वर्जित वन: एक रहस्यमयी सफर
परिचय
ईश्वर की सबसे अद्भुत रचना—पृथ्वी। एक ऐसा संसार, जहाँ जीवन ने जन्म लिया, सभ्यताएँ बनीं, साम्राज्य उठे और समय के साथ इतिहास बनकर मिट गए। लेकिन...
अब इस पृथ्वी का अंत निकट है। एक ऐसी महाप्रलय, जिसकी कल्पना स्वयं मनुष्य ने कभी नहीं की। कहा जाता है कि सृष्टि की रचना के समय ब्रह्मांड में केवल जीवन ही नहीं, बल्कि प्रकाश और अंधकार—दोनों का जन्म हुआ था। प्रकाश के साथ सत्य, धर्म, करुणा, शांति और मानवता का उदय हुआ।
वहीं अंधकार के गर्भ से जन्मीं वे काली शक्तियाँ, जिनका अस्तित्व केवल विनाश, छल, पाप और मृत्यु के लिए था। तब से लेकर आज तक यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं हुआ। यह युद्ध हमेशा चलता रहा...
बस इसके साक्षी बदलते रहे। आज का मनुष्य स्वयं को पृथ्वी का सबसे शक्तिशाली प्राणी मानता है। विज्ञान और तकनीक के सहारे उसने समुद्र की गहराइयों को नापा, अंतरिक्ष की सीमाओं को चुनौती दी और धरती की परतों में दबी हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताओं को खोज निकाला। उसे लगता है कि वह इतिहास को पढ़ चुका है...
लेकिन सत्य यह है कि इतिहास का सबसे बड़ा अध्याय आज भी उससे छिपा हुआ है। वह नहीं जानता कि ब्रह्मांड के अंधकार में छिपी महाविनाशकारी शक्तियाँ एक बार फिर जाग चुकी हैं। वे धीरे-धीरे पृथ्वी की ओर बढ़ रही हैं। और शायद...
वे पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। उधर मनुष्य भी अपने अहंकार, स्वार्थ, हिंसा और अधर्म में इतना डूब चुका है कि उसे अपने विनाश के कदमों की आहट तक सुनाई नहीं दे रही। धरती पर सत्य कमज़ोर पड़ रहा है… मानवता टूट रही है… और अंधकार पहले से कहीं अधिक प्रबल होता जा रहा है।
इसी बीच एक ऐसा रहस्य फिर से जीवित होने वाला है, जिसे सदियों पहले समय ने स्वयं अपनी परतों में छिपा दिया था।
एक दिव्य छड़ी… जिसका निर्माण स्वर्ग में हुआ था। कहा जाता है कि उसमें इतनी शक्ति समाई हुई है कि वह केवल किसी राज्य या संसार का नहीं, बल्कि पूरे ब्रह्मांड का भाग्य बदल सकती है।
प्रथम महाविनाश के बाद पृथ्वी पर जीवन को फिर से जन्म लेने में लाखों वर्ष लगे थे। लेकिन इस बार...
यदि वह दिव्य छड़ी किसी के हाथ लग गई...
तो इतिहास स्वयं को दोहराएगा नहीं। इस बार निर्णय केवल एक क्षण में होगा।
या तो उसी शक्ति से पृथ्वी का नव-निर्माण होगा...
या फिर ऐसा महाविनाश, जिसके बाद जीवन को लौटने का अवसर भी नहीं मिलेगा।सबसे बड़ा प्रश्न केवल इतना है—
वह दिव्य छड़ी कहाँ है?... उसकी वास्तविक शक्ति क्या है?..
और...
वह किसके हाथों में पहुँचेगी?.. क्योंकि जिस दिन वह छड़ी अपने वास्तविक स्वामी तक पहुँच जाएगी...
उसी दिन तय होगा—
इस सृष्टि का भविष्य।
नव-निर्माण..
या फिर सम्पूर्ण विनाश।
अध्याय 1 – बली स्टेशन
भारत के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों के बीच बसा बली एक छोटा-सा, लेकिन बेहद खूबसूरत रेलवे स्टेशन था। यहाँ ज़िंदगी शहरों की भागदौड़ से कोसों दूर, अपनी धीमी और शांत रफ्तार से चलती थी। सुबह के ठीक सात बजे थे।
पहाड़ों के पीछे से उगता सूरज अपनी सुनहरी किरणें घाटी में बिखेर रहा था। हल्की-हल्की धुंध अब धीरे-धीरे छंट रही थी और ठंडी हवा देवदार के पेड़ों से टकराकर मधुर संगीत-सी गूंज रही थी। पूरा वातावरण इतना शांत था कि दूर किसी पक्षी की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
अचानक उस सन्नाटे को चीरती हुई एक तीखी रेल-सीटी गूँजी। कुछ ही क्षणों में एक लंबी एक्सप्रेस ट्रेन तेज़ रफ्तार से प्लेटफ़ॉर्म पर आकर रुकी। ब्रेकों की आवाज़ के साथ धुएँ का हल्का गुबार हवा में फैल गया।
दरवाज़े खुलते ही यात्री उतरने लगे। कोई अपने परिवार के साथ था, कोई जल्दी-जल्दी बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था, तो कोई अपने सामान को संभाल रहा था। इसी भीड़ के बीच एक व्यक्ति धीरे-धीरे ट्रेन से नीचे उतरा।
उसकी उम्र लगभग चालीस वर्ष रही होगी। उसने काले रंग का लंबा ओवरकोट पहन रखा था और उसके हाथों में दो बड़े चमड़े के बैग थे। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट थी और न ही कोई उत्साह—बस एक अजीब-सी गंभीरता थी।
प्लेटफ़ॉर्म पर कदम रखते ही उसने चारों ओर गहरी नज़र दौड़ाई, मानो वह यह सुनिश्चित कर रहा हो कि कोई उस पर नज़र तो नहीं रख रहा। कुछ पल बाद उसकी निगाह स्टेशन पर लगी बड़ी घड़ी पर गई।
समय—सुबह के ठीक 7:00 बजे।
उसने अपने दोनों बैग नीचे रखे और कोट की अंदरूनी जेब से एक पुरानी चाँदी की पॉकेट वॉच निकाली।
वह साधारण घड़ी नहीं थी। उसकी सतह पर कुछ अजीब प्रतीक उकेरे हुए थे, जो पहली नज़र में किसी प्राचीन भाषा के लगते थे। उसने घड़ी का ढक्कन खोला।
टिक... टिक... टिक...
घड़ी बिल्कुल स्टेशन की घड़ी के समय से मेल खा रही थी। उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ घड़ी बंद की और उसे वापस जेब में रख लिया। ऐसा लग रहा था मानो वह किसी तय समय का वर्षों से इंतज़ार कर रहा हो। अपने दोनों बैग उठाकर वह स्टेशन से बाहर निकल आया।
बाहर सड़क लगभग सुनसान थी। कुछ दुकानें अभी खुल रही थीं और चाय की एक दुकान से उठती भाप ठंडी हवा में घुल रही थी। वह टैक्सी की तलाश में इधर-उधर देखने लगा।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई—
"सर... टैक्सी चाहिए?"
उसने धीरे से मुड़कर देखा। करीब पचास वर्षीय एक टैक्सी चालक मुस्कुराते हुए उसके सामने खड़ा था।
"जी सर, कहाँ जाना है?" ड्राइवर ने विनम्रता से पूछा।
उस व्यक्ति ने बिना कोई भाव बदले उत्तर दिया—
"बी-2 ब्लॉक... हाउस नंबर 34।"
यह सुनते ही ड्राइवर के चेहरे की मुस्कान एक पल के लिए गायब हो गई। उसने उस व्यक्ति को कुछ क्षण तक ध्यान से देखा, फिर सामान्य बनने की कोशिश करते हुए बोला—
"जी... आइए। मैं आपको वहाँ छोड़ देता हूँ।"
दोनों टैक्सी में बैठ गए।
टैक्सी पहाड़ी रास्तों पर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। करीब पच्चीस मिनट बाद वह एक ट्रैफिक सिग्नल पर रुकी। सिग्नल का इंतज़ार करते हुए उस व्यक्ति ने खिड़की से बाहर देखा। सड़क के दोनों ओर बने आलीशान मकान किसी यूरोपीय पहाड़ी शहर का एहसास करा रहे थे। हर घर के सामने रंग-बिरंगे फूल खिले थे और लकड़ी की सुंदर बालकनियाँ सुबह की धूप में चमक रही थीं।
लेकिन उसकी नज़र किसी घर की सुंदरता पर नहीं थी। वह हर घर का नंबर ध्यान से पढ़ रहा था… मानो उसे किसी खास मकान की तलाश हो। सिग्नल हरा हुआ और टैक्सी फिर चल पड़ी। कुछ मिनट बाद टैक्सी एक शांत गली के मोड़ पर आकर रुक गई। ड्राइवर ने इंजन बंद किया। उसने धीरे से पीछे मुड़कर उस व्यक्ति की ओर देखा। इस बार उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी।
टैक्सी ड्राइवर ने गाड़ी रोकते हुए धीमे स्वर में बोला—
"सर, बी-2 ब्लॉक आ गया है। आप सामने वाली गली में सीधे चले जाइए। गली के आखिर में आपको हाउस नंबर 34 मिल जाएगा।"
यह सुनते ही उस व्यक्ति के चेहरे पर पहली बार हल्का-सा बदलाव आया। उसने बिना कुछ कहे अपनी नज़र उस मकान पर टिकाए रखी… मानो उसे पहले से पता हो कि वहाँ उसका इंतज़ार कौन कर रहा है।
उस व्यक्ति ने टैक्सी से उतरकर अपने दोनों बैग नीचे रखे, जेब से पैसे निकाले और ड्राइवर की ओर बढ़ाते हुए कहा,
"Thank you."
ड्राइवर ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया और टैक्सी वहाँ से चली गई। कुछ क्षण तक वह व्यक्ति वहीं खड़ा रहा। उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई। उसे महसूस हुआ कि आसपास बने लगभग सभी मकान एक ही नक्शे पर बने हुए थे। रंग, बनावट और ऊँचाई—सब कुछ लगभग एक जैसा था। यदि घरों के नंबर न लिखे होते, तो उन्हें पहचान पाना लगभग असंभव था।
वह टैक्सी ड्राइवर के बताए रास्ते पर आगे बढ़ गया। गली में प्रवेश करते ही उसे एक अजीब-सी खामोशी ने घेर लिया। सुबह के सात बजे होने के बावजूद वहाँ दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा था। न बच्चों की आवाज़, न किसी वाहन का शोर और न ही किसी घर से आती कोई हलचल।
यह सन्नाटा उसे कुछ अस्वाभाविक लगा। फिर भी उसने अपने कदम नहीं रोके और हाउस नंबर 34 की तलाश में आगे बढ़ता रहा। कुछ दूर जाने पर उसकी नज़र एक बूढ़ी महिला पर पड़ी। वह अपने घर के बाहर रखी एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बिल्कुल शांत बैठी थीं। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था और उनकी नज़रें सामने सड़क पर टिकी हुई थीं।
वह उनके पास पहुँचा और विनम्रता से बोला,
"माफ़ कीजिए... क्या आप मुझे हाउस नंबर 34 का रास्ता बता सकती हैं?"
बूढ़ी महिला ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसने सोचा कि शायद उन्होंने उसकी बात सुनी नहीं होगी। इसलिए वह थोड़ा और पास गया और दोबारा बोला,
"सुनिए... क्या आप मुझे हाउस नंबर 34 तक पहुँचने का रास्ता बता सकती हैं?"
फिर भी कोई जवाब नहीं मिला।
तभी घर के भीतर से लगभग बीस-बाईस वर्ष की एक युवती बाहर आई। उसने उस व्यक्ति की ओर देखते हुए शांत स्वर में कहा,
"माफ़ कीजिए, मेरी दादी माँ बीमार हैं। वे न तो सुन सकती हैं और न ही बोल पाती हैं। आप किससे मिलना चाहते हैं?"
उस व्यक्ति ने विनम्रता से उत्तर दिया,
"मैं यहाँ पहली बार आया हूँ। मुझे बी-2 ब्लॉक के हाउस नंबर 34 में जाना है। क्या आप मुझे उसका रास्ता बता सकती हैं?"
युवती ने गली की ओर इशारा करते हुए कहा,
"आप सीधे आगे चलते जाइए। गली के आखिर में एक हरे और पीले रंग का मकान दिखाई देगा। वही हाउस नंबर 34 है।"
"बहुत-बहुत धन्यवाद।" उस व्यक्ति ने मुस्कुराकर कहा और आगे बढ़ गया।
कुछ ही मिनटों बाद वह गली के अंतिम छोर पर पहुँच गया।
वहाँ सचमुच एक हरे और पीले रंग का पुराना मकान था।
लोहे के पुराने गेट पर जंग लगी हुई थी और उसके ऊपर एक धातु की नेम प्लेट लगी थी, जिस पर धूल की परत जमी हुई थी। उसने हाथ से धूल हटाई।
उस पर साफ़ लिखा था—
"हाउस नं. 34"
उसने गहरी साँस ली, अपने दोनों बैग दरवाज़े के पास रखे और डोरबेल का बटन दबा दिया।
टन... टन...
अंदर कोई हलचल नहीं हुई।
उसने कुछ क्षण इंतज़ार किया और फिर दोबारा घंटी बजाई।
टन... टन...
इस बार भी कोई जवाब नहीं मिला।
तीसरी बार उसने डोरबेल दबाई।
घंटी की आवाज़ पूरे घर में गूँज उठी।
मैं अभी-अभी अपने कमरे में बिस्तर से उठा ही था कि अचानक डोरबेल की लगातार बजती आवाज़ ने मेरा ध्यान खींच लिया। मैंने दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखा।
सुबह के ठीक 7:50 बजे थे।
इतनी सुबह मेरे घर कौन आ सकता था?
घंटी लगातार तीन-चार बार बज चुकी थी।
फिर अचानक...
सब कुछ शांत हो गया।
डोरबेल की आवाज़ सुनकर मैं अनमने ढंग से अपने बिस्तर से उठा। सुबह-सुबह नींद पूरी नहीं हुई थी, इसलिए शरीर में भारीपन और चेहरे पर आलस साफ़ झलक रहा था। धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए मैं मुख्य दरवाज़े तक पहुँचा।
जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, सामने खड़ा व्यक्ति मुझे बिल्कुल अपरिचित लगा।
उसकी उम्र लगभग चालीस से पैंतालीस वर्ष के बीच रही होगी। कद लगभग पाँच फीट, गेहुँआ रंग, चेहरे पर हल्की दाढ़ी और आँखों में अजीब-सी गंभीरता थी। उसने काली जैकेट के साथ सफेद शर्ट, काली पैंट और चमकते हुए काले जूते पहन रखे थे। उसके पास दो बड़े बैग रखे थे।
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। मैं कुछ पूछ पाता, उससे पहले ही उसने मेरी ओर देखते हुए कहा,
"क्या आप अशोक जोशी हैं?"
मैंने हल्के आश्चर्य से उत्तर दिया,
"जी... मैं ही अशोक जोशी हूँ। कहिए, क्या बात है?"
उस व्यक्ति ने एक गहरी साँस ली, मानो वह कोई कठिन बात कहने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा हो।
फिर उसने धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा,
"मेरा नाम उमेश खन्ना है। मैं आपके पिताजी के साथ काम करता था। मुझे बेहद अफसोस के साथ आपको एक दुखद समाचार देना पड़ रहा है।"
मेरे चेहरे की मुस्कान उसी क्षण गायब हो गई।
वह आगे बोला,
"दो दिन पहले हम एक प्राचीन गुफा में खुदाई कर रहे थे। अचानक गुफा की छत का एक बड़ा हिस्सा भरभराकर गिर पड़ा। आपके पिताजी उसी मलबे के नीचे दब गए। हमने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन भारी चट्टानों और लगातार गिरते पत्थरों के कारण वहाँ तक पहुँचना संभव नहीं हो सका। बचाव दल अभी भी मलबा हटाने में लगा है। हमें उम्मीद है कि एक-दो दिन के भीतर उनका पार्थिव शरीर बाहर निकाल लिया जाएगा।"
कुछ क्षण रुककर उसने अपने साथ लाए बैग मेरी ओर बढ़ा दिए।
"ये उनका सामान है... उन्होंने आखिरी बार इसी अभियान में इसका इस्तेमाल किया था।"
उसकी बात समाप्त होते ही ऐसा लगा जैसे मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई हो। मेरे कानों में उसकी आवाज़ गूँज रही थी, लेकिन मेरा मन उस सच्चाई को स्वीकार करने से इंकार कर रहा था।
पिताजी... नहीं रहे...?
यह विचार ही मेरे भीतर तूफ़ान की तरह उठ रहा था। मेरी आँखें अनायास ही नम हो गईं। गला इतना भर आया कि शब्द भी मुश्किल से निकल रहे थे। मैंने काँपते हाथों से बैग लेते हुए बस इतना कहा,
"जी... धन्यवाद।"
उमेश खन्ना कुछ पल तक मेरी ओर देखते रहे। शायद उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस समय मुझे कैसे सांत्वना दें। फिर उन्होंने चुपचाप सिर झुकाया और वहाँ से चले गए। दरवाज़ा बंद करने के बाद मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा। पूरा घर अचानक मुझे बेहद सूना और खाली लगने लगा। कुछ मिनट बाद मैं पिताजी का सामान लेकर उनके कमरे में पहुँचा।
वह कमरा आज भी वैसा ही था, जैसा उन्होंने आखिरी बार छोड़कर गए थे। मेज़ पर खुली हुई किताबें, दीवारों पर लगे पुराने नक्शे, लकड़ी की अलमारियों में रखी प्राचीन वस्तुएँ और कमरे में फैली पुरानी किताबों की हल्की-सी महक... हर चीज़ उनकी मौजूदगी का एहसास करा रही थी। मैंने धीरे से बैग खोला और एक-एक करके उसमें रखा सामान बाहर निकालने लगा।
मेरे पिताजी, प्रोफेसर देवेंद्र जोशी, देश के सबसे प्रसिद्ध पुरातत्व खोजकर्ताओं में से एक थे। उनका जीवन प्राचीन सभ्यताओं, भूली-बिसरी संस्कृतियों और रहस्यमयी खजानों की खोज को समर्पित था। उन्होंने अपने जीवन में न जाने कितनी दुर्लभ और ऐतिहासिक वस्तुओं की खोज की थी। उनकी खोजों ने इतिहास की कई अनसुलझी पहेलियों को सुलझाया था। देश-विदेश के समाचार पत्र, वैज्ञानिक पत्रिकाएँ और इतिहास से जुड़ी मैगज़ीनें अक्सर उनकी उपलब्धियों को अपने मुखपृष्ठ पर प्रकाशित करती थीं। उनकी सफलता के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था। इतिहास की दुनिया में उनका नाम एक किंवदंती बन चुका था। लोग कहते थे—
"अगर दुनिया में कोई व्यक्ति हजारों साल पुरानी किसी खोई हुई वस्तु का सुराग ढूँढ़ सकता है, तो वह सिर्फ प्रोफेसर देवेंद्र जोशी हैं।"
उनकी मेहनत और सफलता ने हमारे परिवार को आर्थिक रूप से इतना सक्षम बना दिया था कि मुझे कभी नौकरी करने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई।
उनके जीवन और खोजों पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं। कुछ प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं ने उन पर वृत्तचित्र और लघु फ़िल्में भी बनाई थीं। लेकिन दुनिया उन्हें जितना एक महान खोजकर्ता मानती थी, मेरे लिए वे उससे कहीं बढ़कर थे। वे मेरे पिता, मेरे शिक्षक और मेरे सबसे अच्छे मित्र थे। जब भी वे किसी अभियान से लौटते, सबसे पहले मुझे अपनी नई खोज दिखाई करते। वे घंटों बैठकर उस वस्तु का इतिहास, उसकी विशेषताएँ और उसे खोजने की पूरी कहानी सुनाते। फिर मुस्कुराकर कहते,
"अशोक... किसी भी खजाने को खोजने से पहले इतिहास को समझना सीखो। खजाने नक्शों से नहीं, धैर्य और ज्ञान से मिलते हैं।"
उनकी यही बातें बचपन से मेरे मन में बस गई थीं। पिताजी एक आदत कभी नहीं छोड़ते थे। वे हर अभियान का पूरा विवरण अपनी निजी डायरी में लिखा करते थे। कहाँ गए... क्या मिला... किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा... और आगे कहाँ जाना है—सब कुछ।
उनकी डायरी केवल एक नोटबुक नहीं थी, बल्कि उनके जीवन की पूरी यात्रा का दस्तावेज़ थी। मैंने हमेशा एक बात महसूस की थी। वे कभी एक जगह ज़्यादा दिन नहीं रुकते थे। एक अभियान पूरा होते ही वे बिना आराम किए दूसरे अभियान की तैयारी शुरू कर देते। उन्हें देखकर अक्सर लगता था… मानो वे किसी ऐसी रहस्यमयी चीज़ की तलाश में हों, जिसके बारे में दुनिया को अभी तक कोई जानकारी ही न हो।
मैं पिताजी के कमरे में रखे बड़े लकड़ी के बक्से के सामने बैठा था। धीरे-धीरे मैं उसमें रखा सामान बाहर निकालने लगा। बक्से में उनके कपड़े, जूते, खुदाई में इस्तेमाल होने वाले कुछ औज़ार और कई दुर्लभ प्राचीन वस्तुएँ रखी थीं। हर वस्तु को हाथ में लेते ही उनसे जुड़ी कोई-न-कोई याद मेरे मन में ताज़ा हो जाती। मैं एक-एक वस्तु को ध्यान से देख ही रहा था कि तभी मेरी नज़र उन प्राचीन वस्तुओं के नीचे दबी एक काली चमड़े की डायरी पर पड़ी। मैंने उसे सावधानी से बाहर निकाला। डायरी के ऊपर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"प्रोफेसर देवेंद्र जोशी"
मैं कुछ पल तक उसे देखता ही रह गया। अजीब बात यह थी कि मैंने अपने पूरे जीवन में पिताजी के हाथों में यह डायरी कभी नहीं देखी थी। वे अपनी हर यात्रा में एक भूरी डायरी साथ रखते थे, लेकिन यह काली डायरी मेरे लिए बिल्कुल नई थी। मेरे मन में उत्सुकता और बढ़ गई। मैं डायरी लेकर अपने कमरे में आ गया। कमरे में पहुँचकर मैंने दरवाज़ा बंद किया, कुर्सी खींचकर मेज़ के सामने बैठ गया और धीरे से डायरी खोली। पहला पन्ना खुलते ही मेरी नज़र उस पर लिखी एक छोटी-सी पंक्ति पर पड़ी।
वह किसी ऐसी प्राचीन भाषा में लिखी थी जिसे मैं पढ़ नहीं सकता था। उस भाषा के अक्षर किसी साधारण लिपि जैसे नहीं थे। वे किसी रहस्यमयी प्रतीक की तरह दिखाई दे रहे थे। मैंने उसे पढ़ने की कोशिश की, लेकिन एक भी शब्द समझ नहीं आया। मैंने सोचा कि शायद आगे के पन्नों में इसका अर्थ मिल जाए। मैंने दूसरा पन्ना पलटा। और अगले ही पल मैं ठिठक गया। पूरे पन्ने पर एक युवती का अद्भुत स्केच बना हुआ था।
इतना जीवंत कि पहली नज़र में वह किसी तस्वीर जैसा प्रतीत हो रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, लंबे काले बाल, चेहरे पर अद्भुत तेज और होंठों पर हल्की-सी मुस्कान...
ऐसा सौंदर्य मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैं तुरंत समझ गया कि यह स्केच पिताजी ने ही बनाया है। क्योंकि वे अपने हर स्केच के दाएँ ऊपरी कोने में अपने नाम का एक छोटा-सा विशेष चिन्ह बनाया करते थे। वही चिन्ह इस चित्र पर भी मौजूद था। मैं उस चित्र को देर तक देखता रहा। मेरे मन में एक ही प्रश्न बार-बार उठ रहा था—
"यह लड़की कौन है...?"
क्या वह सचमुच इस दुनिया की थी? या फिर किसी प्राचीन कथा का हिस्सा? और सबसे बड़ा सवाल...
पिताजी उससे कब और कहाँ मिले थे?
इन सवालों का उत्तर जानने की उत्सुकता अब और बढ़ चुकी थी। मैंने तुरंत अगला पन्ना पलटा। तीसरे पन्ने पर किसी अत्यंत प्राचीन स्थान का विस्तृत वर्णन लिखा था। शब्दों से ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह स्थान किसी भूले-बिसरे इतिहास का हिस्सा हो। मैं आगे पढ़ता गया। कुछ पन्नों बाद एक ऐसे रहस्यमयी जंगल का उल्लेख मिला, जो कभी धरती का सबसे सुंदर वन माना जाता था। वहाँ हमेशा हरियाली रहती थी, दुर्लभ जीव-जंतु निवास करते थे और कहा जाता था कि देवताओं का आशीर्वाद उस भूमि पर सदैव बना रहता था।
लेकिन एक दिन… वह पूरा जंगल अचानक वीरान हो गया। पिताजी ने लिखा था कि उस विनाश के पीछे अंधकार लोक का एक शक्तिशाली पिशाच था। एक ऐसा शैतान, जिसका उद्देश्य केवल विनाश था। वह देवताओं का अस्तित्व मिटाकर पूरी पृथ्वी पर अंधकार का साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।
ऐसा साम्राज्य, जहाँ न प्रकाश हो...
न आशा...
और न ही जीवन।
डायरी में आगे लिखा था—
"सृष्टि की शुरुआत से ही प्रकाश और अंधकार, ईश्वर और शैतान के बीच संघर्ष चलता आया है। यह युद्ध कभी समाप्त नहीं हुआ... केवल हमारी आँखों से ओझल हो गया।"
यह पढ़कर मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैंने आगे पढ़ना जारी रखा। कुछ पन्नों बाद एक नाम बार-बार मेरी नज़रों के सामने आने लगा—
राजकुमारी निहारिका।
पिताजी ने लिखा था कि वह केवल एक राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि अद्भुत सौंदर्य, साहस और दिव्य शक्तियों की स्वामिनी थीं।
कहा जाता था कि उनके समान सुंदर स्त्री पूरे राज्य में कोई नहीं थी। लेकिन पिताजी ने उनके सौंदर्य से अधिक उनकी नियति का वर्णन किया था। मानो उनका संबंध किसी बहुत बड़े रहस्य से जुड़ा हो। मेरी धड़कनें तेज़ हो चुकी थीं। मैंने तेजी से कुछ और पन्ने पलटे। अब डायरी में एक ऐसी वस्तु का उल्लेख था, जिसे पढ़कर मेरे हाथ काँप उठे। वह थी...
एक दिव्य जादुई छड़ी।
पिताजी के अनुसार, सदियों पहले यह छड़ी स्वर्ग से धरती पर गिरी थी और उसके बाद हमेशा के लिए कहीं खो गई।
किंवदंतियों के अनुसार, उस छड़ी में ऐसी शक्ति थी जो पूरी सृष्टि का संतुलन बदल सकती थी। इसी छड़ी को पाने के लिए ईश्वर की दिव्य शक्तियों और अंधकार लोक के शैतानों के बीच एक भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध समाप्त हो गया...
लेकिन वह जादुई छड़ी किसी को नहीं मिली।
वह धरती पर कहीं छिप गई।
और शायद...
आज भी वहीं है।
डायरी के अंतिम शब्दों ने मेरी रूह तक हिला दी।
"जिस दिन यह छड़ी अंधकार के स्वामी के हाथ लग जाएगी, उसी दिन मानव सभ्यता का अंत निश्चित होगा। पृथ्वी पर फिर से अंधकार का शासन होगा। देवताओं का अस्तित्व मिट जाएगा और मनुष्य केवल इतिहास बनकर रह जाएगा।"
मैंने धीरे-धीरे डायरी बंद कर दी। कमरे में गहरा सन्नाटा था। मेरे मन में केवल एक ही प्रश्न गूँज रहा था—
क्या पिताजी केवल इतिहास की खोज कर रहे थे...
या फिर वे उस जादुई छड़ी के सबसे बड़े रहस्य तक पहुँच चुके थे?
मैंने डायरी के कुछ और पन्ने आगे पलटे। इस बार पिताजी ने जो लिखा था, उसे पढ़कर मेरी उत्सुकता और बढ़ गई।
उन्होंने लिखा था—
"मैंने जादुई छड़ी के बारे में किसी को भी कुछ नहीं बताया। मुझे डर था कि यदि इसकी भनक किसी गलत व्यक्ति को लग गई, तो पूरी दुनिया खतरे में पड़ सकती है। इसलिए मैंने अकेले ही इस रहस्य की तह तक पहुँचने का निर्णय लिया।"
डायरी में आगे लिखा था कि उन्होंने वर्षों तक प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष, ऐतिहासिक ग्रंथ, मंदिरों के शिलालेख, गुफाओं की दीवारों पर बने चित्र और लोककथाओं का गहन अध्ययन किया। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से मिली छोटी-से-छोटी वस्तु भी उनके लिए एक सुराग थी। वे मानते थे कि इतिहास कभी पूरी सच्चाई नहीं बताता। वह अपने रहस्यों को छोटी-छोटी कहानियों, प्रतीकों और भूली-बिसरी वस्तुओं में छिपाकर रखता है। धीरे-धीरे उन बिखरे हुए सुरागों को जोड़ते हुए उन्हें एक चौंकाने वाली जानकारी मिली।
डायरी में लिखा था—
"जादुई छड़ी का निर्माण पृथ्वी पर नहीं, बल्कि स्वर्ग लोक में हुआ था।"
यह कोई साधारण अस्त्र नहीं था। इसे स्वर्ग के सबसे शक्तिशाली शासक राजा बेरो ने स्वयं निर्मित किया था। उस छड़ी में ऐसी दिव्य शक्ति थी, जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने में सक्षम थी। लेकिन इसी शक्ति पर अंधकार के स्वामी की नज़र पड़ गई। डायरी के अनुसार, शैतान ने अपनी विशाल और भयानक सेना के साथ स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। वह युद्ध इतना भीषण था कि स्वर्ग की भूमि तक काँप उठी। चारों ओर विनाश ही विनाश था। देवताओं की सेनाएँ एक-एक करके पराजित होने लगीं और अंधकार की सेना स्वर्ग के केंद्र तक पहुँच गई। राजा बेरो समझ चुके थे कि यदि जादुई छड़ी शैतान के हाथ लग गई, तो केवल स्वर्ग ही नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि विनाश की आग में जल उठेगी। अंतिम क्षणों में उन्होंने एक कठिन निर्णय लिया। उन्होंने अपनी समस्त दिव्य शक्ति एकत्र की और उस जादुई छड़ी को स्वर्ग से बहुत दूर... पृथ्वी की ओर फेंक दिया।
छड़ी आकाश को चीरती हुई कहीं धरती पर आ गिरी...
लेकिन उसके बाद वह कहाँ गई...
यह कोई नहीं जान सका।
डायरी में लिखा अंतिम वाक्य था—
"जिस दिन यह छड़ी फिर से मिलेगी, उसी दिन सृष्टि का भविष्य तय होगा।"
मैंने उत्सुकता से अगला पन्ना पलटा।
लेकिन वह पूरी तरह खाली था।
मैंने दूसरा पन्ना देखा...
वह भी कोरा था।
फिर तीसरा...
चौथा...
पाँचवाँ...
पूरी डायरी के आगे के सभी पन्ने बिल्कुल खाली थे। मैं कुछ क्षण तक उन कोरे पन्नों को देखता रहा।
मेरे मन में एक ही सवाल घूम रहा था—
क्या पिताजी अपनी बात पूरी नहीं लिख पाए... या फिर उन्होंने जानबूझकर बाकी बातें छिपा दी थीं?
निराश होकर मैंने डायरी बंद कर दी। मैं उसे वापस पिताजी के बक्से में रखने के लिए उनके कमरे में गया। बक्सा अभी भी खुला हुआ था। मैंने डायरी अंदर रखी और बिखरे हुए कपड़ों को ठीक से जमाने लगा।
तभी...
मेरे हाथ पिताजी की एक पुरानी पैंट की जेब से टकराए। जेब में कुछ मुड़े-तुड़े कागज़ रखे हुए थे। मैंने उन्हें सावधानी से बाहर निकाला। कागज़ काफी पुराने थे। उनके किनारे पीले पड़ चुके थे और ऐसा लग रहा था मानो उन्हें वर्षों से किसी ने छुआ ही न हो। मैंने धीरे-धीरे उन्हें खोला।
उन पर वही लिखावट थी… जिसे मैं बचपन से पहचानता था।
वह पिताजी की ही लिखावट थी। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि उन कागज़ों पर वही कहानी आगे लिखी हुई थी, जो डायरी में अचानक अधूरी रह गई थी। मेरी धड़कन तेज़ हो गई। मैंने तुरंत बक्से से काली डायरी फिर से बाहर निकाली। इस बार मैं उसे केवल पढ़ना नहीं चाहता था…
मैं उसके हर शब्द को समझना चाहता था। मैं फर्श पर ही बैठ गया। डायरी को अपने सामने रखा, वे कागज़ उसके बगल में रखे और गहरी साँस लेते हुए पहला पन्ना खोला।
इस बार मैंने निश्चय कर लिया था—
मैं डायरी का एक भी शब्द छोड़े बिना, शुरू से अंत तक पढ़ूँगा।
क्योंकि अब मुझे यकीन हो चुका था...
पिताजी की मृत्यु केवल एक दुर्घटना नहीं थी।
उस डायरी में ऐसा रहस्य छिपा था, जिसके लिए शायद किसी ने उनकी जान ले ली थी।
दिन – सोमवार
तारीख – 8 अक्टूबर 1962
डायरी – प्रोफेसर देवेंद्र जोशी
"शाम के लगभग 6:15 बजे थे।"
मैं अपनी खोजी टीम के साथ कैंप के बाहर बैठा था। दिनभर की खुदाई के बाद सभी लोग थके हुए थे। ठंडी हवा चल रही थी और हम बातचीत करते हुए बीयर की चुस्कियाँ ले रहे थे। तभी कैंप में रखा टेलीविजन अचानक एक विशेष समाचार प्रसारित करने लगा। मेरी नज़र अनायास ही स्क्रीन पर टिक गई।
टीवी एंकर:
"नमस्कार। आज हम आपको उत्तर भारत में पिछले सप्ताह हुई एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खुदाई में मिली दुर्लभ प्राचीन वस्तुओं के बारे में बताने जा रहे हैं। इन वस्तुओं का ऐतिहासिक महत्व क्या है, इसे समझने के लिए हमारे साथ मौजूद हैं देश के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. के. एस. हूडा।"
"डॉ. हूडा, सबसे पहले आप हमें बताइए कि इन खोजों को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?"
डॉ. के. एस. हूडा:
"खुदाई में प्राप्त सभी वस्तुएँ अत्यंत दुर्लभ हैं। प्रारंभिक जाँच से यह स्पष्ट हुआ है कि ये कई सदियों पुरानी हैं, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इनका इतिहास अधूरा है।"
"इनमें से प्रत्येक वस्तु किसी बड़े रहस्य का केवल एक हिस्सा प्रतीत होती है। मानो किसी ने पूरी कहानी को अलग-अलग स्थानों पर बिखेर दिया हो।"
"ऐसी ही कुछ वस्तुएँ हमें छह महीने पहले और उससे भी पहले एक अन्य अभियान में मिली थीं। जब हमने उन सभी खोजों की तुलना की, तो एक समानता सामने आई। हर सुराग हमें उत्तर के एक प्राचीन स्थान—कुंडाबाद—की ओर ले जाता है।"
"कुंडाबाद, खुदाई स्थल से कुछ मील की दूरी पर स्थित है। हमें विश्वास है कि इन सभी वस्तुओं का वास्तविक इतिहास वहीं छिपा हुआ है।"
उन्होंने कुछ क्षण रुककर गंभीर स्वर में आगे कहा—
"हमने वहाँ कई बार खोजी दल भेजे। खुदाई भी शुरू हुई, लेकिन एक अभियान के दौरान अचानक पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गिरा। पूरी टीम उसी मलबे में दब गई।"
"दुर्भाग्यवश... आज तक उन लोगों के शव भी नहीं मिल सके।"
स्टूडियो कुछ पल के लिए शांत हो गया। फिर एंकर ने धीमे स्वर में कहा—
"तो आपने सुना... इन प्राचीन वस्तुओं का वास्तविक इतिहास अभी भी रहस्य बना हुआ है। जब तक कुंडाबाद का रहस्य नहीं सुलझता, तब तक इन खोजों की पूरी कहानी सामने नहीं आ सकती।"
"अब बढ़ते हैं आज के खेल समाचारों की ओर..."
मैंने रिमोट उठाकर टेलीविजन बंद कर दिया। लेकिन मेरा मन अब कहीं और था। मेरी आँखों के सामने बार-बार केवल एक ही नाम घूम रहा था—
कुंडाबाद।
यदि डॉ. हूडा की बात सही थी...
तो इसका अर्थ साफ़ था।
अब तक हमने केवल कहानी के बिखरे हुए टुकड़े खोजे थे। असल रहस्य...
अभी भी कुंडाबाद की धरती के नीचे दफ़्न था। मैं इन्हीं विचारों में खोया हुआ था कि तभी अचानक मेज़ पर रखा टेलीफोन बज उठा।
ट्रिन... ट्रिन... ट्रिन...
मैंने तुरंत रिसीवर उठाया।
"हेलो..."
दूसरी ओर से परिचित आवाज़ आई।,br>
"देवेंद्र, टीवी पर खबर देखी?"
आवाज़ सुनते ही मैं पहचान गया।
वह डॉ. के. एस. हूडा थे।
मैंने बिना देर किए पूछा,
"जी, डॉ. साहब। लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही। आपने कहा कि इन वस्तुओं की कहानी अधूरी है... आपका मतलब क्या है?"
कुछ क्षण तक फोन के दूसरी ओर सन्नाटा छाया रहा।
फिर डॉ. हूडा ने बेहद धीमे और गंभीर स्वर में कहा—
"देवेंद्र... जो बात मैं अब तुम्हें बताने जा रहा हूँ, वह आज तक मैंने किसी से नहीं कही।"
मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं। मैं समझ गया...
अब जो सुनने वाला था, वही शायद इस पूरे रहस्य की पहली असली कड़ी थी।
फोन के दूसरी ओर से डॉ. के. एस. हूडा की गंभीर आवाज़ सुनाई दी—
"देवेंद्र, अब तक जो भी प्राचीन वस्तुएँ हमें मिली हैं, वे केवल उस रहस्य के छोटे-छोटे टुकड़े हैं। पूरी कहानी... पूरी सच्चाई... आज भी कुंडाबाद की धरती के नीचे दबी हुई है।"
उन्होंने कुछ क्षण रुककर आगे कहा—
"मैं चाहता हूँ कि तुम अपनी पूरी टीम के साथ तुरंत कुंडाबाद जाओ और इस अधूरी कहानी को पूरा करो। इस अभियान के लिए जितने संसाधनों की आवश्यकता होगी, उनकी व्यवस्था मेरी ओर से की जाएगी।"
फिर उनका स्वर और गंभीर हो गया।
"लेकिन एक बात हमेशा याद रखना, देवेंद्र..."
"जहाँ तुम जा रहे हो, वहाँ ज़िंदा रहना ही सबसे बड़ी चुनौती है। वहाँ न रहने की कोई व्यवस्था है, न संचार का कोई साधन और न ही यह निश्चित है कि हर व्यक्ति वापस लौट पाएगा। इसलिए अपनी टीम का चुनाव बहुत सोच-समझकर करना।"
एक लंबी साँस लेने के बाद उन्होंने कहा—
"कल सुबह मुझसे मिलो... फिर हम आगे की योजना बनाएँगे।"
इतना कहकर डॉ. हूडा ने फोन काट दिया। मैं कुछ क्षण तक रिसीवर हाथ में लिए खड़ा रहा। मेरे मन में एक ही प्रश्न बार-बार घूम रहा था—
आख़िर कुंडाबाद में ऐसा क्या छिपा था... जहाँ जाने वाले लोग कभी लौटकर नहीं आए?
मैं अभी इसी सोच में डूबा था कि मेरी टीम का एक सदस्य मेरे पास आया। उसने मेरे चेहरे की ओर देखते हुए पूछा—
"सर, सब ठीक है? आप कुछ परेशान लग रहे हैं।"
मैंने उसकी ओर देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"एक अच्छी खबर है... और एक बुरी खबर भी।"
वह हँसते हुए बोला—
"तो फिर दोनों खबरें एक साथ ही बता दीजिए।"
मैंने सभी साथियों को अपने पास बुलाया। कुछ ही देर में पूरी टीम मेरे सामने खड़ी थी। मैंने सबकी ओर देखते हुए कहा—
"दोस्तों... मेरे पास आप सबके लिए एक अच्छी खबर है और एक बुरी खबर।"
भीड़ में से किसी ने मुस्कुराते हुए पूछा—
"पहले अच्छी खबर सुनाइए, सर।"
मैंने कहा—
"अच्छी खबर यह है कि हमें देश के सबसे रहस्यमयी पुरातात्विक स्थल—कुंडाबाद—में खुदाई करने की ज़िम्मेदारी मिली है।"
मेरी बात सुनते ही सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। मैंने आगे कहा—
"और बुरी खबर..."
"...हमें कल सुबह ही वहाँ के लिए रवाना होना होगा।"
पूरा माहौल अचानक शांत हो गया। मैं समझ सकता था कि कोई भी खुश क्यों नहीं था। हम सभी छह महीने तक लगातार कठिन खुदाई करके अभी-अभी लौटे थे। हर व्यक्ति अपने परिवार से मिलने के लिए उत्सुक था। ऐसे समय में फिर से एक नए और उससे भी अधिक खतरनाक अभियान पर निकलना किसी के लिए आसान नहीं था। कुछ क्षण तक कोई कुछ नहीं बोला। मैंने सबकी आँखों में झाँकते हुए कहा—
"मैं जानता हूँ कि आप सब थक चुके हैं। मैं भी अपने परिवार के पास जाना चाहता हूँ। लेकिन यह अवसर शायद जीवन में केवल एक बार मिलता है।"
मैं धीरे-धीरे उनके बीच चलता हुआ बोला—
"हमने अपने जीवन में न जाने कितने प्राचीन खजाने खोजे हैं। हमने इतिहास को समझा है... लेकिन क्या हमने कभी इतिहास बनाया है?"
सभी लोग चुपचाप मेरी बात सुन रहे थे। मैंने आगे कहा—
"कुंडाबाद केवल एक खुदाई नहीं है। यह उस अधूरी कहानी को पूरा करने का अवसर है, जिसे सदियों से कोई पूरा नहीं कर पाया।"
"यदि हम सफल हुए... तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल हमारी खोज को नहीं, बल्कि हमारे नाम को भी इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी।"
मैंने पास रखी बीयर की बोतल उठाई और उसे आसमान की ओर ऊँचा करते हुए पूरे जोश से कहा—
"तो बताइए..."
"क्या आप लोग इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए अमर करना चाहते हैं?"
कुछ क्षण तक सन्नाटा छाया रहा। फिर अचानक भीड़ में से एक आवाज़ गूँजी—
"मैं तैयार हूँ, सर!"
उसके बाद दूसरी आवाज़ आई—
"मैं भी!"
फिर तीसरी...
और देखते ही देखते पूरी टीम एक साथ उत्साह से चिल्ला उठी—
"हम सब आपके साथ हैं!"
उनकी गूँजती हुई आवाज़ पूरे कैंप में फैल गई। उसी क्षण मुझे विश्वास हो गया...
कुंडाबाद का सफर अब शुरू हो चुका था। लेकिन हममें से किसी को भी यह अंदाज़ा नहीं था कि यह अभियान केवल एक पुरातात्विक खोज नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी की सबसे खतरनाक यात्रा बनने वाला था।
अगले ही पल पूरी टीम उत्साह से एक साथ चिल्ला उठी।
"हम तैयार हैं!"
अपने साथियों के चेहरे पर वही जोश देखकर मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई। मुझे पता था कि इस मिशन को मैं अकेले कभी पूरा नहीं कर सकता था। मेरी सबसे बड़ी ताकत मेरी टीम थी।लेकिन उस खुशी के बावजूद, मेरे मन के किसी कोने में एक अजीब-सी बेचैनी लगातार जन्म ले रही थी।
ऐसा लग रहा था...
मानो हम सब अनजाने में किसी ऐसे सफ़र पर निकलने वाले हों, जहाँ से लौटकर आना शायद हर किसी की किस्मत में न लिखा हो। फिर भी मैंने उस एहसास को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। मैं हमेशा से अपनी ज़िंदगी में कुछ ऐसा करना चाहता था, जो साधारण उपलब्धियों से कहीं बड़ा हो।
मैं केवल प्राचीन वस्तुएँ नहीं खोजता था...
मैं इतिहास के उन रहस्यों को ढूँढ़ना चाहता था, जिन्हें समय ने सदियों से अपने भीतर छिपाकर रखा था। मेरा हमेशा से एक ही विश्वास रहा है—
"यदि किसी लक्ष्य को पाने का इरादा सच्चा हो, तो देर भले ही लगे, लेकिन मंज़िल एक दिन रास्ता ज़रूर दिखा देती है।"
अगला दिन
अगली सुबह मैं अपनी पूरी टीम के साथ तुग़लई पहुँच गया। तुग़लई एक बेहद सुनसान और गोपनीय सैन्य क्षेत्र था। आम लोगों के लिए वहाँ प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित था। यहीं से हमारे अभियान की वास्तविक शुरुआत होने वाली थी। जब हम वहाँ पहुँचे, तो मैंने देखा कि दो बड़े सैन्य हेलीकॉप्टर पहले से ही उड़ान भरने के लिए तैयार खड़े थे। उनके विशाल रोटर धीरे-धीरे घूम रहे थे और हवा में धूल का गुबार उड़ रहा था। हम अपने सामान के साथ हेलीकॉप्टर की ओर बढ़ ही रहे थे कि पीछे से किसी ने मेरा नाम पुकारा—
"देवेंद्र!"
मैंने मुड़कर देखा। मेरे सामने डॉ. के. एस. हूडा खड़े थे। मैं तुरंत उनके पास पहुँचा। उन्होंने मुस्कुराते हुए मेरा हाथ थामा और कहा—
"आख़िरकार... तुमने अपनी टीम को तैयार कर ही लिया।"
मैं हल्की मुस्कान के साथ बोला—
"जी... लेकिन यह इतना आसान नहीं था। छह महीने लगातार खुदाई करने के बाद कोई भी दोबारा अभियान पर निकलना नहीं चाहता था।"
डॉ. हूडा ने सिर हिलाते हुए कहा—
"मैं समझ सकता हूँ। लेकिन सच कहूँ, देवेंद्र... इस मिशन के लिए मुझे तुमसे बेहतर कोई व्यक्ति नहीं मिला।"
मैं कुछ क्षण चुप रहा। फिर मैंने वह सवाल पूछ ही लिया, जो पूरी रात मेरे मन में घूमता रहा था।
"डॉ. साहब... आखिर कुंडाबाद में ऐसा क्या है कि वहाँ जाने वाला कोई भी व्यक्ति आज तक वापस नहीं लौटा?"
डॉ. हूडा के चेहरे पर गंभीरता छा गई। उन्होंने दूर पहाड़ों की ओर देखते हुए कहा—
"काश... इसका जवाब मेरे पास होता।"
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद वे बोले—
"सच यह है कि आज तक कोई नहीं जानता कि वहाँ वास्तव में क्या हुआ था। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि तुम और तुम्हारी टीम इस रहस्य से पर्दा उठाओगे।"
उन्होंने अपने हाथ में पकड़ी काले रंग की एक मोटी फाइल मेरी ओर बढ़ा दी।
"इस फाइल में कुंडाबाद से जुड़ी अब तक की पूरी जानकारी है। इसमें इलाके का नक्शा, पुराने सर्वे, उपग्रह चित्र और वे सभी रिपोर्टें हैं, जो वर्षों में इकट्ठी की गई हैं। अब यह सब तुम्हारी ज़िम्मेदारी है।"
मैंने फाइल संभालकर अपने बैग में रख ली। डॉ. हूडा ने हेलीकॉप्टर की ओर इशारा करते हुए आगे कहा—
"ये हेलीकॉप्टर तुम्हें कुंडाबाद के सबसे निकट सुरक्षित स्थान तक छोड़ेंगे। उसके बाद वे तुरंत वापस लौट आएँगे।"
"वहाँ पहुँचने के बाद सबसे पहला काम होगा—अपना बेस कैंप स्थापित करना। किसी भी तरह की खुदाई शुरू करने से पहले पूरे इलाके का निरीक्षण करना। जल्दबाज़ी मत करना।"
फिर उनका स्वर पहले से भी अधिक गंभीर हो गया।
"और एक बात... हेलीकॉप्टर के वापस लौटते ही हमारा संपर्क लगभग समाप्त हो जाएगा।"
मैंने आश्चर्य से पूछा—
"क्यों?"
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा—
"क्योंकि यह केवल एक पुरातात्विक अभियान नहीं है... यह एक अत्यंत गोपनीय सरकारी मिशन है।"
उन्होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई, मानो यह सुनिश्चित कर रहे हों कि कोई उनकी बात न सुन रहा हो।
फिर धीमे स्वर में बोले—
"सरकार ने वर्षों पहले कुंडाबाद और उसके आसपास के पूरे क्षेत्र को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था। वहाँ किसी भी प्रकार की खुदाई, शोध या आवाजाही की अनुमति नहीं है। यदि किसी सरकारी एजेंसी को तुम्हारे अभियान की भनक लग गई, तो मिशन तुरंत बंद कर दिया जाएगा।"
उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा—
"इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाना। अनावश्यक जोखिम मत लेना। और..."
वे कुछ पल के लिए रुके।
"मुझसे तभी संपर्क करना... जब हालात तुम्हारे नियंत्रण से बाहर हो जाएँ।"
मैंने बिना एक शब्द कहे उनकी ओर देखा।
फिर धीरे से सिर हिलाया।
"मैं समझ गया, डॉ. साहब।"
उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"मुझे तुम पर भरोसा है, देवेंद्र... लेकिन याद रखना—कभी-कभी इतिहास अपने रहस्यों की रक्षा करने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है।"
उनके ये शब्द मेरे मन में गूँजते रह गए...और उसी क्षण मुझे पहली बार एहसास हुआ कि शायद यह मिशन केवल इतिहास की खोज नहीं, बल्कि मौत से सामना करने वाली एक यात्रा बनने वाला था।
मैंने सिर हिलाते हुए कहा,
"ठीक है, डॉ. साहब।"
डॉ. के. एस. हूडा ने मुस्कुराकर मेरा हाथ दबाया और बोले,
"गुड लक, देवेंद्र... और याद रखना, कभी-कभी इतिहास अपने रहस्यों की रक्षा स्वयं करता है।"
मैंने हल्की मुस्कान के साथ उन्हें विदा कहा और अपनी टीम के साथ हेलीकॉप्टर की ओर बढ़ गया। कुछ ही मिनटों बाद हम सभी अपने-अपने स्थान पर बैठ चुके थे। इंजन की गर्जना तेज़ हुई और हेलीकॉप्टर धीरे-धीरे ज़मीन से ऊपर उठने लगा।
खिड़की से बाहर झाँकते हुए मैं नीचे फैली हुई घाटियों को देख रहा था। हेलीकॉप्टर ऊँचे-ऊँचे पर्वतों, गहरी घाटियों और चाँदी की तरह चमकती नदियों के ऊपर से उड़ता हुआ अपनी मंज़िल की ओर बढ़ रहा था। नीचे फैली हरियाली किसी स्वर्ग से कम नहीं लग रही थी।
मेरी टीम के साथी भी उस मनमोहक दृश्य को देखकर उत्साहित थे। कोई तस्वीरें ले रहा था, तो कोई दूर तक फैले पहाड़ों को निहार रहा था। लेकिन...
करीब एक घंटे बाद दृश्य अचानक बदलने लगा।
धीरे-धीरे हरे-भरे पर्वत पीछे छूटने लगे। उनकी जगह अब काले, सूखे और वीरान पहाड़ दिखाई देने लगे।
यहाँ न कोई हरियाली थी...
न कोई नदी...
न किसी पक्षी की आवाज़। जहाँ तक नज़र जाती, केवल टूटी हुई चट्टानें, बंजर धरती और अजीब आकार वाले काले पर्वत दिखाई देते थे। ऐसा लगता था, मानो इस भूमि से जीवन सदियों पहले ही समाप्त हो चुका हो।
हेलीकॉप्टर जितना आगे बढ़ता जा रहा था, वातावरण उतना ही भारी और डरावना होता जा रहा था। मेरे मन में एक अजीब-सी बेचैनी फिर से जाग उठी। आख़िर कुछ देर बाद पायलट की आवाज़ सुनाई दी—
"सर, हम गंतव्य पर पहुँचने वाले हैं।"
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
दो विशाल पर्वतों के बीच एक बहुत बड़ा खुला मैदान दिखाई दे रहा था। कुछ ही क्षणों बाद हेलीकॉप्टर धीरे-धीरे नीचे उतरा और उस सुनसान मैदान में आकर रुक गया।
इंजन बंद होते ही चारों ओर गहरा सन्नाटा छा गया। हम एक-एक करके हेलीकॉप्टर से नीचे उतरने लगे। मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई। जहाँ तक आँखें जाती थीं, वहाँ केवल बंजर ज़मीन और काले पत्थरों का अंतहीन विस्तार था।
हवा भी अजीब थी। उसमें न मिट्टी की खुशबू थी, न पेड़ों की हरियाली का एहसास...
बस एक ठंडी और सूखी वीरानी थी। हमारा सारा सामान हेलीकॉप्टर से नीचे उतार दिया गया।
पायलट ने अंतिम बार हाथ हिलाया। कुछ ही क्षणों में दोनों हेलीकॉप्टर फिर से आसमान की ओर उठे और धीरे-धीरे हमारी नज़रों से ओझल हो गए।
अब...
हम पूरी तरह अकेले थे। मेरी टीम का एक साथी मुस्कुराते हुए बोला—
"सर... लगता है यहीं से हमारा नाम इतिहास में लिखा जाएगा।"
उसकी बात सुनते ही पूरी टीम हँस पड़ी। मैं भी हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन मेरे भीतर की बेचैनी अब भी खत्म नहीं हुई थी।
मैंने बैग से डॉ. हूडा द्वारा दी गई काली फाइल निकाली और उसका नक्शा फैलाया।
ध्यान से निरीक्षण करने पर मुझे खुदाई स्थल से कुछ मील दूर एक अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान दिखाई दिया। मैंने नक्शा मोड़ा और सबकी ओर देखते हुए कहा—
"दोस्तों, सूरज ढलने से पहले हमें अपना बेस कैंप तैयार करना होगा। सामान उठाइए... हम यहीं समय बर्बाद नहीं कर सकते।"
सभी ने तुरंत अपना-अपना सामान उठाया और मेरे पीछे चल पड़े। उस समय हममें से किसी को भी अंदाज़ा नहीं था...
कि इस वीरान भूमि पर हमारा हर कदम हमें एक ऐसे रहस्य के करीब ले जा रहा था, जो सदियों से दुनिया की नज़रों से छिपा हुआ था। करीब तीन घंटे की कठिन पैदल यात्रा के बाद हम उस स्थान पर पहुँचे, जहाँ नक्शे के अनुसार हमारा बेस कैंप बनाया जाना था।
वह जगह अपेक्षाकृत समतल थी और चारों ओर ऊँची चट्टानों से घिरी हुई थी। मैंने कैंप लगाने का आदेश दिया। कुछ ही देर में पूरी टीम अपने-अपने काम में लग गई।
कोई टेंट लगा रहा था...
कोई जनरेटर की व्यवस्था कर रहा था...
तो कोई खाने-पीने का सामान व्यवस्थित कर रहा था। मैंने सोचा, जब तक कैंप तैयार हो रहा है, तब तक इस इलाके के बारे में उपलब्ध जानकारी एक बार फिर देख ली जाए।
मैंने फाइल खोली और उसमें मौजूद नक्शे, पुराने सर्वे और सरकारी रिपोर्टें ध्यान से पढ़नी शुरू कीं। लेकिन जितना पढ़ता गया, उतना ही उलझता गया।
इस जगह के बारे में लगभग हर जानकारी अधूरी थी। कई पन्नों पर केवल चेतावनी लिखी थी। कुछ नक्शों के हिस्से जानबूझकर काले रंग से ढँक दिए गए थे। और कुछ रिपोर्टों के पूरे पन्ने गायब थे। ऐसा लग रहा था...
मानो किसी ने इस जगह का वास्तविक इतिहास दुनिया से छिपाने की पूरी कोशिश की हो। मैंने मन ही मन निश्चय किया—
"आज से मैं इस अभियान की हर छोटी-बड़ी घटना अपनी निजी डायरी में दर्ज करूँगा। यदि हमारे साथ कुछ भी असामान्य होता है, तो उसका एक प्रमाण दुनिया के पास होना चाहिए।"
इसी सोच में डूबा था कि पीछे से आवाज़ आई—
"बॉस! कैंप तैयार है। अब थोड़ा आराम भी कर लीजिए।"
मैंने फाइल बंद की और अपने टेंट में चला गया। अंदर पहुँचकर मैंने अपना सामान एक कोने में रखा और थकान से चूर होकर बिस्तर पर लेट गया।
लेकिन आँखें बंद करने के बाद भी मेरे मन में केवल एक ही सवाल घूम रहा था—
आख़िर इस वीरान जगह का सच क्या है?
सोचते-सोचते कब नींद आ गई, मुझे पता ही नहीं चला। जब मेरी आँख खुली, तब बाहर हल्की धूप फैल चुकी थी।
मैं टेंट से बाहर निकला। बाहर मेरी पूरी टीम आग के पास बैठकर नाश्ता कर रही थी। मुझे बाहर आता देखकर टीम का एक सदस्य मुस्कुराते हुए मेरी ओर आया और बोला—
"गुड मॉर्निंग, बॉस... लगता है आज से इतिहास की असली खुदाई शुरू होने वाली है।"
"सर... नाश्ता तैयार है।"
मेरे साथी की आवाज़ सुनकर मैं अपने विचारों से बाहर आया और टेंट से निकलकर टीम के पास पहुँचा। सब लोग लकड़ी की एक अस्थायी मेज़ के चारों ओर बैठे नाश्ता कर रहे थे। मेरे लिए भी एक प्लेट पहले से रखी हुई थी।
मैं चुपचाप बैठ गया और नाश्ता करने लगा। कुछ देर तक वहाँ केवल बर्तनों की हल्की आवाज़ें सुनाई देती रहीं। तभी मेरी टीम के एक सदस्य ने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा—
"सर, आखिर हम इस वीरान और बंजर जगह पर खोजने क्या आए हैं?"
मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा—
"जो भी यहाँ छिपा है... वह किसी साधारण खजाने से कहीं अधिक मूल्यवान है।"
मेरी बात सुनकर एक दूसरा साथी उत्सुकता से बोला—
"लेकिन आखिर क्या?"
मैंने सिर हिलाते हुए उत्तर दिया—
"सच कहूँ तो मैं भी पूरी तरह नहीं जानता। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि यहाँ कुछ ऐसा छिपा है, जिसकी कल्पना भी शायद हमने कभी नहीं की होगी।"
वह फिर बोला—
"और आपको यह यकीन कैसे है?"
मैंने अपनी प्लेट मेज़ पर रखी और गंभीर स्वर में कहा—
"इतिहास कभी बिना कारण किसी जगह को रहस्य नहीं बनाता। कुंडाबाद ने सदियों से अपने भीतर कुछ छिपाकर रखा है। जो भी वह है... हम उसे खोजकर रहेंगे।"
मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई और आदेश दिया—
"सभी लोग अपना-अपना सामान तैयार कर लें। ठीक पंद्रह मिनट बाद हम खुदाई स्थल के लिए रवाना होंगे।"
लगभग पंद्रह मिनट बाद हम अपने सभी आवश्यक उपकरणों के साथ कैंप से निकल पड़े। हमारे सामने केवल सूखी धरती, काले पत्थर और वीरान पहाड़ थे।
चलते-चलते मैं सोच रहा था...
धरती पर ऐसे न जाने कितने रहस्य हैं, जिन्हें आज तक कोई नहीं समझ पाया। इतिहास केवल किताबों में लिखी घटनाओं का नाम नहीं है।
इतिहास उन अनगिनत कहानियों का भी नाम है, जो समय की धूल में दफ़्न होकर हमारी नज़रों से ओझल हो चुकी हैं।
आज विज्ञान और आधुनिक तकनीक ने मानव को बहुत शक्तिशाली बना दिया है। हम अंतरिक्ष की गहराइयों तक पहुँच चुके हैं, समुद्र की तलहटी का मानचित्र बना चुके हैं और हजारों वर्ष पुराने अवशेषों का रहस्य भी सुलझा रहे हैं।
लेकिन...
आज भी इस धरती पर कुछ ऐसे रहस्य मौजूद हैं, जिन्हें न विज्ञान समझ पाया है और न ही इतिहास।
वे हमारे सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देते।
उस समय मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि बहुत जल्द मैं भी उन्हीं रहस्यों का हिस्सा बनने वाला हूँ।
मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।
और यह सब शुरू हुआ...
कुंडाबाद की उस अभिशप्त धरती से।
एक ऐसी जगह...
जिसे देखकर पहली ही नज़र में ऐसा लगता था, मानो वहाँ से जीवन सदियों पहले ही समाप्त हो चुका हो।
करीब एक घंटे की पैदल यात्रा के बाद हम अपने निर्धारित खुदाई स्थल पर पहुँच गए। मेरे सामने एक विशाल काला पर्वत खड़ा था।
उस पर्वत के बीचों-बीच एक चौड़ा और गहरा गुफा-द्वार दिखाई दे रहा था। गुफा के भीतर घना अँधेरा पसरा हुआ था। ठंडी हवा लगातार उसके अंदर से बाहर आ रही थी, मानो कोई अदृश्य शक्ति हमें भीतर आने की चेतावनी दे रही हो।
मैंने नक्शे पर नज़र डाली। यही वह स्थान था। जिसे डॉ. हूडा ने खुदाई के लिए चिन्हित किया था। मेरी टीम के कुछ साथी उत्सुकता में गुफा की ओर बढ़ने लगे।
लेकिन मैंने तुरंत उन्हें रोक दिया।
"रुको!"
मेरी आवाज़ सुनते ही सभी वहीं रुक गए। मैं धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ा और गंभीर स्वर में बोला—
"हमसे पहले भी कई टीमें यहाँ आ चुकी हैं।"
"उन्होंने यहाँ क्या देखा... क्या खोजा... या उनके साथ आखिर हुआ क्या... यह आज तक कोई नहीं जानता।"
मैंने गुफा के अँधेरे की ओर देखते हुए कहा—
"लेकिन एक बात हम जानते हैं..."
"वे कभी वापस नहीं लौटे।"
कुछ क्षण के लिए वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया। मैंने अपनी टीम की ओर देखते हुए दृढ़ स्वर में कहा—
"इसलिए आज से इस अभियान का पहला नियम है—कोई भी व्यक्ति अकेले कहीं नहीं जाएगा। बिना अनुमति कोई गुफा के अंदर प्रवेश नहीं करेगा। हर कदम सोच-समझकर उठाया जाएगा।"
मैंने एक बार फिर उस अँधेरी गुफा की ओर देखा। न जाने क्यों...
ऐसा महसूस हो रहा था...
मानो उस गुफा के भीतर कोई हमारी प्रतीक्षा कर रहा हो।
"तो ठीक है?" मैंने अपनी टीम की ओर देखते हुए कहा। सभी ने एक साथ उत्तर दिया—
"ठीक है, सर!"
मैंने सिर हिलाया।
"तो चलिए... आज से इस रहस्य की शुरुआत करते हैं।"
इतना कहकर मैं सबसे आगे बढ़ा और पूरी टीम मेरे पीछे-पीछे उस विशाल गुफा के भीतर प्रवेश कर गई। गुफा के अंदर घना अँधेरा और गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। केवल हमारी टॉर्चों की रोशनी चट्टानों से टकराकर लौट रही थी।
हमने उसी दिन से खुदाई का काम शुरू कर दिया। हमारी दिनचर्या लगभग एक जैसी हो गई थी। सुबह सूर्योदय के साथ कैंप से निकलना...
पूरा दिन गुफा में खुदाई करना...
और सूर्यास्त से पहले वापस बेस कैंप लौट आना। लेकिन हर दिन अपने साथ कोई-न-कोई नया रहस्य लेकर आता था।
धीरे-धीरे गुफा की गहराइयों से ऐसी-ऐसी प्राचीन वस्तुएँ मिलने लगीं, जिन्हें देखकर मैं स्वयं आश्चर्यचकित रह जाता।
कई विशाल पत्थरों पर अनजान लिपि में उकेरे गए प्रतीक थे।
कुछ ऐसे धातु के हथियार मिले, जो पूरी तरह जंग खा चुके थे, लेकिन उनकी बनावट किसी भी ज्ञात सभ्यता से मेल नहीं खाती थी।
और फिर...
एक दिन मुझे एक ऐसा आभूषण मिला, जिसने मेरी सोच ही बदल दी।
वह किसी मुकुट का हिस्सा था या किसी दिव्य आभूषण का—मैं निश्चित नहीं कह सकता था।
उस पर बने चिन्ह किसी भी ऐतिहासिक अभिलेख में वर्णित नहीं थे।
मैंने अपने पूरे करियर में न तो ऐसा आभूषण देखा था और न ही किसी पुस्तक, शोधपत्र या संग्रहालय में उसके जैसा कुछ पाया था।
मैंने उसे कई घंटे तक अलग-अलग कोणों से देखा।
मेरे मन में केवल एक ही विचार बार-बार आ रहा था—
"क्या यह किसी ऐसी सभ्यता का प्रमाण है, जिसका इतिहास दुनिया से पूरी तरह मिट चुका है?"
उस दिन के बाद मेरा उत्साह पहले से कई गुना बढ़ गया।
हर शाम मैं खुदाई में मिली वस्तुओं को घंटों बैठकर साफ करता, उनका अध्ययन करता और उनकी पूरी जानकारी अपनी डायरी में लिखता।
लेकिन जितनी नई वस्तुएँ मिलतीं...
उतने ही नए प्रश्न खड़े हो जाते।
लगता था, मानो हर खोज मुझे उत्तर देने के बजाय एक और रहस्य की ओर धकेल रही हो।
समय बीतता गया।
दिन...
हफ्तों में बदल गए।
हफ्ते...
महीनों में।
और फिर...
महीने कब वर्षों में बदल गए, हमें पता ही नहीं चला। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि खुदाई अब भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रही थी।
गुफा मानो अपने भीतर अनगिनत रहस्य छिपाए बैठी थी।
जितना हम खोदते...
उतना ही वह हमारे सामने अपने नए रहस्य खोल देती। लगातार कठिन परिश्रम का असर अब पूरी टीम पर दिखाई देने लगा था।
कई साथी बीमार पड़ गए। कुछ की तबीयत इतनी खराब हो गई कि उन्हें मजबूर होकर वापस भेजना पड़ा। हर बार जब कोई साथी हमें छोड़कर जाता, मुझे ऐसा लगता जैसे हमारी ताकत का एक हिस्सा कम हो गया हो।
मैं जानता था कि यह अभियान केवल मेरी मेहनत से पूरा नहीं हो सकता। यह पूरी टीम की परीक्षा थी।
लेकिन अब टीम छोटी होती जा रही थी...
और रहस्य पहले से भी बड़ा होता जा रहा था।
कई बार मेरे मन में यह विचार आता कि कहीं यह खोज अधूरी ही न रह जाए।
यदि ऐसा हुआ...
तो शायद दुनिया कभी उस खोई हुई सभ्यता और उस रहस्यमयी साम्राज्य के बारे में जान ही नहीं पाएगी, जो सदियों से इतिहास की परतों में दफ़्न पड़ा था।
लेकिन मैंने हार मानने से इंकार कर दिया।
मैंने खुदाई में मिली हर वस्तु का फिर से अध्ययन शुरू किया।
हर पत्थर...
हर धातु का टुकड़ा...
हर आभूषण...
और हर प्रतीक।
मुझे विश्वास था कि इन सबके बीच कहीं न कहीं वह एक सुराग अवश्य छिपा है, जो इस पूरे रहस्य का द्वार खोल देगा।
धीरे-धीरे मेरे पास हजारों दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह हो गया।
ऐसी वस्तुएँ...
जिनके बारे में आधुनिक इतिहास, पुरातत्व और विज्ञान—तीनों ही मौन थे। मैं अब केवल एक पुरातत्वविद् नहीं रह गया था।
मैं उस रहस्य का बंदी बन चुका था। दिन और रात का अंतर मेरे लिए लगभग समाप्त हो चुका था।
दुनिया से मेरा संबंध कम होता जा रहा था...
और उन प्राचीन वस्तुओं से मेरा लगाव बढ़ता जा रहा था।
कभी-कभी पूरी रात मैं अकेला बैठकर उन वस्तुओं को देखता रहता।
ऐसा लगता था...
मानो वे मुझसे कुछ कहना चाहती हों। मानो उनकी खामोशी के भीतर हजारों वर्षों का इतिहास कैद हो।
और मुझे पूरा विश्वास था...
कि वह इतिहास केवल किसी खोई हुई सभ्यता का नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सबसे बड़ी भूली हुई सच्चाई का इतिहास था।
इतनी रहस्यमयी सभ्यता के इतिहास को समझने की मेरी जिज्ञासा अब एक जुनून बन चुकी थी। मुझे विश्वास था कि यदि मैं कुछ और गहराई तक खुदाई करूँ, तो शायद उस खोए हुए साम्राज्य का अंतिम रहस्य भी मेरे सामने आ जाएगा।
और फिर...
मैं उसे पूरी दुनिया के सामने ला सकूँगा।
इसी उम्मीद के साथ मैं अपनी बची हुई छोटी-सी टीम के साथ रोज़ गुफा में उतरता और घंटों तक खुदाई करता।
लेकिन मुझे कहाँ पता था कि एक दिन मेरी यही ज़िद मेरी ज़िंदगी की दिशा हमेशा के लिए बदल देगी।
अगले दिन मैं उसी स्थान पर पहुँचा, जहाँ कुछ समय पहले मुझे चट्टान पर उकेरी गई रहस्यमयी आकृतियाँ मिली थीं। मैंने वहीं से खुदाई शुरू की।
कुछ देर बाद मेरी नज़र गुफा की दीवार पर पड़ी। दीवार के भीतर से किसी धातु की हल्की चमक दिखाई दे रही थी।
मैंने पास जाकर देखा। चट्टानों के बीच कुछ अद्भुत आभूषण आधे दबे हुए थे।
उन्हें देखकर मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा। ऐसा लग रहा था मानो सदियों पुराना कोई खजाना मेरे सामने आने वाला हो।
मैंने हथौड़े और छैनी से दीवार तोड़ने की कोशिश शुरू कर दी। लेकिन वह चट्टान असाधारण रूप से कठोर थी।
घंटों की मेहनत के बाद भी उसमें मुश्किल से कुछ दरारें आईं। धीरे-धीरे शाम होने लगी।
मेरी टीम ने सामान समेटना शुरू कर दिया। कैंप लौटने का समय हो चुका था।
लेकिन...
मैं उन आभूषणों को वहीं छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं था। मेरे भीतर का खोजी अब धैर्य खो चुका था।
तभी मेरे मन में एक खतरनाक विचार आया।
विस्फोटक।
मैं जानता था कि किसी गुफा के भीतर विस्फोट करना आत्मघाती कदम हो सकता है। हल्का-सा धमाका भी पूरी गुफा को ध्वस्त कर सकता था।
लेकिन उस समय मेरे सामने केवल एक ही लक्ष्य था—
हर कीमत पर उन आभूषणों को हासिल करना। मैंने अपनी योजना किसी को नहीं बताई। कुछ देर बाद मेरे सभी साथी गुफा से बाहर निकल गए।
उनके जाते ही मैंने बैग से एक छोटा विस्फोटक निकाला और चट्टान पर सावधानी से लगा दिया। एक क्षण के लिए मेरे हाथ रुक गए।
अंदर से एक आवाज़ मुझे रोक रही थी। लेकिन अगले ही पल...
मेरे लालच ने मेरी समझ पर जीत हासिल कर ली।मैंने फ्यूज़ जला दिया।
मैं तेजी से पीछे हट गया। और फिर...
धड़ाम!!!
पूरा पर्वत मानो काँप उठा। भीषण धमाके की गूँज पूरी गुफा में फैल गई।
चारों ओर से विशाल चट्टानें टूट-टूटकर गिरने लगीं।
धूल का घना बादल हवा में फैल गया।
मैंने बाहर की ओर भागने की कोशिश की।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
एक विशाल शिला गुफा के प्रवेश द्वार पर आ गिरी।
कुछ ही सेकंड में बाहर जाने का रास्ता पूरी तरह बंद हो चुका था।
मैं...
गुफा के भीतर हमेशा के लिए कैद हो चुका था।
चारों ओर घना अँधेरा छा गया।
कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।
केवल मेरी तेज़ साँसों की आवाज़ और गिरते पत्थरों की गूँज बाकी थी।
मैंने काँपते हाथों से अपना बैग टटोला।
काफी तलाश के बाद टॉर्च मिल गई।
जैसे ही मैंने टॉर्च जलाई, उसकी रोशनी सीधे उस स्थान पर पड़ी जहाँ कुछ क्षण पहले वे आभूषण दिखाई दे रहे थे।
मेरा दिल बैठ गया।
धमाके ने उन सभी आभूषणों को चूर-चूर कर दिया था।
उनके टुकड़े पूरी गुफा में बिखरे पड़े थे।
मैं घुटनों के बल वहीं बैठ गया।
मेरी वर्षों की मेहनत...
मेरी सबसे बड़ी उम्मीद...
एक ही पल में नष्ट हो चुकी थी।
मैं निराश होकर पास पड़े एक विशाल पत्थर पर बैठ गया।
टॉर्च की रोशनी में बिखरे हुए टुकड़ों को देखता रहा।
तभी...
एक हल्की-सी सुनहरी चमक मेरी नज़र में आई।
वह आभूषणों के बीच नहीं थी।
थोड़ा अलग...
चट्टानों के पास पड़ी हुई थी।
मैं धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा।
ज़मीन पर एक छड़ी पड़ी थी।
मैंने उसे उठाया।
पहली नज़र में वह बिल्कुल साधारण प्रतीत हुई।
लेकिन जब मैंने उसे ध्यान से देखा, तो समझ आया कि वह शुद्ध सोने से बनी थी।
उसकी सतह पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी उकेरी गई थी।
साथ ही किसी अज्ञात प्राचीन भाषा में कुछ शब्द भी अंकित थे।
मैं उन अक्षरों को पढ़ नहीं पाया।
मुझे लगा कि शायद यह भी किसी प्राचीन राजा का राजदंड या धार्मिक प्रतीक होगा।
मैंने बिना अधिक सोचे उसे अपने बैग में रखने के बजाय हाथ में ही पकड़े रखा और फिर उसी पत्थर पर जाकर बैठ गया।
अब मेरे मन में केवल एक ही प्रश्न था—
मैं इस बंद गुफा से बाहर कैसे निकलूँ?
अनजाने में मैं उस छड़ी को उँगलियों के बीच घुमाता रहा।
और तभी...
अचानक छड़ी के अग्रभाग से एक तीव्र स्वर्णिम प्रकाश निकला।
वह प्रकाश सीधा सामने की चट्टान से टकराया।
मैं घबरा गया।
छड़ी मेरे हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिर गई।
लेकिन प्रकाश समाप्त नहीं हुआ।
वह फैलता चला गया।
कुछ ही क्षणों में पूरी गुफा दिव्य प्रकाश से भर गई।
मुझे ऐसा लगा मानो चट्टानें स्वयं चमकने लगी हों।
फिर...
उस प्रकाश के भीतर से धीमी-धीमी फुसफुसाहटें सुनाई देने लगीं।
ऐसी आवाज़ें...
जिन्हें मैं समझ नहीं पा रहा था।
वे किसी अज्ञात भाषा में थीं।
लेकिन न जाने क्यों...
ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे मुझे ही पुकार रही हों।
मैं अनायास उस प्रकाश की ओर बढ़ने लगा।
जितना आगे बढ़ता...
आवाज़ें उतनी स्पष्ट होती जातीं।
फिर अचानक मेरे सामने का दृश्य बदलने लगा।
प्रकाश के बीच असंख्य तारे दिखाई देने लगे।
उनके पीछे...
एक अथाह काला शून्य।
ऐसा लग रहा था मानो पूरी गुफा गायब हो चुकी हो और मैं स्वयं ब्रह्मांड के अनंत विस्तार में खिंचता चला जा रहा हूँ।
मेरे शरीर का भार समाप्त हो चुका था।
मैं केवल गिर रहा था...
लगातार...
अंतहीन अंधकार की ओर।
मेरी पलकों पर धीरे-धीरे बोझ बढ़ने लगा।
आवाज़ें अब बहुत दूर से आती हुई प्रतीत हो रही थीं।
और अगले ही क्षण...
सब कुछ काला हो गया।
मैं बेहोश हो चुका था।
मुझे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि जब मेरी आँख खुलेगी...
तो केवल मेरी दुनिया ही नहीं,
बल्कि उस साधारण-सी दिखने वाली स्वर्णिम छड़ी के बारे में मेरी पूरी सोच भी हमेशा के लिए बदल चुकी होगी।
अध्याय 2- जादुई छड़ी का निर्माण
यह उस काल की कथा है...
जब न पृथ्वी थी, न आकाश में सूर्य का प्रकाश, न समय का कोई इतिहास।
केवल स्वर्ग था— अनंत प्रकाश से आलोकित, दिव्य संगीत से गूँजता हुआ और देवताओं का शाश्वत लोक।
उस स्वर्ग पर शासन करते थे राजा बेरो। वे केवल स्वर्ग के राजा ही नहीं, बल्कि समस्त देवताओं में सबसे प्राचीन, सबसे बुद्धिमान और सबसे शक्तिशाली थे।
कहा जाता था कि सृष्टि की प्रत्येक दिव्य शक्ति का एक अंश उनके भीतर विद्यमान था। उनके एक संकल्प से पर्वत जन्म ले सकते थे
एक संकेत से महासागर शांत हो सकते थे... और एक इच्छा से तारों की दिशा बदल सकती थी।
यद्यपि समय ने उनके शरीर को वृद्ध बना दिया था, पर उनकी शक्ति आज भी असीम थी।
उनके शासन में स्वर्ग पूर्णतः सुरक्षित, समृद्ध और आनंदमय था।
कहीं भय नहीं था...
कहीं युद्ध नहीं था...
केवल शांति और संतुलन था। लेकिन एक दिन राजा बेरो के मन में एक विचार जन्मा।
उन्होंने सोचा—
"यदि सौंदर्य की कोई सीमा नहीं, तो सृष्टि को एक और अद्भुत लोक क्यों न दिया जाए?"
वे ऐसा लोक बनाना चाहते थे, जो स्वर्ग की प्रतिकृति न होकर उससे बिल्कुल भिन्न हो। एक ऐसी दुनिया...
जहाँ हर ऋतु एक नया रंग लेकर आए। जहाँ प्रकृति स्वयं कला का सबसे महान रूप बन जाए।
जहाँ जीवन निरंतर विकसित होता रहे। इस महान सृष्टि की रचना के लिए केवल दिव्य शक्तियाँ पर्याप्त नहीं थीं।
एक ऐसे माध्यम की आवश्यकता थी, जिसमें समस्त देवशक्तियाँ एक साथ समाहित हो सकें।
तब राजा बेरो ने स्वर्ग की महासभा बुलाई। सभी देवता और देवियाँ एकत्र हुए।
अपने-अपने तेज का एक अंश उन्होंने एक दिव्य अग्नि में समर्पित किया। वह अग्नि हजारों वर्षों तक प्रज्वलित रही।
जब उसकी ज्वाला शांत हुई...
तो उसके केंद्र से एक स्वर्णिम छड़ी प्रकट हुई। वह कोई साधारण राजदंड नहीं था।
वह समस्त देवशक्तियों का मूर्त स्वरूप था। उसकी सतह पर ब्रह्मांड की आदिम लिपि अंकित थी।
उसके भीतर सृष्टि और विनाश—दोनों की अनंत शक्तियाँ प्रवाहित हो रही थीं।
कहा जाता था— जिसके हाथों में यह छड़ी होगी, वही सृष्टि का भविष्य लिख सकेगा।
वह चाहे तो नया संसार रच सकता है...
और चाहे तो पूरे ब्रह्मांड को शून्य में बदल सकता है।
राजा बेरो ने उसी दिव्य छड़ी की सहायता से एक नई दुनिया की रचना आरम्भ की।
धीरे-धीरे प्रकाश से पर्वत बने...
पर्वतों से नदियाँ निकलीं...
नदियों से वन जन्मे...
और वनों से जीवन की पहली साँस प्रकट हुई।
नीले आकाश के नीचे हिमाच्छादित पर्वत खड़े थे। उनकी चोटियों से गिरते जलप्रपात चाँदी की धाराओं की तरह चमकते थे।
स्फटिक-सी निर्मल नदियाँ दूर-दूर तक बहती हुई धरती को जीवन देती थीं।
उनके किनारों पर अनगिनत वृक्ष उग आए। फूलों की ऐसी प्रजातियाँ खिलीं, जिन्हें देखकर स्वयं अप्सराएँ भी विस्मित रह जाती थीं।
धीरे-धीरे पक्षियों का मधुर संगीत, पशुओं की चंचलता और हवाओं की सुगंध ने उस संसार को जीवंत बना दिया।
समय बीतता गया। और वह नई दुनिया दिन-प्रतिदिन अधिक सुंदर होती चली गई।
एक समय ऐसा आया...
जब उसकी सुंदरता स्वयं स्वर्ग को भी चुनौती देने लगी।
स्वर्ग से जब देवता उस संसार को देखते, तो उनकी दृष्टि वहीं ठहर जाती।
अप्सराएँ आधी रात को गुप्त रूप से वहाँ घूमने आतीं।
ऋषि उसके वनों में ध्यान लगाना चाहते थे। और देवगण उसकी नदियों में बहते निर्मल जल को देखकर मंत्रमुग्ध हो उठते थे।
राजा बेरो ने उस दिव्य लोक का नाम रखा—
"धरती।",br>
एक ऐसी धरती...
जिसे उन्होंने केवल रहने के लिए नहीं बनाया था।
बल्कि इसलिए बनाया था कि वह सृष्टि की सबसे सुंदर, सबसे जीवंत और सबसे अनमोल रचना बन सके।
लेकिन...
राजा बेरो नहीं जानते थे कि जिस दिव्य छड़ी से उन्होंने इस अद्भुत संसार का निर्माण किया है...
एक दिन वही छड़ी इस संसार के नव-निर्माण और महाविनाश—दोनों का कारण बनने वाली है।
समय निरंतर आगे बढ़ता रहा। युग बीतते गए और धरती पर जीवन अपने स्वाभाविक क्रम में विकसित होता रहा। किंतु एक समय ऐसा आया, जब राजा बेरो ने स्वर्ग से धरती की ओर देखा तो उनके मुख का तेज फीका पड़ गया।
जिस धरती को उन्होंने कभी स्वर्ग से भी अधिक सुंदर बनाया था, वही अब धीरे-धीरे अपना वैभव खोने लगी थी।
घने वन विरल होने लगे...
निर्मल नदियाँ सूखने लगीं...
असंख्य जीव-जंतु विलुप्त होने लगे...
और प्रकृति का संतुलन धीरे-धीरे बिगड़ने लगा। राजा बेरो समझ गए कि केवल प्रकृति का निर्माण कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि उसकी रक्षा करने वाला कोई न हो, तो एक दिन सबसे सुंदर संसार भी नष्ट हो सकता है।
तब उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसने सृष्टि का भविष्य बदल दिया। उन्होंने एक बार फिर दिव्य छड़ी अपने हाथों में उठाई।
समस्त देवताओं की शक्तियाँ उस छड़ी में जागृत हो उठीं। दिव्य प्रकाश की असंख्य किरणें स्वर्ग से उतरकर धरती पर बिखर गईं।
उसी दिव्य प्रकाश से जन्म हुआ—
मानव का।
मानव देवताओं की अब तक की सबसे महान और सबसे अद्भुत रचना था। उसे केवल जीवन ही नहीं दिया गया, बल्कि बुद्धि, विवेक, करुणा, कल्पना और सृजन की अद्वितीय क्षमता भी प्रदान की गई।
राजा बेरो ने मानव को एक विशेष उत्तरदायित्व सौंपा—
धरती की रक्षा करना...
उसकी सुंदरता को बनाए रखना...
और प्रकृति के साथ संतुलन में रहकर जीवन को आगे बढ़ाना। बदले में मानव देवताओं का सम्मान करेगा, उनका स्मरण करेगा और धर्म के मार्ग पर चलेगा।
मानव की श्रद्धा से देवताओं की दिव्य शक्ति और भी प्रबल होने लगी। धरती पर सभ्यताएँ जन्म लेने लगीं।
मनुष्यों ने नदियों के किनारे अपने पहले घर बनाए।
उन्होंने खेती सीखी...
नगर बसाए...
कला, संगीत और ज्ञान को जन्म दिया। धीरे-धीरे धरती केवल प्रकृति का संसार नहीं रही, बल्कि सभ्यता का भी घर बन गई।
स्वर्ग से यह सब देखकर राजा बेरो प्रसन्न थे। उन्हें विश्वास हो गया कि धरती का भविष्य अब सुरक्षित हाथों में है।
लेकिन एक चिंता अभी भी शेष थी।
वह थी—
दिव्य छड़ी।
राजा बेरो जानते थे कि यदि यह छड़ी किसी लालची, क्रूर या दुष्ट प्राणी के हाथ लग गई, तो वही शक्ति जो सृष्टि का निर्माण कर सकती है, सम्पूर्ण ब्रह्मांड के विनाश का कारण भी बन सकती है।
इसलिए उन्होंने छड़ी को स्वर्ग के सबसे सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया।
वह एक दिव्य क्रिस्टल-पात्र में बंद कर दी गई, जहाँ तक पहुँचना किसी देवता के लिए भी सरल नहीं था।
फिर राजा बेरो ने उस पर एक प्राचीन दिव्य शाप अंकित किया—
"यह छड़ी स्वयं अपने स्वामी का चयन करेगी।
जिसे यह स्वीकार नहीं करेगी, उसके लिए यह केवल एक साधारण स्वर्ण-दंड होगी।
पर जिसे यह अपना स्वामी मानेगी, वही इसकी वास्तविक शक्ति को जागृत कर सकेगा।
वही सृष्टि का निर्माता भी बन सकता है... और महाविनाश का कारण भी।"
इसके बाद राजा बेरो निश्चिंत हो गए।
उन्हें विश्वास था कि अब कोई भी शक्ति इस दिव्य अस्त्र तक कभी नहीं पहुँच सकेगी।
किन्तु...
स्वर्ग की सीमाओं से बहुत दूर...
जहाँ प्रकाश की एक किरण भी कभी नहीं पहुँची...
जहाँ केवल अनंत अंधकार, शून्य और मृत्यु का साम्राज्य था...
वहाँ कोई और भी था।
एक ऐसी सत्ता...
जो स्वयं को देवताओं से कम नहीं समझती थी।
जिसकी दृष्टि भी उसी दिव्य छड़ी पर टिकी हुई थी।
और उसी क्षण...
ब्रह्मांड में पहली बार प्रकाश और अंधकार का वास्तविक युद्ध जन्म लेने वाला था।
अध्याय 3- एक खतरनाक पिशाच (शैतान)
जहाँ प्रकाश था...
वहीं कहीं असीम अंधकार भी था। ब्रह्मांड के उस छोर पर, जहाँ किसी तारे की रोशनी कभी नहीं पहुँची थी, वहाँ फैला हुआ था एक अनंत काला साम्राज्य—काली दुनिया। वह मृत्यु का लोक था। एक ऐसा संसार जहाँ दया, प्रेम और जीवन का कोई अस्तित्व नहीं था।
वहाँ केवल भय था...
विनाश था... और अंधकार का साम्राज्य था। उसी काली दुनिया से जन्मा था एक भयानक पिशाच—
कालकूष।
कालकूष केवल एक योद्धा नहीं था। वह अंधकार का सेनापति था। उसका एक ही उद्देश्य था—
पूरे ब्रह्मांड को अपने अधीन करना।
सदियों से वह अपनी विशाल सेना के साथ एक-एक ग्रह जीतता चला आ रहा था। जो उसके सामने झुका, वह जीवित रहा। जिसने विरोध किया, उसका अस्तित्व ही मिटा दिया गया। धीरे-धीरे असंख्य ग्रह उसके अधीन आ गए। अब उसके साम्राज्य की सीमा इतनी विशाल हो चुकी थी कि स्वयं उसके सैनिक भी उसका अंत नहीं जानते थे। लेकिन…
एक दिन, जब उसकी सेना ब्रह्मांड के एक अनजान मार्ग से आगे बढ़ रही थी, तभी अचानक अंतरिक्ष में एक मधुर, दिव्य संगीत गूँज उठा। वह संगीत किसी वाद्य का नहीं था। वह स्वयं प्रकाश की ध्वनि थी। कालकूष पहली बार ठिठक गया। उसने अपनी लाल अग्नि जैसी आँखें बंद कीं और उस स्वर को ध्यान से सुना। उसके भीतर पहली बार एक अजीब-सी बेचैनी पैदा हुई। उसने अपनी दृष्टि उस दिशा में उठाई, जहाँ से वह दिव्य संगीत आ रहा था। और फिर..
उसने पहली बार स्वर्ग को देखा। सुनहरे महलों से जगमगाता हुआ...
अनंत प्रकाश में नहाया हुआ...
जहाँ शांति स्वयं जीवित प्रतीत होती थी। कुछ क्षणों तक कालकूष बिना पलक झपकाए उस दृश्य को देखता रहा। फिर उसने अपनी सेना की ओर देखा।
"यह कौन-सा लोक है?"
सैनिकों ने सिर झुका लिया।
"स्वामी... हम नहीं जानते।"
कालकूष के चेहरे पर एक भयावह मुस्कान उभरी।
"यदि यह मेरे साम्राज्य का भाग नहीं है...
तो अब होगा।"
उसने अपनी तलवार आकाश की ओर उठा दी।
क्षणभर में पूरी काली सेना युद्ध के लिए तैयार हो गई। उधर…
स्वर्ग में किसी को भी इस आने वाले विनाश का आभास तक नहीं था।
राजा बेरो अपने दिव्य महल की ऊँची बालकनी से धरती को निहार रहे थे।
उनके चेहरे पर संतोष था। उन्हें विश्वास था कि अब सृष्टि संतुलन की ओर बढ़ रही है।
लेकिन अगले ही क्षण...
पूरा स्वर्ग काँप उठा। एक भीषण गर्जना ने आकाश को चीर दिया। स्वर्ग के विशाल द्वार भयंकर धमाके के साथ हिल उठे।
शांत हवाएँ तपते तूफ़ानों में बदल गईं। सुनहरे बादल काले धुएँ से ढक गए।
और फिर…
काली दुनिया की लाखों सैनिकों वाली सेना बिजली की गति से स्वर्ग में प्रवेश कर गई।
किसी देवता को संभलने का अवसर तक नहीं मिला। चारों ओर चीखें गूँज उठीं। स्वर्ग के महल ध्वस्त होने लगे। उद्यान जलने लगे।दिव्य वृक्ष राख में बदलने लगे। देवताओं ने प्रतिकार करने का प्रयास किया, लेकिन यह आक्रमण इतना अचानक और इतना भीषण था कि उनकी पंक्तियाँ कुछ ही क्षणों में टूट गईं। युद्ध आरंभ हो चुका था। और पहली बार...
स्वर्ग की धरती पर देवताओं का रक्त बहा। कालकूष अपनी विशाल सेना के बीच खड़ा यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में विजय का अहंकार स्पष्ट दिखाई दे रहा था। कुछ ही समय में अधिकांश देवताओं को बंदी बना लिया गया। जो महल कभी प्रकाश से चमकते थे, वे अब धुएँ और आग से भर चुके थे। कालकूष को विश्वास हो गया था कि उसने स्वर्ग पर विजय प्राप्त कर ली है।
वह धीरे-धीरे उस नष्ट हुए राजमहल की ओर बढ़ा। उसके चेहरे पर विजेता की मुस्कान थी। तभी...
पूरा स्वर्ग एक दर्दनाक चीख से गूँज उठा।
"आऽऽऽऽऽह...!"
वह आवाज इतनी प्रचंड थी कि पूरा आकाश काँप उठा। कालकूष वहीं रुक गया। उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई। उसने पहली बार महसूस किया...
कि स्वर्ग का वास्तविक राजा अभी युद्धभूमि में उतरा ही नहीं था। दर्दभरी चीख पूरे स्वर्ग में गूँज उठी। उस चीख ने कुछ क्षणों के लिए युद्धभूमि को शांत कर दिया। कालकूष और उसकी पूरी सेना ने एक साथ उसी दिशा में देखा, जहाँ से वह आवाज आई थी। कुछ ही दूरी पर उसका एक सैनिक घुटनों के बल गिरा हुआ था। उसका दायाँ हाथ कंधे से अलग होकर ज़मीन पर पड़ा था। घाव से काला रक्त बह रहा था और वह असहनीय पीड़ा में तड़प रहा था। कालकूष की भौंहें सिकुड़ गईं। उसने क्रोध से दहाड़ते हुए पूछा—
"यह किसने किया?"
लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला। सैनिक अभी भी दर्द से चीख रहा था। अचानक...
उसकी चीख बीच में ही रुक गई। पूरा वातावरण एक पल के लिए स्तब्ध हो गया। कालकूष तेज़ी से उसके पास पहुँचा। जब उसने शव को पलटकर देखा, तो उसकी आँखें फैल गईं। एक लंबा दिव्य बाण सैनिक के मुँह को चीरता हुआ सिर के आर-पार निकल चुका था। मृत्यु इतनी तेज़ थी कि उसे अंतिम चीख तक पूरी करने का अवसर नहीं मिला। कालकूष ने क्रोध से चारों ओर देखा।
तभी उसकी दृष्टि कुछ दूर हवा में तैरती हुई एक विशाल काँच की पात्र पर पड़ी। वह पात्र भूमि से लगभग चार फ़ीट ऊपर स्थिर था। उसके भीतर से स्वर्णिम प्रकाश की तीव्र किरणें चारों ओर फैल रही थीं। मानो उसके अंदर कोई छोटा-सा सूर्य कैद हो। उस प्रकाश ने पहली बार कालकूष के मन में लालच जगा दिया। वह अनायास ही उसकी ओर बढ़ने लगा। उसकी आँखों में अब युद्ध नहीं...
केवल उस दिव्य वस्तु को पाने की इच्छा थी। धीरे-धीरे वह काँच के पात्र के सामने पहुँचा।
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। बस एक स्पर्श...
और तभी—
श्श्श...!
हवा को चीरती हुई एक तलवार बिजली की गति से आई। अगले ही क्षण...
छन्न!
कालकूष का बढ़ा हुआ हाथ कलाई से अलग होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। क्षणभर के लिए समय जैसे ठहर गया। काली सेना भय से पीछे हट गई। पहली बार…
उनके अजेय सेनापति ने दर्द से गर्जना की। कालकूष ने क्रोध से उस दिशा में देखा, जहाँ से तलवार आई थी। घने धुएँ के बीच से एक वृद्ध पुरुष धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। उसके श्वेत केश हवा में लहरा रहे थे। सुनहरे दिव्य कवच पर युद्ध की चमक थी। एक हाथ में विशाल तलवार…
और दूसरे हाथ में दिव्य धनुष। उसके प्रत्येक कदम के साथ धरती काँप रही थी। उसकी आँखों का तेज़ किसी सूर्य से कम नहीं था। पूरा स्वर्ग जैसे उसके आगमन से पुनः जीवित हो उठा। वह कोई साधारण योद्धा नहीं था। वह था—
स्वर्ग का अधिपति... राजा बेरो।
राजा बेरो को देखकर बंदी बनाए गए देवताओं की आँखों में आशा लौट आई। जो देवता अब तक निराश खड़े थे, उन्होंने एक-एक कर अपने अस्त्र उठा लिए। उधर कालकूष की सेना पहली बार भयभीत दिखाई देने लगी। राजा बेरो ने अपनी तलवार आकाश की ओर उठाई और गर्जना की—
"देवताओं! स्वर्ग अभी जीवित है!"
उनकी आवाज़ पूरे स्वर्ग में गूँज उठी। अगले ही क्षण सभी देवता एक साथ युद्धभूमि में कूद पड़े। हजारों दिव्य अस्त्र आकाश में चमक उठे। स्वर्ग फिर से युद्ध की गर्जना से भर गया। अब युद्ध केवल स्वर्ग की रक्षा का नहीं था…
यह प्रकाश और अंधकार के बीच आरम्भ हुआ पहला महायुद्ध था। कालकूष का हाथ कटते ही युद्ध का रुख बदल गया। जो सेना कुछ क्षण पहले तक अजेय प्रतीत हो रही थी, वही अब भय और भ्रम में पीछे हटने लगी।
देवताओं ने इस अवसर का लाभ उठाया और एकजुट होकर काली सेना पर टूट पड़े। कुछ ही समय में पिशाचों की सेना स्वर्ग के द्वारों की ओर धकेली जाने लगी। कालकूष समझ चुका था कि बिना पूरी तैयारी के स्वर्ग पर विजय पाना संभव नहीं। उसी समय युद्धभूमि में एक भयंकर विस्फोट हुआ। राजा बेरो और कालकूष के दिव्य अस्त्रों की टक्कर से उत्पन्न ऊर्जा की लहर सीधे उस दिव्य क्रिस्टल-पात्र से टकराई, जिसमें जादुई छड़ी सुरक्षित रखी गई थी। पात्र काँप उठा। उसमें महीन दरारें उभर आईं। अगले ही क्षण—
धड़ाम!
दिव्य पात्र टूटकर असंख्य टुकड़ों में बिखर गया। उसके टूटते ही एक प्रचंड स्वर्णिम प्रकाश पूरे स्वर्ग में फैल गया।उस प्रकाश की तीव्रता इतनी अधिक थी कि कुछ क्षणों के लिए देवता और पिशाच—दोनों अपनी आँखें बंद करने को विवश हो गए। जब प्रकाश धीरे-धीरे शांत हुआ…
तो सबकी दृष्टि एक ही वस्तु पर जाकर ठहर गई। वहाँ, टूटे हुए क्रिस्टल के बीच, एक अद्भुत स्वर्णिम छड़ी पड़ी थी। उसकी सतह पर दिव्य लिपियाँ स्वयं प्रकाशित हो रही थीं। मानो उसके भीतर एक सम्पूर्ण ब्रह्मांड धड़क रहा हो। कालकूष की लाल आँखों में पहली बार लालच नहीं...
बल्कि जुनून दिखाई दिया। उसे तुरंत आभास हो गया कि यही वह शक्ति है, जिसके सहारे सम्पूर्ण सृष्टि को झुकाया जा सकता है। एक क्षण भी गँवाए बिना वह पूरी गति से छड़ी की ओर झपटा।
उधर राजा बेरो भी समझ चुके थे कि यदि यह दिव्य छड़ी कालकूष के हाथ लग गई, तो केवल स्वर्ग ही नहीं, सम्पूर्ण सृष्टि विनाश के कगार पर पहुँच जाएगी। उन्होंने अपनी समस्त दिव्य शक्ति एकत्रित की।
दोनों हाथ आकाश की ओर उठाए और एक प्राचीन मंत्र का उच्चारण किया। क्षणभर में जादुई छड़ी स्वर्णिम प्रकाश में लिपट गई। अगले ही पल…
वह बिजली की गति से स्वर्ग से बाहर निकल गई। प्रकाश की एक लंबी रेखा ब्रह्मांड को चीरती हुई अनंत अंतरिक्ष पार कर गई...
और दूर कहीं...
नव-निर्मित धरती पर जाकर अदृश्य हो गई। इतनी दूर...
कि स्वयं देवताओं की दृष्टि भी उसका पीछा न कर सकी। इतनी गहराई में...
कि उसकी दिव्य ऊर्जा भी संसार से छिप गई। कुछ क्षणों तक पूरे स्वर्ग में सन्नाटा छाया रहा। कालकूष वहीं खड़ा रह गया। उसकी मुट्ठियाँ कस गईं। उसकी आँखें क्रोध से रक्तिम हो उठीं। वह बिना पलक झपकाए राजा बेरो को देखता रहा। उसकी वह मौन दृष्टि किसी भी शब्द से अधिक भयानक थी। राजा बेरो समझ गए...
यह युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। यह तो केवल शुरुआत थी। कालकूष लौटेगा। और जब वह लौटेगा...
तो पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली सेना के साथ लौटेगा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा बेरो ने चारों ओर दृष्टि डाली। स्वर्ग, जो कभी दिव्य सौंदर्य का प्रतीक था, अब खंडहर में बदल चुका था। टूटे महल...
जलते उपवन...
और घायल देवता...
सब कुछ आने वाले संकट की चेतावनी दे रहे थे। तभी एक देवता ने व्याकुल होकर पूछा—
"प्रभु... वह कौन था?"
राजा बेरो कुछ क्षण मौन रहे। फिर गंभीर स्वर में बोले—
"आज हम उसका नाम नहीं जानते... पर वह अवश्य लौटेगा।"
एक अन्य देवता ने चिंतित होकर पूछा—
"क्या वह फिर स्वर्ग पर आक्रमण करेगा?"
राजा बेरो ने गहरी साँस ली।
"हाँ। और अगली बार वह दुगुनी शक्ति और कहीं अधिक विशाल सेना के साथ आएगा।"
सभा में मौन छा गया।
कुछ देर बाद एक युवा देवता बोला—
"यदि ऐसा है... तो हम उसे रोकेंगे कैसे?"
राजा बेरो ने उत्तर दिया—
"उसकी सेना को केवल एक ही शक्ति रोक सकती है..."
सभी देवता उनकी ओर देखने लगे। उन्होंने धीमे स्वर में कहा—
"दिव्य छड़ी।"
फिर उनकी दृष्टि दूर अंतरिक्ष की ओर चली गई। अब उनका भय केवल स्वर्ग के लिए नहीं था। उनकी चिंता उस नई दुनिया के लिए थी जिसका नाम था—
धरती।
क्योंकि अब जादुई छड़ी वहीं कहीं छिपी हुई थी। लेकिन कहाँ...
यह रहस्य स्वयं देवताओं से भी छिप चुका था। जादुई छड़ी के धरती पर गिरकर खो जाने के बाद राजा बेरो ने यह निश्चय किया कि अब केवल स्वर्ग की नहीं, बल्कि धरती की भी रक्षा करनी होगी। उन्हें भय था कि यदि यह जादुई छड़ी उस भयानक पिशाच या किसी लालची प्राणी के हाथ लग गई, तो पूरे ब्रह्मांड का संतुलन नष्ट हो जाएगा।
धरती की रक्षा करने और जादुई छड़ी की खोज के उद्देश्य से राजा बेरो ने स्वर्ग के सभी देवी-देवताओं को साथ लिया। सभी देवता मनुष्य का रूप धारण करके धरती पर आ बसे और गुप्त रूप से जादुई छड़ी की तलाश शुरू कर दी। किन्तु राजा बेरो इस बात से अनजान थे कि वे अकेले इस खोज में नहीं थे। एक और शक्ति भी उसी छड़ी की तलाश में धरती पर उतर चुकी थी...
पिशाच कालकूष और उसकी पूरी फौज
जब राजा बेरो ने युद्ध के दौरान जादुई छड़ी को अपने दिव्य मंत्रों से स्वर्ग से बहुत दूर धरती पर फेंक दिया था, तभी कालकूष समझ गया था कि वह कोई साधारण छड़ी नहीं, बल्कि अपार शक्तियों का स्रोत है। उसी क्षण उसने निश्चय कर लिया था कि चाहे कितने ही युग क्यों न बीत जाएँ, वह उस छड़ी को खोजकर रहेगा।
इसी कारण वह देवताओं से भी पहले धरती पर पहुँच गया। किन्तु उसकी सबसे बड़ी समस्या वही थी जो देवताओं की थी—उसे भी यह नहीं पता था कि जादुई छड़ी धरती के किस भाग में छिपी हुई है। अब धरती पर दो अदृश्य शक्तियाँ सक्रिय थीं। एक ओर थे देवता, जो छड़ी की रक्षा करना चाहते थे।
दूसरी ओर था पिशाच कालकूष, जो उसी छड़ी की शक्ति से पूरे ब्रह्मांड पर अपना आधिपत्य स्थापित करना चाहता था। धरती के साधारण मनुष्य इन दोनों शक्तियों के अस्तित्व से पूरी तरह अनजान थे। उन्हें यह भी पता नहीं था कि उनके चारों ओर एक ऐसा अदृश्य युद्ध चल रहा है, जिसका परिणाम पूरी मानव जाति का भविष्य तय करेगा। सदियाँ बीत गईं...
देवताओं ने पर्वतों, वनों, रेगिस्तानों, समुद्रों और धरती के अनगिनत रहस्यमय स्थानों की खोज की। उधर कालकूष और उसकी काली सेना ने भी धरती का चप्पा-चप्पा छान डाला। फिर भी जादुई छड़ी किसी के हाथ नहीं लगी। असंख्य वर्षों की निष्फल खोज के बाद देवताओं ने निर्णय लिया कि जब तक छड़ी नहीं मिल जाती, वे धरती को छोड़कर नहीं जाएँगे।
उन्होंने धरती पर एक अत्यंत सुंदर, शांत और गुप्त स्थान को अपना निवास बनाया। उस स्थान का नाम था—
Cielo
एक ऐसा नगर, जिसका अस्तित्व केवल देवताओं को ज्ञात था और जहाँ किसी साधारण मनुष्य का पहुँचना लगभग असंभव था।
अध्याय 4- काली दुनिया का स्वामी
...........to be continued
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