मानवता का अंतिम चुनाव:
जब दुनिया कठोर हो जाए, तब इंसान कैसे बचे
जीवन की गहरी सच्चाई जो यह चित्र कहता है:
1. हर चोट शारीरिक नहीं होती,
- यहाँ टूटा हुआ काँच नहीं,
विश्वास और भावना टूट रही है।
सबसे गहरी चोट वही होती है, जो दिल पर लगती है— और बाहर दिखाई नहीं देती।
2. प्रेम की कमजोरी उसकी सच्चाई है
- जो दिल खुला रखता है,
वही सबसे अधिक टूटता है।
निर्दयता हमेशा ताकत नहीं होती,
अक्सर वह भीतर की खालीपन की चीख होती है।
3. जिसे हम अपना समझते हैं, वही सबसे अधिक तोड़ सकता है
- दुश्मन से चोट लगना अपेक्षित है,
पर अपनों से मिला आघात,
जीवन की दिशा बदल देता है।
4. शक्ति और क्रूरता में अंतर है
- जो लात मार रहा है,
वह शक्तिशाली नहीं—
वह अपने भीतर की हार छुपा रहा है।
और जो टूटे दिल को थामे है,
वह कमज़ोर नहीं—
वह अब भी महसूस कर सकता है।
5. जीवन हमें सिखाता है: -हर किसी को अपना दिल सौंपना बुद्धिमानी नहीं
पर यह भी सिखाता है कि
दिल होना ही मानव होने का प्रमाण है।
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दार्शनिक सार
जीवन में सबसे बड़ा अपराध दिल का टूटना नहीं,
बल्कि टूटे दिल को तोड़ते रहना है।
एक गहरी, पीड़ाभरी कविता—
दिल का काँच
उसके हाथों में दिल था,
काँच का नहीं—
भरोसे का,
सपनों का।
और सामने खड़ा था
कोई अजनबी नहीं,
वही जिसे
उसने अपना कहा था।
एक लात…
और आवाज़ आई—
काँच टूटने की नहीं,
विश्वास बिखरने की।
दिल अब भी धड़क रहा था,
टुकड़ों में सही,
पर मारने वाला
कभी महसूस ही नहीं कर पाया
कि उसने क्या खोया।
जिसने ठोकर मारी,
वह मज़बूत नहीं था—
वह खाली था।
और जो टूटे दिल को
दोनों हाथों से थामे बैठी रही,
वह कमज़ोर नहीं थी—
वह अब भी इंसान थी।
क्योंकि
दिल टूट जाना हार नहीं,
पर
दिल न होना
सबसे बड़ी हार है।
जब दिल काँच बन जाता है: शक्ति, क्रूरता और मानवता का दर्शन
इस तस्वीर में दिखाई देता दृश्य केवल एक क्षण नहीं है,
यह मानव संबंधों की सबसे असहज सच्चाई का प्रतीक है।
एक व्यक्ति दिल को ठोकर मार रहा है।
दिल काँच का है—पारदर्शी, नाज़ुक, सच्चा।
और दूसरा व्यक्ति उस टूटते दिल को
दोनों हाथों से थामे बैठा है—
जैसे अभी भी बचाने की कोशिश कर रहा हो।
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यह दृश्य पूछता है:
क्या ताकत तोड़ने में है, या सहने में?
दिल क्यों टूटता है?
दिल इसलिए नहीं टूटता कि वह कमज़ोर है,
बल्कि इसलिए टूटता है क्योंकि वह खुला होता है।
जो महसूस करता है, वही जोखिम उठाता है।
जो प्रेम करता है, वही चोट खाता है।
इस संसार में
- संवेदनशील होना,
धीरे-धीरे अपराध बना दिया गया है।
क्रूरता का भ्रम
-
जो व्यक्ति दिल को ठोकर मार रहा है,
वह शक्तिशाली प्रतीत होता है—
पर दर्शन कहता है,
क्रूरता शक्ति नहीं, असफल आत्मरक्षा है।
जो भीतर खाली होता है,
वह बाहर तोड़ता है।
जो भीतर टूटा होता है,
वह दूसरों को तोड़ने में
अपनी हार छुपाता है।
सहना कमज़ोरी नहीं
-
जिसने टूटे दिल को थामा है,
वह हार नहीं रहा—
वह अब भी मानव है।
आज की दुनिया में
दिल बचा कर रखना ही
सबसे बड़ा साहस बन गया है।
जीवन की कठोर सीख
-
यह तस्वीर सिखाती है कि—
हर कोई हमारे दिल को संभालने योग्य नहीं होता,
हर प्रेम सुरक्षित नहीं होता,
और हर चोट हमें कठोर नहीं,
कभी-कभी अधिक सचेत बनाती है
लेकिन यह भी सिखाती है कि,
दिल टूटने के बाद भी,
दिल रखना ही,
मनुष्य होने की अंतिम पहचान है।
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दार्शनिक निष्कर्ष
टूट जाना जीवन की विफलता नहीं है,
पर टूटे हुए दिल को कुचल देना
मानवता की विफलता है।
जीवन हमें यह नहीं सिखाता कि
कैसे कभी न टूटें,
बल्कि यह सिखाता है कि
टूटने के बाद भी
इंसान कैसे बने रहें।
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टूटते रिश्ते, बचती मानवता
जब दिल काँच बन जाता है
इस तस्वीर में दिल टूटता हुआ दिखता है,
पर असल में यहाँ मानवता की परीक्षा चल रही है।
एक व्यक्ति दिल को ठोकर मार रहा है।
दूसरा उसे दोनों हाथों से थामे है।
यह दृश्य पूछता है—
क्या शक्ति तोड़ने में है, या संभालने में?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं,
जहाँ भावनाएँ कमजोरी समझी जाने लगी हैं।
जो ज़्यादा महसूस करता है,
वही ज़्यादा चोट खाता है।
पर दर्शन कहता है—
दिल का टूटना दुर्भाग्य नहीं,
दिल का पत्थर बन जाना दुर्भाग्य है।
जो ठोकर मारता है,
वह अक्सर अपने भीतर की हार छुपा रहा होता है।
और जो टूटे दिल को थामे रहता है,
वह हार नहीं रहा—
वह अब भी इंसान है।
यह लेख किसी एक रिश्ते की बात नहीं करता।
यह उस समाज की कहानी है,
जहाँ प्रेम जोखिम बन गया है,
और संवेदनशीलता अपराध।
यह श्रृंखला उन सवालों की है—
हम कब इतने कठोर हो गए?
दिल बचाने के नाम पर दिल खो तो नहीं रहे?
और क्या टूटने के बाद भी,
इंसान बने रहना संभव है?
क्योंकि दिल टूट सकता है,
पर अगर वह धड़कता रहे—
तो कहानी अभी खत्म नहीं होती।
टूटते रिश्ते, बचती मानवता
क्रूरता कहाँ से जन्म लेती है?
क्रूरता अचानक पैदा नहीं होती।
वह किसी एक क्षण का निर्णय नहीं,
बल्कि वर्षों से भीतर जमा हुई
अस्वीकृति, अपमान और डर की परछाईं होती है।
जो व्यक्ति दूसरों के दिल को ठोकर मारता है,
वह अक्सर पहले ही
अपने ही भीतर बहुत कुछ हार चुका होता है।
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क्रूर लोग मज़बूत नहीं होते
दर्शन कहता है—
सच्ची शक्ति में संयम होता है।
और जहाँ संयम नहीं,
वहाँ शक्ति नहीं, केवल असुरक्षा होती है।
जो अपने भीतर की पीड़ा को
समझ नहीं पाता,
वह उसे दूसरों पर उतार देता है।
इसीलिए अक्सर देखा जाता है—
जो सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाता है,
वही सबसे ज़्यादा डरा हुआ होता है।
दर्द का स्थानांतरण
मानव मन एक अजीब रक्षा करता है।
जिस दर्द को वह सह नहीं पाता,
उसे आगे बढ़ा देता है।
जिसे प्रेम में ठुकराया गया,
वह प्रेम को अपमानित करता है।
जिसे सुना नहीं गया,
वह दूसरों की आवाज़ दबाता है।
इसे ही मनोविज्ञान कहता है—
Hurt people hurt people.
पर दर्शन पूछता है—
क्या यह कारण है, या केवल बहाना?
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अहंकार: क्रूरता का मुखौटा
अहंकार अक्सर आत्मविश्वास का अभिनय करता है,
पर भीतर वह
स्वीकृति की भूख छुपाए रहता है।
जो स्वयं को स्वीकार नहीं कर पाता,
वह दूसरों को भी
स्वीकार नहीं कर सकता।
इसलिए क्रूरता
हमेशा ऊँची आवाज़ में बोलती है,
क्योंकि भीतर
बहुत सन्नाटा होता है।
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संवेदनशीलता पर हमला
आज की दुनिया में
संवेदनशील होना जोखिम बन गया है।
जो ज़्यादा महसूस करता है,
उसे “कमज़ोर” कहा जाता है।
पर सच यह है—
संवेदनशीलता वह भूमि है
जहाँ करुणा, प्रेम और नैतिकता जन्म लेती है।
और क्रूरता उसी भूमि पर हमला करती है।
दर्शन का स्पष्ट निष्कर्ष
क्रूरता शक्ति नहीं,
असफल आत्म-रक्षा है।
मनुष्य या तो
अपने दर्द को समझना सीखता है,
या उसे दूसरों पर थोप देता है।
यही दो रास्ते हैं।
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आत्मचिंतन के लिए
क्या मैंने कभी अपने दर्द को
किसी और पर उतारा है?
क्या मेरी कठोरता
किसी पुराने डर की ढाल है?
इन प्रश्नों के उत्तर
आसान नहीं होते—
पर ईमानदार होते हैं।
प्रेम जोखिम क्यों बन गया है?
एक समय था जब प्रेम जीवन की सुरक्षा माना जाता था।
आज वही प्रेम
जोखिम कहलाने लगा है।
लोग कहते हैं—
“ज़्यादा जुड़ो मत”,
“दिल संभाल कर दो”,
“आज के ज़माने में प्रेम महँगा पड़ता है।”
प्रश्न यह नहीं कि प्रेम बदल गया है,
प्रश्न यह है कि
हम किससे डरने लगे हैं?
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डर का नया नाम: समझदारी
आज प्रेम से पहले
लोग सुरक्षा खोजते हैं—
गारंटी, शर्तें, सीमाएँ।
क्योंकि प्रेम में
नियंत्रण नहीं होता,
और आधुनिक मन
नियंत्रण के बिना
असहज हो जाता है।
हम चोट से नहीं डरते,
हम उस असहाय स्थिति से डरते हैं
जहाँ हम कुछ बचा नहीं पाते।
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असफल प्रेम की स्मृतियाँ
अधिकांश लोग
प्रेम से इसलिए नहीं भागते,
कि उन्होंने प्रेम नहीं किया,
बल्कि इसलिए कि
उन्होंने प्रेम में टूटना सीखा।
एक अधूरा रिश्ता
दस नए रिश्तों को
संदेह से भर देता है।
और धीरे-धीरे
दिल अनुभव से नहीं,
डर से निर्णय लेने लगता है।
स्वार्थ का सुरक्षित विकल्प
जहाँ प्रेम जोखिम है,
वहाँ स्वार्थ सुरक्षित लगता है।
स्वार्थ में दर्द कम है,
क्योंकि अपेक्षा कम है।
पर अर्थ भी कम है।
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प्रेम में
हम स्वयं को दाँव पर लगाते हैं,
इसीलिए वह
जीवन का सबसे बड़ा जुआ है—
और सबसे बड़ा उपहार भी।
संवेदनशीलता बनाम चतुराई
आज चतुर होना
संवेदनशील होने से
ज़्यादा बुद्धिमानी माना जाता है।
पर दर्शन कहता है—
चतुर लोग जीवन संभाल लेते हैं,
संवेदनशील लोग
जीवन को जीते हैं।
जो प्रेम से डरता है,
वह असल में
अपने टूटने से नहीं,
अपने सच से डरता है।
दार्शनिक निष्कर्ष
प्रेम इसलिए जोखिम नहीं है
कि वह तोड़ सकता है,
प्रेम जोखिम है
क्योंकि वह हमें
नकाब के बिना जीने को कहता है।
जीवन में
सबसे सुरक्षित लोग
अक्सर सबसे अकेले होते हैं।
और जो जोखिम उठाते हैं,
वे टूटते भी हैं—
पर कभी-कभी
पूरा जीवन भी पा लेते हैं।
आत्मचिंतन के लिए
क्या मैं प्रेम से डरता/डरती हूँ,
या उस पीड़ा से
जो प्रेम मुझे स्वयं से दिखा सकता है?
क्या मेरी सावधानी
समझ है,
या डर का दूसरा नाम?
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टूटने के बाद क्या बचता है?
जब कुछ टूटता है,
तो सबसे पहले आवाज़ आती है।
दिल टूटने पर
आवाज़ नहीं आती—
बस भीतर कुछ चुप हो जाता है।
टूटना केवल नुकसान नहीं होता,
वह एक विराम होता है।
जहाँ जीवन रुकता है,
और पहली बार
खुद से प्रश्न करता है।
सब कुछ नहीं टूटता
जब रिश्ता टूटता है,
तो विश्वास घायल होता है,
पर अनुभव बच जाता है।
जब सपना टूटता है,
तो उम्मीद डगमगाती है,
पर दिशा बच जाती है।
जीवन हमेशा
सब कुछ नहीं छीनता—
वह कुछ छोड़ जाता है,
ताकि हम नए ढंग से
चल सकें।
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स्मृति बोझ भी है, पुल भी
टूटने के बाद
स्मृतियाँ सबसे भारी लगती हैं।
वे बार-बार लौटती हैं—
दर्द बनकर।
पर समय के साथ
यही स्मृतियाँ
सीख में बदल जाती हैं।
जो व्यक्ति
स्मृति को शत्रु बना लेता है,
वह अटका रहता है।
और जो स्मृति को शिक्षक मान लेता है,
वह आगे बढ़ता है।
अकेलापन और एकांत
टूटने के बाद
अकेलापन आता है।
पर दर्शन कहता है—
अकेलापन पीड़ा है,
एकांत संभावना।
एकांत में
हम पहली बार
अपनी ही आवाज़ सुनते हैं—
बिना शोर के।
टूटन से जन्मी करुणा
जो कभी टूटा है,
वह दूसरों को
कम तोड़ता है।
दर्द ने
उसे कठोर नहीं,
अक्सर अधिक मानवीय बनाया है।
यही कारण है कि
सबसे कोमल लोग
अक्सर सबसे ज़्यादा टूटे होते हैं।
दार्शनिक निष्कर्ष
टूटना जीवन का अंत नहीं,
अहंकार का अंत है।
टूटने के बाद
जो बचता है,
वह सजावट नहीं—
सत्य होता है।
और सत्य के साथ
जीवन
धीरे, पर गहराई से
दोबारा शुरू होता है।
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आत्मचिंतन के लिए
मेरे टूटने ने
मुझसे क्या छीना,
और क्या दिया?
क्या मैं अपने टूटे हिस्सों को
दुश्मन समझता/समझती हूँ
या मार्गदर्शक?
क्या संवेदनशील इंसान इस दुनिया में सुरक्षित है?
यह प्रश्न आज हर संवेदनशील व्यक्ति के मन में है—
क्या इस दुनिया में कोमल रहकर जिया जा सकता है?
क्योंकि चारों ओर
तेज़ आवाज़ें हैं,
कठोर निर्णय हैं,
और भावनाओं को
कमज़ोरी मानने की आदत है।
संवेदनशीलता का गलत अर्थ
संवेदनशील होना
रोना या टूट जाना नहीं है।
संवेदनशील होना है—
महसूस कर पाना,
दूसरे की पीड़ा को समझ पाना,
और अपने भीतर नैतिकता को जीवित रखना।
पर दुनिया ने
संवेदनशीलता को
असुरक्षा के रूप में देखना शुरू कर दिया है।
खतरा कहाँ है?
संवेदनशील इंसान
इसलिए खतरे में नहीं है
कि वह कमज़ोर है,
बल्कि इसलिए कि
वह देर से सीमा खींचता है।
वह ज़्यादा सह लेता है,
ज़्यादा समझ लेता है,
और कई बार
अपने ही नुकसान की कीमत पर
दूसरों को बचाता है।
कोमलता + विवेक
दर्शन कहता है—
केवल कोमलता पर्याप्त नहीं,
और केवल कठोरता विनाशकारी है।
संवेदनशील व्यक्ति
जब विवेक सीख लेता है,
तब वह टूटता नहीं—
वह सुरक्षित हो जाता है।
सीमाएँ
संवेदनशीलता की दुश्मन नहीं,
उसकी ढाल हैं।
पत्थर बनना समाधान नहीं
दुनिया से बचने के लिए
पत्थर बन जाना
आसान रास्ता है।
पर पत्थर
दर्द से तो बच जाता है,
अर्थ से भी वंचित हो जाता है।
संवेदनशील व्यक्ति
जब कठोर नहीं,
सजग बनता है,
तभी वह जीवित भी रहता है
और मानवीय भी।
दार्शनिक निष्कर्ष
संवेदनशील इंसान असुरक्षित नहीं,
वह असुरक्षित तब होता है
जब वह स्वयं को
दुनिया के भरोसे छोड़ देता है।
संवेदनशीलता
अगर आत्म-ज्ञान से जुड़ जाए,
तो वह कमजोरी नहीं—
शक्ति का सबसे शांत रूप बन जाती है।
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आत्मचिंतन के लिए
क्या मेरी संवेदनशीलता
मेरी सीमा पहचानती है?
क्या मैं दूसरों को समझते-समझते
स्वयं को अनसुना तो नहीं कर रहा/रही?
(समापन): मानवता का अंतिम चुनाव
हर युग के अंत में
मनुष्य के सामने एक ही प्रश्न खड़ा होता है—
हम जैसे हैं, वैसे ही बन जाएँ
या जैसे होना चाहिए, वैसे बने रहें?
आज की दुनिया
तेज़ है, कठोर है, व्यावहारिक है।
यह सिखाती है—
कम महसूस करो,
ज़्यादा बचो,
और सबसे पहले
खुद को सुरक्षित रखो।
पर यहीं
मानवता का अंतिम चुनाव शुरू होता है।
पत्थर बनना या इंसान रहना
जब दिल टूटता है,
तो दो रास्ते खुलते हैं।
पहला—
खुद को बंद कर लेना,
कठोर हो जाना,
और कहना:
“अब मुझसे कोई उम्मीद न रखे।”
दूसरा—
दर्द को स्वीकार करना,
सीख को सँभालना,
और फिर भी
दिल को पूरी तरह न खोना।
पहला रास्ता,
सुरक्षित लगता है।
दूसरा रास्ता,
सार्थक होता है।
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दुनिया नहीं बदलेगी, पर हम बदल सकते हैं
मानवता का संकट
इसलिए नहीं है
कि दुनिया निर्दयी है,
बल्कि इसलिए है
कि अच्छे लोग
थक गए हैं।
पर दर्शन कहता है—
हर व्यक्ति
दुनिया नहीं बदलता,
पर हर व्यक्ति
अपने चुनाव से
दुनिया का एक कोना बदलता है।
संवेदनशीलता का अंतिम अर्थ
संवेदनशील रहना
अब मासूमियत नहीं,
जिम्मेदारी है।
इसका अर्थ है—
सीमाओं के साथ करुणा,
विवेक के साथ प्रेम,
और साहस के साथ सत्य।
संवेदनशीलता
जब चेतना से जुड़ जाती है,
तो वह टूटती नहीं—
वह मार्ग दिखाती है।
अंतिम सत्य
मानवता का अंतिम चुनाव यह नहीं है
कि हम टूटेंगे या नहीं,
बल्कि यह है
कि टूटने के बाद
हम क्या बनेंगे।
पत्थर—
जो कुछ महसूस नहीं करता।
या इंसान—
जो महसूस करता है,
फिर भी
क्रूर नहीं बनता।
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श्रृंखला का अंतिम प्रश्न (पाठक के लिए)
जब दुनिया
आपको कठोर बनने के
हज़ार कारण दे—
तब आप
किसे चुनेंगे?
समापन भाव
यह श्रृंखला
दुनिया को बदलने का दावा नहीं करती।
यह केवल इतना चाहती है कि
कुछ लोग
अपना दिल पूरी तरह न खो दें।
क्योंकि जब इंसान
दिल बचाते-बचाते
दिल ही खो देता है,
तब मानवता
वास्तव में हारती है।
जब दिल काँच बन जाता है
इस तस्वीर में टूटता हुआ दिल
कमज़ोरी नहीं,
सच्चाई का प्रमाण है।
जो दिल खोलकर देता है,
वही सबसे ज़्यादा टूटता है।
और जो ठोकर मारता है,
वह ताक़तवर नहीं—
वह भीतर से खाली होता है।
क्रूरता शक्ति नहीं,
असफल आत्मरक्षा है।
और सहना हार नहीं,
मानवता की अंतिम परीक्षा है।
जीवन हमें यह नहीं सिखाता
कि कैसे कभी न टूटें,
बल्कि यह सिखाता है
कि टूटने के बाद भी
दिल कैसे बचाए रखें।
दिल टूट जाना त्रासदी नहीं,
दिल न होना सबसे बड़ी हार है।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं
जहाँ दिल बचाना समझदारी कहलाता है
और दिल रखना जोखिम।
यह श्रृंखला
उन लोगों के लिए है
जो टूटे हैं,
पर पत्थर नहीं बने।
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जब दिल काँच बन जाता है
दिल का टूटना कमजोरी नहीं,
सच्चाई का प्रमाण है।
जो दिल खोलता है,
वही चोट खाता है।
और जो ठोकर मारता है,
वह ताक़तवर नहीं—
अक्सर भीतर से खाली होता है।
यह लेख पूछता है—
क्या शक्ति तोड़ने में है,
या संभालने में?
दिल टूट जाना त्रासदी नहीं,
दिल न होना सबसे बड़ी हार है।
क्रूरता कहाँ से जन्म लेती है?
क्रूरता अचानक नहीं आती।
वह वर्षों से भीतर जमा
डर और अस्वीकार की परछाईं होती है।
जो दूसरों को तोड़ता है,
वह अक्सर
अपने दर्द से भाग रहा होता है।
क्रूरता शक्ति नहीं,
असफल आत्म-रक्षा है।
प्रेम जोखिम क्यों बन गया है?
आज प्रेम से पहले
लोग सुरक्षा खोजते हैं।
क्योंकि प्रेम
नियंत्रण नहीं देता,
और आधुनिक मन
नियंत्रण के बिना डरता है।
प्रेम जोखिम है
क्योंकि वह हमें
नकाब के बिना जीने को कहता है।
सहना कमजोरी है या चेतना?
सहना और दबाना
एक जैसे नहीं होते।
जो समझ से चुप रहता है,
वह ऊर्जा बचाता है।
जो डर से चुप रहता है,
वह स्वयं को खो देता है।
सहना तभी चेतना है
जब उसमें
स्व-सम्मान जीवित हो।
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टूटने के बाद क्या बचता है?
टूटना अंत नहीं,
एक विराम है।
सब कुछ नहीं टूटता—
अनुभव बचता है,
दिशा बचती है,
और कभी-कभी
अहंकार समाप्त हो जाता है।
टूटना जीवन का अंत नहीं,
अहंकार का अंत है।
क्या संवेदनशील इंसान इस दुनिया में सुरक्षित है?
संवेदनशील होना कमजोरी नहीं,
पर बिना सीमा के संवेदनशील होना
खतरनाक है।
कोमलता + विवेक
-यही सुरक्षा है।
पत्थर बनना समाधान नहीं,
सजग इंसान बनना समाधान है।
मानवता का अंतिम चुनाव
हर टूटन के बाद
दो रास्ते होते हैं—
पत्थर बन जाना
या
इंसान बने रहना।
दुनिया नहीं बदलेगी,
पर हमारा चुनाव
दुनिया का एक कोना बदल सकता है।
मानवता का अंतिम चुनाव यह नहीं -
कि हम टूटेंगे या नहीं,
बल्कि यह है
कि टूटने के बाद
हम क्या बनेंगे।
दुनिया को बदलने का दावा नहीं करती।
यह बस इतना चाहती है कि
कुछ लोग
दिल बचाते-बचाते
दिल खो न दें।
क्योंकि
- जब इंसान दिल खो देता है,
तब मानवता सच में हारती है।
नोट:- आपको यह जानकारी कैसी लगी, कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में बताएं। आपकी राय हमारे लिए बहुत ज़रूरी है।
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