प्रकाश और अंधकार, ईश्वर और शैतान के बीच संघर्ष चलता आया है। यह युद्ध कभी समाप्त नहीं हुआ... केवल हमारी आँखों से ओझल हो गया।"
यह पढ़कर मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैंने आगे पढ़ना जारी रखा। कुछ पन्नों बाद एक नाम बार-बार मेरी नज़रों के सामने आने लगा—
राजकुमारी निहारिका।
पिताजी ने लिखा था कि वह केवल एक राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि अद्भुत सौंदर्य, साहस और दिव्य शक्तियों की स्वामिनी थीं।
कहा जाता था कि उनके समान सुंदर स्त्री पूरे राज्य में कोई नहीं थी। लेकिन पिताजी ने उनके सौंदर्य से अधिक उनकी नियति का वर्णन किया था। मानो उनका संबंध किसी बहुत बड़े रहस्य से जुड़ा हो। मेरी धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं। मैंने तेजी से कुछ और पन्ने पलटे। अब डायरी में एक ऐसी वस्तु का उल्लेख था, जिसे पढ़कर मेरे हाथ काँप उठे। वह थी...
एक दिव्य जादुई छड़ी।
पिताजी के अनुसार, सदियों पहले यह छड़ी स्वर्ग से धरती पर गिरी थी और उसके बाद हमेशा के लिए कहीं खो गई।
किंवदंतियों के अनुसार, उस छड़ी में ऐसी शक्ति थी जो पूरी सृष्टि का संतुलन बदल सकती थी। इसी छड़ी को पाने के लिए ईश्वर की दिव्य शक्तियों और अंधकार लोक के शैतानों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध समाप्त हो गया...
लेकिन वह जादुई छड़ी किसी को नहीं मिली।
वह धरती पर कहीं छिप गई।
और शायद...
आज भी वहीं है।
डायरी के अंतिम शब्दों ने मेरी रूह तक हिला दी।
"जिस दिन यह छड़ी अंधकार के स्वामी के हाथ लग जाएगी, उसी दिन मानव सभ्यता का अंत निश्चित होगा। पृथ्वी पर फिर से अंधकार का शासन होगा। देवताओं का अस्तित्व मिट जाएगा और मनुष्य केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।"
मैंने धीरे-धीरे डायरी बंद कर दी। कमरे में गहरा सन्नाटा था। मेरे मन में केवल एक ही प्रश्न गूँज रहा था—
क्या पिताजी केवल इतिहास की खोज कर रहे थे...
या फिर वे उस जादुई छड़ी के सबसे बड़े रहस्य तक पहुँच चुके थे?
मैंने डायरी के कुछ और पन्ने आगे पलटे। इस बार पिताजी ने जो लिखा था, उसे पढ़कर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई।
उन्होंने लिखा था—
"मैंने जादुई छड़ी के बारे में किसी को भी कुछ नहीं बताया। मुझे डर था कि यदि इसकी भनक किसी गलत व्यक्ति को लग गई, तो पूरी दुनिया खतरे में पड़ सकती है। इसलिए मैंने अकेले ही इस रहस्य की तह तक पहुँचने का निर्णय लिया।"
डायरी में आगे लिखा था कि उन्होंने वर्षों तक प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष, ऐतिहासिक ग्रंथ, मंदिरों के शिलालेख, गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र और लोककथाओं का गहन अध्ययन किया। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से मिली छोटी-से-छोटी वस्तु भी उनके लिए एक सुराग थी। वे मानते थे कि इतिहास कभी पूरी सच्चाई नहीं बताता। वह अपने रहस्यों को छोटी-छोटी कहानियों, प्रतीकों और भूली-बिसरी वस्तुओं में छिपाकर रखता है। धीरे-धीरे उन बिखरे हुए सुरागों को जोड़ते हुए उन्हें एक चौंकाने वाली जानकारी मिली।
डायरी में लिखा था—
"जादुई छड़ी का निर्माण पृथ्वी पर नहीं, बल्कि स्वर्ग लोक में हुआ था।"
यह कोई साधारण अस्त्र नहीं था। इसे स्वर्ग के सबसे शक्तिशाली शासक राजा बेरो ने स्वयं निर्मित किया था। उस छड़ी में ऐसी दिव्य शक्ति थी, जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने में सक्षम थी। लेकिन इसी शक्ति पर अंधकार के स्वामी की नज़र पड़ गई। डायरी के अनुसार, शैतान ने अपनी विशाल और भयानक सेना के साथ स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। वह युद्ध इतना भीषण था कि स्वर्ग की भूमि तक काँप उठी। चारों ओर विनाश ही विनाश था। देवताओं की सेनाएँ एक-एक करके पराजित होने लगीं और अंधकार की सेना स्वर्ग के केंद्र तक पहुँच गई। राजा बेरो समझ चुके थे कि यदि जादुई छड़ी शैतान के हाथ लग गई, तो केवल स्वर्ग ही नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि विनाश की आग में जल उठेगी। अंतिम क्षणों में उन्होंने एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने अपनी समस्त दिव्य शक्ति एकत्र की और उस जादुई छड़ी को स्वर्ग से बहुत दूर... पृथ्वी की ओर फेंक दिया।
छड़ी आकाश को चीरती हुई कहीं धरती पर आ गिरी...
लेकिन उसके बाद वह कहाँ गई...
यह कोई नहीं जान सका।
डायरी में लिखा अंतिम वाक्य था—
"जिस दिन यह छड़ी फिर से मिलेगी, उसी दिन सृष्टि का भविष्य तय होगा।"
मैंने उत्सुकता से अगला पन्ना पलटा।
लेकिन वह पूरी तरह खाली था।
मैंने दूसरा पन्ना देखा...
वह भी कोरा था।
फिर तीसरा...
चौथा...
पाँचवाँ...
पूरी डायरी के आगे के सभी पन्ने बिल्कुल खाली थे। मैं कुछ क्षण तक उन कोरे पन्नों को देखता रहा।
मेरे मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
क्या पिताजी अपनी बात पूरी नहीं लिख पाए... या फिर उन्होंने जानबूझकर बाकी बातें छिपा दी थीं?
निराश होकर मैंने डायरी बंद कर दी। मैं उसे वापस पिताजी के बक्से में रखने के लिए उनके कमरे में गया। बक्सा अभी भी खुला हुआ था। मैंने डायरी अंदर रखी और बिखरे हुए कपड़ों को ठीक से जमाने लगा।
तभी...
मेरे हाथ पिताजी की एक पुरानी पैंट की जेब से टकराए। जेब में कुछ मुड़े-तुड़े कागज़ रखे हुए थे। मैंने उन्हें सावधानी से बाहर निकाला। कागज़ काफी पुराने थे। उनके किनारे पीले पड़ चुके थे और ऐसा लग रहा था मानो उन्हें वर्षों से किसी ने छुआ ही न हो। मैंने धीरे-धीरे उन्हें खोला।
उन पर वही लिखावट थी… जिसे मैं बचपन से पहचानता था।
वह पिताजी की ही लिखावट थी। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उन कागज़ों पर वही कहानी आगे लिखी हुई थी, जो डायरी में अचानक अधूरी रह गई थी। मेरी धड़कन तेज़ हो गई। मैंने तुरंत बक्से से काली डायरी फिर से बाहर निकाली। इस बार मैं उसे केवल पढ़ना नहीं चाहता था…
मैं उसके हर शब्द को समझना चाहता था। मैं फर्श पर ही बैठ गया। डायरी को अपने सामने रखा, वे कागज़ उसके बगल में रखे और गहरी साँस लेते हुए पहला पन्ना खोला।
इस बार मैंने निश्चय कर लिया था—
मैं डायरी का एक भी शब्द छोड़े बिना, शुरू से अंत तक पढ़ूँगा।
क्योंकि अब मुझे यकीन हो चुका था...
पिताजी की मृत्यु केवल एक दुर्घटना नहीं थी।
उस डायरी में ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके लिए शायद किसी ने उनकी जान ले ली थी।
दिन – सोमवार
तारीख – 8 अक्टूबर 1962
डायरी – प्रोफेसर देवेंद्र जोशी
"शाम के लगभग 6:15 बजे थे।"
मैं अपनी खोजी टीम के साथ कैंप के बाहर बैठा था। दिनभर की खुदाई के बाद सभी लोग थके हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और हम बातचीत करते हुए बीयर की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी कैंप में रखा टेलीविजन अचानक एक विशेष समाचार प्रसारित करने लगा। मेरी नज़र अनायास ही स्क्रीन पर टिक गई।
टीवी एंकर:
"नमस्कार। आज हम आपको उत्तर भारत में पिछले सप्ताह हुई एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खुदाई में मिली दुर्लभ प्राचीन वस्तुओं के बारे में बताने जा रहे हैं। इन वस्तुओं का ऐतिहासिक महत्व क्या है, इसे समझने के लिए हमारे साथ मौजूद हैं देश के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. के. एस. हूडा।"
"डॉ. हूडा, सबसे पहले आप हमें बताइए कि इन खोजों को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?"
डॉ. के. एस. हूडा:
"खुदाई में प्राप्त सभी वस्तुएँ अत्यंत दुर्लभ हैं। प्रारंभिक जाँच से यह स्पष्ट हुआ है कि ये कई सदियों पुरानी हैं, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इनका इतिहास अधूरा है।"
"इनमें से प्रत्येक वस्तु किसी बड़े रहस्य का केवल एक हिस्सा प्रतीत होती है। मानो किसी ने पूरी कहानी को अलग-अलग स्थानों पर बिखेर दिया हो।"
"ऐसी ही कुछ वस्तुएँ हमें छह महीने पहले और उससे भी पहले एक अन्य अभियान में मिली थीं। जब हमने उन सभी खोजों की तुलना की, तो एक समानता सामने आई। हर सुराग हमें उत्तर के एक प्राचीन स्थान—कुंडाबाद—की ओर ले जाता है।"
"कुंडाबाद, खुदाई स्थल से कुछ मील की दूरी पर स्थित है। हमें विश्वास है कि इन सभी वस्तुओं का वास्तविक इतिहास वहीं छिपा हुआ है।"
उन्होंने कुछ क्षण रुककर गंभीर स्वर में आगे कहा—
"हमने वहाँ कई बार खोजी दल भेजे। खुदाई भी शुरू हुई, लेकिन एक अभियान के दौरान अचानक पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा। पूरी टीम उसी मलबे में दब गई।"
"दुर्भाग्यवश... आज तक उन लोगों के शव भी नहीं मिल सके।"
स्टूडियो कुछ पल के लिए शांत हो गया। फिर एंकर ने धीमे स्वर में कहा—
"तो आपने सुना... इन प्राचीन वस्तुओं का वास्तविक इतिहास अभी भी रहस्य बना हुआ है। जब तक कुंडाबाद का रहस्य नहीं सुलझता, तब तक इन खोजों की पूरी कहानी सामने नहीं आ सकती।"
"अब बढ़ते हैं आज के खेल समाचारों की ओर..."
मैंने रिमोट उठाकर टेलीविजन बंद कर दिया। लेकिन मेरा मन अब कहीं और था। मेरी आँखों के सामने बार-बार केवल एक ही नाम घूम रहा था—
कुंडाबाद।
यदि डॉ. हूडा की बात सही थी...
तो इसका अर्थ साफ़ था।
अब तक हमने केवल कहानी के बिखरे हुए टुकड़े खोजे थे। असल रहस्य...
अभी भी कुंडाबाद की धरती के नीचे दफ़्न था। मैं इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि तभी अचानक मेज़ पर रखा टेलीफोन बज उठा।
ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन...
मैंने तुरंत रिसीवर उठाया।
"हेलो..."
दूसरी ओर से परिचित आवाज़ आई।,br>
"देवेंद्र, टीवी पर खबर देखी?"
आवाज़ सुनते ही मैं पहचान गया।
वह डॉ. के. एस. हूडा थे।
मैंने बिना देर किए पूछा,
"जी, डॉ. साहब। लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही। आपने कहा कि इन वस्तुओं की कहानी अधूरी है... आपका मतलब क्या है?"
कुछ क्षण तक फोन के दूसरी ओर सन्नाटा छाया रहा।
फिर डॉ. हूडा ने बेहद धीमे और गंभीर स्वर में कहा—
"देवेंद्र... जो बात मैं अब तुम्हें बताने जा रहा हूँ, वह आज तक मैंने किसी से नहीं कही।"
मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मैं समझ गया...
अब जो सुनने वाला था, वही शायद इस पूरे रहस्य की पहली असली कड़ी थी।
फोन के दूसरी ओर से डॉ. के. एस. हूडा की गंभीर आवाज़ सुनाई दी—
"देवेंद्र, अब तक जो भी प्राचीन वस्तुएँ हमें मिली हैं, वे केवल उस रहस्य के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। पूरी कहानी... पूरी सच्चाई... आज भी कुंडाबाद की धरती के नीचे दबी हुई है।"
उन्होंने कुछ क्षण रुककर आगे कहा—
"मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी पूरी टीम के साथ तुरंत कुंडाबाद जाओ और इस अधूरी कहानी को पूरा करो। इस अभियान के लिए जितने संसाधनों की आवश्यकता होगी, उनकी व्यवस्था मेरी ओर से की जाएगी।"
फिर उनका स्वर और गंभीर हो गया।
"लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, देवेंद्र..."
"जहाँ तुम जा रहे हो, वहाँ ज़िंदा रहना ही सबसे बड़ी चुनौती है। वहाँ न रहने की कोई व्यवस्था है, न संचार का कोई साधन और न ही यह निश्चित है कि हर व्यक्ति वापस लौट पाएगा। इसलिए अपनी टीम का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना।"
एक लंबी साँस लेने के बाद उन्होंने कहा—
"कल सुबह मुझसे मिलो... फिर हम आगे की योजना बनाएँगे।"
इतना कहकर डॉ. हूडा ने फोन काट दिया। मैं कुछ क्षण तक रिसीवर हाथ में लिए खड़ा रहा। मेरे मन में एक ही प्रश्न बार-बार घूम रहा था—
आख़िर कुंडाबाद में ऐसा क्या छिपा था... जहाँ जाने वाले लोग कभी लौटकर नहीं आए?
मैं अभी इसी सोच में डूबा था कि मेरी टीम का एक सदस्य मेरे पास आया। उसने मेरे चेहरे की ओर देखते हुए पूछा—
"सर, सब ठीक है? आप कुछ परेशान लग रहे हैं।"
मैंने उसकी ओर देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"एक अच्छी खबर है... और एक बुरी खबर भी।"
वह हँसते हुए बोला—
"तो फिर दोनों खबरें एक साथ ही बता दीजिए।"
मैंने सभी साथियों को अपने पास बुलाया। कुछ ही देर में पूरी टीम मेरे सामने खड़ी थी। मैंने सबकी ओर देखते हुए कहा—
"दोस्तों... मेरे पास आप सबके लिए एक अच्छी खबर है और एक बुरी खबर।"
भीड़ में से किसी ने मुस्कुराते हुए पूछा—
"पहले अच्छी खबर सुनाइए, सर।"
मैंने कहा—
"अच्छी खबर यह है कि हमें देश के सबसे रहस्यमयी पुरातात्विक स्थल—कुंडाबाद—में खुदाई करने की ज़िम्मेदारी मिली है।"
मेरी बात सुनते ही सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। मैंने आगे कहा—
"और बुरी खबर..."
"...हमें कल सुबह ही वहाँ के लिए रवाना होना होगा।"
पूरा माहौल अचानक शांत हो गया। मैं समझ सकता था कि कोई भी खुश क्यों नहीं था। हम सभी छह महीने तक लगातार कठिन खुदाई करके अभी-अभी लौटे थे। हर व्यक्ति अपने परिवार से मिलने के लिए उत्सुक था। ऐसे समय में फिर से एक नए और उससे भी अधिक खतरनाक अभियान पर निकलना किसी के लिए आसान नहीं था। कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला। मैंने सबकी आँखों में झाँकते हुए कहा—
"मैं जानता हूँ कि आप सब थक चुके हैं। मैं भी अपने परिवार के पास जाना चाहता हूँ। लेकिन यह अवसर शायद जीवन में केवल एक बार मिलता है।"
मैं धीरे-धीरे उनके बीच चलता हुआ बोला—
"हमने अपने जीवन में न जाने कितने प्राचीन खजाने खोजे हैं। हमने इतिहास को समझा है... लेकिन क्या हमने कभी इतिहास बनाया है?"
सभी लोग चुपचाप मेरी बात सुन रहे थे। मैंने आगे कहा—
"कुंडाबाद केवल एक खुदाई नहीं है। यह उस अधूरी कहानी को पूरा करने का अवसर है, जिसे सदियों से कोई पूरा नहीं कर पाया।"
"यदि हम सफल हुए... तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल हमारी खोज को नहीं, बल्कि हमारे नाम को भी इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।"
मैंने पास रखी बीयर की बोतल उठाई और उसे आसमान की ओर ऊँचा करते हुए पूरे जोश से कहा—
"तो बताइए..."
"क्या आप लोग इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए अमर करना चाहते हैं?"
कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा। फिर अचानक भीड़ में से एक आवाज़ गूँजी—
"मैं तैयार हूँ, सर!"
उसके बाद दूसरी आवाज़ आई—
"मैं भी!"
फिर तीसरी...
और देखते ही देखते पूरी टीम एक साथ उत्साह से चिल्ला उठी—
"हम सब आपके साथ हैं!"
उनकी गूँजती हुई आवाज़ पूरे कैंप में फैल गई। उसी क्षण मुझे विश्वास हो गया...
कुंडाबाद का सफर अब शुरू हो चुका था। लेकिन हममें से किसी को भी यह अंदाज़ा नहीं था कि यह अभियान केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी की सबसे खतरनाक यात्रा बनने वाला था।
अगले ही पल पूरी टीम उत्साह से एक साथ चिल्ला उठी।
"हम तैयार हैं!"
अपने साथियों के चेहरे पर वही जोश देखकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। मुझे पता था कि इस मिशन को मैं अकेले कभी पूरा नहीं कर सकता था। मेरी सबसे बड़ी ताकत मेरी टीम थी।लेकिन उस खुशी के बावजूद, मेरे मन के किसी कोने में एक अजीब-सी बेचैनी लगातार जन्म ले रही थी।
ऐसा लग रहा था...
मानो हम सब अनजाने में किसी ऐसे सफ़र पर निकलने वाले हों, जहाँ से लौटकर आना शायद हर किसी की किस्मत में न लिखा हो। फिर भी मैंने उस एहसास को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मैं हमेशा से अपनी ज़िंदगी में कुछ ऐसा करना चाहता था, जो साधारण उपलब्धियों से कहीं बड़ा हो।
मैं केवल प्राचीन वस्तुएँ नहीं खोजता था...
मैं इतिहास के उन रहस्यों को ढूँढ़ना चाहता था, जिन्हें समय ने सदियों से अपने भीतर छिपाकर रखा था। मेरा हमेशा से एक ही विश्वास रहा है—
"यदि किसी लक्ष्य को पाने का इरादा सच्चा हो, तो देर भले ही लगे, लेकिन मंज़िल एक दिन रास्ता ज़रूर दिखा देती है।"
अगला दिन
अगली सुबह मैं अपनी पूरी टीम के साथ तुग़लई पहुँच गया। तुग़लई एक बेहद सुनसान और गोपनीय सैन्य क्षेत्र था। आम लोगों के लिए वहाँ प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित था। यहीं से हमारे अभियान की वास्तविक शुरुआत होने वाली थी। जब हम वहाँ पहुँचे, तो मैंने देखा कि दो बड़े सैन्य हेलीकॉप्टर पहले से ही उड़ान भरने के लिए तैयार खड़े थे। उनके विशाल रोटर धीरे-धीरे घूम रहे थे और हवा में धूल का गुबार उड़ रहा था। हम अपने सामान के साथ हेलीकॉप्टर की ओर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से किसी ने मेरा नाम पुकारा—
"देवेंद्र!"
मैंने मुड़कर देखा। मेरे सामने डॉ. के. एस. हूडा खड़े थे। मैं तुरंत उनके पास पहुँचा। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ थामा और कहा—
"आख़िरकार... तुमने अपनी टीम को तैयार कर ही लिया।"
मैं हल्की मुस्कान के साथ बोला—
"जी... लेकिन यह इतना आसान नहीं था। छह महीने लगातार खुदाई करने के बाद कोई भी दोबारा अभियान पर निकलना नहीं चाहता था।"
डॉ. हूडा ने सिर हिलाते हुए कहा—
"मैं समझ सकता हूँ। लेकिन सच कहूँ, देवेंद्र... इस मिशन के लिए मुझे तुमसे बेहतर कोई व्यक्ति नहीं मिला।"
मैं कुछ क्षण चुप रहा। फिर मैंने वह सवाल पूछ ही लिया, जो पूरी रात मेरे मन में घूमता रहा था।
"डॉ. साहब... आखिर कुंडाबाद में ऐसा क्या है कि वहाँ जाने वाला कोई भी व्यक्ति आज तक वापस नहीं लौटा?"
डॉ. हूडा के चेहरे पर गंभीरता छा गई। उन्होंने दूर पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा—
"काश... इसका जवाब मेरे पास होता।"
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद वे बोले—
"सच यह है कि आज तक कोई नहीं जानता कि वहाँ वास्तव में क्या हुआ था। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि तुम और तुम्हारी टीम इस रहस्य से पर्दा उठाओगे।"
उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी काले रंग की एक मोटी फाइल मेरी ओर बढ़ा दी।
"इस फाइल में कुंडाबाद से जुड़ी अब तक की पूरी जानकारी है। इसमें इलाके का नक्शा, पुराने सर्वे, उपग्रह चित्र और वे सभी रिपोर्टें हैं, जो वर्षों में इकट्ठी की गई हैं। अब यह सब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।"

