Taj Mahal

Taj-Mahal-ताज-महल -True love story (Agra - India)




Taj Mahal- ताज महल

The story of the Taj Mahal is linked to a deep love story. This historical monument is located in the city of Agra in the Indian state of Uttar Pradesh and is made of white marble. The Taj Mahal was built by the Mughal emperor Shah Jahan in memory of his wife Mumtaz Mahal.

All of us have heard many stories of history, reads, and have seen all the films made on them all. Because of which we have been able to know about the past history of all those people. One story from all the stories in history is of such a person. Who sacrificed everything for the sake of his love, even for the sake of his love, he oppressed those same 20,000 innocent people. Who had helped him for 22 years for his love, and after all this, his son imprisoned him inside a fort. Then after sometime in the fort, after the passage of time Then he died suddenly in the same fort. You may be thinking What am I talking about,

yes i am talking about that person whose love to see people coming from thousands to far away from country and also comes from abroad. and after seeing his love from there, While going back, people often see their love over and over again. I am talking about Ella Azad Abul Muzaffar Shahab Ud-Din Mohammad Shahjahan, Shah Jahan means the King of the world. Shah Jahan made such a pattern in memory of his love Which was announced in the world's New 7 Wonders. And made it the first winner (2000-2007). And this winner is named Taj Mahal. Which is located in the city of Agra, India.

ताज महल की कहानी एक गहरी प्रेम कथा से जुड़ी हुई है। यह ऐतिहासिक स्मारक भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है और इसे सफेद संगमरमर से बनाया गया है। ताज महल को मुग़ल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में बनवाया था।

वैसे तो हम सबने इतिहास की बहुत सी प्रेम कहानियाँ सुनी है, पढ़ी भी है, और उन सब पर बनी सभी फिल्में भी देखी है। जिसके कारण हम उन सभी लोगों के बीते हुए इतिहास के बारे में जान पाए है। इतिहास की सभी कहानियों में से एक कहानी एक ऐसे इंसान की है। जिसने अपने प्रेम की खातिर अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया, यहाँ तक की उसने अपने प्रेम की खातिर उन्हीं 20,000 बेकुसूर लोगों पर अत्याचार किया। जिन्होंने उसके प्रेम के खातिर 22 सालो तक उसकी मदद की थी और फिर इन सब के बाद, उसी के बेटे ने उसे एक किले के अन्दर कैद करवा दिया। फिर किले में कुछ समय बीत जाने के बाद। फिर उसी किले में उसकी अचानक मौत हो गई। आप सोच रहे होंगे। की मैं किसकी बात कर रहा हूँ,

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ उस इंसान की जिसके प्रेम को देखने के लिए लोग दूर-दूर से हजारों की संख्या में आते है विदेशों से भी आते है और उसके प्रेम को एक बार देखने के बाद वहाँ से वापस जाते समय लोग बार-बार उसके प्रेम को पलटकर देखते रहते है। मैं बात कर रहा हूँ एला आज़ाद अबुल मुजफ्फर शहाब उद-दिन मोहम्मद शाहजहाँ की, शाहजहाँ मतलब होता है दुनिया का राजा। शाहजहाँ ने अपने प्रेम की याद में एक ऐसा नमुना बना दिया। जिसे दुनिया के न्यू 7 वंडर्स में घोषित किया। और इसे (2000-2007)तक का पहला विजेता बना दिया। और इस विजेता का नाम है ताज महल। जो हिन्दुस्तान के आगरा शहर में स्थित है।






Probably because today, some 3 million people a year (or around 45,000 a day) visit the Taj Mahal. Taj Mahal, built by Shah Jahan in memory of his beloved wife Mumtaz

शायद इसलिए आज, लगभग 3 मिलियन लोग एक वर्ष ( एक दिन में लगभग 45,000) ताजमहल का दौरा करते हैं। ताज महल जिसे शाहजहाँ ने अपनी जान से प्यारी पत्नी मुमताज की याद में बनवाया था।

Shah Jahan was born on January 5, 1592 in Lahore. Shahjahan's full name was Ella Azad Abul Muzaffar Shahab Ud-Din Mohammed Shah Jahan. His father's name was Mirza noor-ud-Din Beg Muhammad Khan Salim, who is known by his royal name, Jahangir, Jahangir was the fourth Mughal emperor who ruled from 1605 to 1627 until his death in 1627, after the death of his father Jahangir, Shahjahan at the young age, The successor of the throne was chosen.

शाहजहाँ का जन्म 5 जनवरी 1592 लाहौर पाकिस्तान में हुआ था। शाहजहाँ का पूरा नाम एला आज़ाद अबुल मुजफ्फर शहाब उद-दिन मोहम्मद शाहजहाँ था। उनके पिता का नाम मिर्ज़ा नूर-उद-दीन बेग मुहम्मद खान सलीम जिन्हें उनके शाही नाम से जाना जाता है, जहाँगीर। जहाँगीर चौथे मुग़ल सम्राट थे, जिन्होंने 1605 से 1627 तक अपनी मृत्यु तक शासन किया। 1627 में अपने पिता जहाँगीर की मौत के बाद शाहजहाँ को छोटी सी उम्र में ही उन्हें मुगल सिंहासन के उत्तराधिकारी चुन लिया गया।


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As Shahjahan's Mughal Emperor was formed, Shah Jahan started developing his empire with speed. During this time there were many marriages of Shahjahan. And Shah Jahan also stayed with all his wives. But today his name is taken only with one. And that's the name, Mumtaz. Mumtaz's full name was Arjumand Bano Begum. Mumtaz gave birth to 14 children in 19 years and then Mumtaz died at the age of 40. Mumtaz died on June 17, 1631. Shah Jahan loved his wife Mumtaz very much. Mumtaz's death broke Shahjahan's heart inside.

शाहजहाँ के मुग़ल सम्राट बनते ही, शाहजहाँ ने तेजी के साथ अपने सम्राज्य का विकास करना शुरू कर दिया। इस दौरान शाहजहाँ की कई शादियाँ हुई। और शाहजहाँ अपनी सभी पत्नियों के साथ भी रहे। लेकिन आज उनका नाम सिर्फ एक के साथ ही लिया जाता है। और वो नाम है, मुमताज़। मुमताज़ का पूरा नाम था अरजुमंद बानो बेगम। मुमताज़ ने १९ साल में १४ बच्चों को जन्म दिया और फिर ४० साल की उम्र में मुमताज़ की मौत हो गई। 17 जून 1631 को मुमताज़ की मौत हो गई। शाहजहाँ अपनी पत्नी मुमताज़ से बहुत ही प्रेम करते थे। मुमताज़ की मौत ने शाहजहां के दिल को अंदर से तोड़ दिया।




Because of which Shahjahan started to be depressed. As the days passed. Shahjahan started going towards darkness And gradually he started getting old, then one day Shah Jahan thought of making a very beautiful tomb in memory of his dear wife Mumtaz.

जिसके कारण शाहजहाँ उदास रहने लगे। जैसे-जैसे दिन बीतते गए। शाहजहाँ अंधेरे की ओर जाने लगे। और धीरे-धीरे वो बूढ़े होने लगे, फिर एक दिन शाहजहाँ ने अपनी प्रिय पत्नी मुमताज़ की याद में एक बहुत ही खूबसूरत मकबरा बनाने की सोची।

After Mumtaz's death, his body was buried in Jainabagh on the banks of Tapti river. After that the construction of the Taj Mahal was started. Which started on the banks of Yamuna river. And after 12 years, Mumtaz's body was buried in the Taj Mahal under construction. Artisans from abroad and abroad were invited to build the Taj Mahal. To make Taj Mahal. A total of 20,000 artisans were engaged. And 1000 elephants who used to carry the burden, to make Taj Mahal the most unique. It used 28 different types of stones, these stones were brought from different places in Rajasthan, Baghdad, Tibet, Iran, Egypt, Afghanistan, etc.

मुमताज़ की मौत के बाद उनके शरीर को ताप्‍ती नदी के किनारे जैनाबाग में जमानती तौर पर दफन कर दिया गया। उसके बाद ताजमहल को बनाने का कार्य शुरू हुआ। जो यमुना नदी के तट पर शुरू हुआ। और फिर 12 साल बाद मुमताज़ के शरीर को निर्माणाधीन ताजमहल में दफन किया गया। ताजमहल को बनाने के लिए देश-विदेश से कारीगरों को बुलवाया गया। ताजमहल को बनाने के लिए। कुल 20,000 कारीगर लगे थे। और 1000 हाथी जो बोझा ढोने का काम करते थे, ताजमहल को सबसे अनोखा बनाने के लिए। इसमें २८ अलग-अलग तरह के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है, ये पत्थर राजस्थान, बगदाद, तिबत , ईरान, मिस्र, आफगानिस्तान, इत्यादि, अलग-अलग जगहों से लाये गए थे।



Making Taj Mahal -

It took 22 years to make. (From 1631 AD to 1653 AD) In the Taj Mahal, the Taj Mahal, sometimes with its white colored stones, changes its color. In the hot sunshine of 2 to 3 o'clock in the summer, the Taj Mahal looks very bright white. And as soon as the evening starts to happen. The Taj Mahal seems to be light pink and light blue for some time.

ताजमहल को बनाते-

बनाते २२ साल लग गए। (From 1631 AD to 1653 AD) ताजमहल में लगे सफ़ेद रंग के संगमार के पत्थरों से ताजमहल कभी-कभी अपना रंग बदल देता है। गर्मी के दिनों में २ से ३ बजे की तेज धुप में ताजमहल बिलकुल तेज चमकता हुआ सफ़ेद रंग का दिखाई देता है। और जैसे-जैसे शाम होने लगती है। ताजमहल कुछ देर के लिए, हल्का गुलाबी और हल्का नीला दिखाई देने लगता है।


To make Taj Mahal the most beautiful tomb in the world. Shah Jahan created many beautiful and beautiful artworks on the walls of the Taj Mahal, which is still seen on the walls of the Taj Mahal.Taj Mahal has been described as a very rare jewel of Muslim art in India,

शाहजहाँ ने ताजमहल को दुनिया का सबसे खूबसूरत मकबरा बनाने के लिए। शाहजहाँ ने ताजमहल की दीवारों पर बहुत सी सूंदर-सूंदर कलाएं बनवाई, जो आज भी ताजमहल की सूंदर दीवारों पर देखने को मिलती है। ताजमहल को भारत में मुस्लिम कला का एक बहुत ही नायाब गहना बताया गया है।

Perhaps it took 22 years to complete the Taj Mahal (1631 AD to 1653 AD)

शायद इसलिए ताजमहल को पूरा होने में 22 साल लग गए।(सन 1631 AD to 1653 AD)

The center point of the Taj Mahal is the tomb of white marble built on a square foundation basis. The tomb of Mumtaz Mahal and Shahjahan in the main chamber of this mausoleum The real grave is in a chamber just below the mausoleum made in the tomb. There are four tall towers around this tomb. Each tower is 40 meters high. These towers show the symmetrical tendency of the structure of the Taj Mahal. These towers have been built just like the towers to be built in the mosque. Each tower is divided into three equal parts by two shades. The last balcony is above the tower. Which has a umbrella similar to the main building. There is a special thing in all these towers. These four towers are tilted towards the outside. So that if the situation of the falling of these towers ever happened, then the towers fall from the outside. So that no damage can be reached to the main building.

ताज महल का केन्द्र बिंदु एक वर्गाकार नींव आधार पर बना श्वेत संगमर्मर का मक़बरा है। इस मकबरे के मुख्य कक्ष में मुमताज महल एवं शाहजहाँ की नकली कब्रें हैं, असली कब्र मकबरे में बनी नकली कब्रों के ठीक नीचे बने एक कक्ष में है, इस मकबरे के चारों ओर चार ऊँची मीनारें है। प्रत्येक मीनार 40 मीटर ऊँची है। यह मीनारें ताजमहल की बनावट की सममितीय प्रवृत्ति दर्शित करतीं हैं, यह मीनारें मस्जिद में अजा़न देने हेतु बनाई जाने वाली मीनारों के समान ही बनाईं गईं हैं, प्रत्येक मीनार को दो-दो छज्जों द्वारा तीन समान भागों में बंटी है। मीनार के ऊपर अंतिम छज्जा है। जिस पर मुख्य इमारत के समान ही छतरी बनी हैं। इन सभी मीनारों में एक खास बात है। यह चारों मीनारें बाहर की ओर हलकी सी झुकी हुईं हैं, जिससे कि कभी इन मीनारों की गिरने की स्थिति हुई, तो यह मीनारें बाहर की ओर ही गिरें। जिससे की मुख्य इमारत को कोई क्षति ना पहुँच सके।





There are two huge red sandstone buildings on either side of the Taj Mahal. Which is on the tomb. Their backwaters are linked to the eastern and western walls, and both are a reflection of each other. The western building is a mosque, and the eastern is called a reply. Whose primary objective is the Vastu Balance, and has been used as the Magistrate Room. There is a slight difference between these two buildings, that there is a vault in the mosque, in which there is a head towards Mecca. Whereas the geometrical specimens are made in the answer floor. While 569 prayers in the floor of the mosque are made of black marmalade in front of the bedouen (Ja-Namaz). The original form of the mosque is similar to the other mosques built by Shah Jahan. When the Taj Mahal was completed after 22 years. Then all the wealth of Shah Jahan was over. Shah Jahan made all the riches he had earned to make Taj Mahal, and after making the Taj Mahal, Shah Jahan cut off all those laborers. Who made the Taj Mahal.

ताजमहल के अगल-बगल दोनों ओर दो विशाल लाल बलुआ पत्थर की इमारतें हैं। जो कि मकबरे की ओर बनी हुई है। इनके पिछवाडे़ पूर्वी एवं पश्चिमी दीवारों से जुडे़ हैं, एवं दोनों ही एक दूसरे की प्रतिबिम्ब आकृति हैं। पश्चिमी इमारत एक मस्जिद है, एवं पूर्वी को जवाब कहते हैं। जिसका प्राथमिक उद्देश्य वास्तु संतुलन है, एवं आगन्तुक कक्ष की तरह प्रयुक्त होती रही है। इन दोनों इमारतों के बीच में थोड़ा सा अंतर यह है, कि मस्जिद में एक मेहराब कम है, उसमें मक्का की ओर आला बना है। जबकि जवाब के फर्श में ज्यामितीय नमूने बने हैं। जबकि मस्जिद के फर्श में 569 नमाज़ पढ़ने हेतु बिछौने (जा-नमाज़) के प्रतिरूप काले संगमर्मर से बने हैं। मस्जिद का मूल रूप शाहजहाँ द्वारा निर्मित अन्य मस्जिदों के समान ही है। जब ताजमहल २२ साल बाद बनकर पूरा हुआ। तब शाहजहाँ की सारी दौलत ख़त्म हो गई थी। शाहजहाँ ने अपनी कमाई हुई सारी दौलत को ताजमहल बनाने में लगा दी, और ताजमहल के बनाने के बाद शाहजहां ने उन सभी मजदूरों के हाँथ काट दिए। जिन्होंने ताजमहल को बनाया था।


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So that no other Taj Mahal could be formed. For this reason, big engineers of the country and abroad have not fully understood the structure of the Taj Mahal till date,

ताकि कोई दूसरा ताजमहल ना बन सके। श्याद इसीलिए देश-विदेश के बड़े-बड़े इंजीनियर भी आज तक ताजमहल की बनावट को पूरी तरह नहीं समझ पाए है।

Shah Jahan gave him so much wealth after cutting the hands of all the laborers. So that their future generation could also survive. After the distribution of wealth into artisans, the wealth left over. In the 17th century to build the Taj Mahal, 32 million rupees were spent, which means today 460192.00 million us dollar.

सभी मजदूरों के हाँथ कटवाने के बाद शाहजहाँ ने उन्हें इतनी दौलत दी। जिससे की उनकी आने वाली पीढ़ी भी गुजारा कर सके। कारीगरों में दौलत बांटने के बाद बची हुई दौलत खत्म हो गई। ताजमहल को बनाने में १७ वी. सदी में ३२ मिलियन रुपए लगे थे मतलब आज 460192.00 मिलियन us डॉलर



लाल-किला- Agra-red-fort-world-highest-site

When this news came to know that Shah Jahan's son Aurangzeb So he imprisoned his father Shah Jahan forever in the Red Fort of Agar. Which was built by Shah Jahan And after that Aurangzeb called his father Shahjahan a victim of madness. The Red Fort which was built on the other bank of Yamuna River in front of the Taj Mahal.

जब इस बात की खबर शाहजहाँ के बेटे औरंगजेब को पता चली, तो उसने अपने पिता शाहजहाँ को आगर के लाल किले में हमेशा के लिए कैद करवा दिया। जिसे शाहजहाँ ने ही बनवाया था। और उसके बाद औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को पागलपन का शिकार बताया। लाल किला जो ठीक ताजमहल के सामने यमुना नदी की दूसरी तट पर बना हुआ था।

Shah Jahan, who once used to be a brave king of the Mughal Emperor, became so crazy in his wife's love that his son Aurangzeb imprisoned his father Shah Jahan in the Red Fort of Agra. Shah Jahan was imprisoned in a prison in the Red Fort. There was a small window from which he used to see the Taj Mahal. And he used to remember all the past.

वो शाहजहाँ जो कभी मुग़ल सम्राट का एक बहादुर राजा हुआ करता था, वो अपनी पत्नी के प्रेम में इतना दीवाना हो गया, की उसी के बेटे औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के लाल किले में कैद करवा दिया। शाहजहाँ लाल किले के जिस कैदखाने में कैद थे, वहाँ पर एक छोटी सी खिड़की थी, जिसमे से वो झाकर ताजमहल को देखा करते थे।और अपने बीते हुए सभी पलों को याद करते थे।

After seeing the Taj Mahal all day long, when it was in the evening. So Shahjahan used to see the waters of the river Yamuna. Because as soon as the night was there and the moon went out in the sky.And when the moon put its light on the Taj Mahal, the Taj Mahal was shining like gold. Taj Mahal was seen in the river Yamuna when the Taj Mahal was shining, when Shahjahan saw the brightness of the Taj Mahal in the river Yamuna, he would feel closer to him.

सारा दिन खिड़की से ताजमहल को देखने के बाद, जब शाम होती थी। तो शाहजहाँ यमुना नदी के पानी को देखने लगते थे। क्योकि जैसे ही रात हो थी और आसमान में चाँद निकलता था।और जब चाँद अपनी रौशनी ताजमहल पर डालता था, ताजमहल सोने की तरह चमकने लगता था। ताजमहल के चमकते ही ताजमहल यमुना नदी में दिखने लगता था, जब शाहजहाँ यमुना नदी में ताजमहल की चमकती हुई परछाई को देखते तो उसे अपने करीब महसूस करते।


After a few years, on 22 January 1666, (age 74) of Shah Jahan suddenly died in the Red Fort (Agra). After Shah Jahan's death, the body of Shahjahan was taken out of the Red Fort (Agra). The way of Yamuna was brought in the Taj Mahal. And his grave was made right next to his beloved wife Mumtaz and was buried. This is the case that has passed over the years, but whenever someone sees Taj Mahal in Agra, it says, "This is the sign of love love" till date the Taj Mahal is listening to his love story, without saying anything.

फिर कुछ सालो बाद शाहजहाँ की 22 जनवरी 1666,(७४ उम्र ) को लाल किला में ही (आगरा) अचानक मौत हो गई। शाहजहाँ की मौत के बाद शाहजहाँ के शरीर को लाल किले (आगरा) में से निकालकर। यमुना नदी की रास्ते ताजमहल के अन्दर लाया गया। और उनकी कब्र ठीक उनकी प्रिय पत्नी मुमताज़ के बगल में ही बनाकर उन्हें दफना दिया गया। आज सालों बीत गए इस बात को लेकिन जब भी कोई आगरा में ताजमहल को देखता तो यह कहता है, "यह है, साचे प्रेम की निशानी" आज तक ताजमहल उनकी प्रेम कहानी को सुना रहा है, बिना कुछ कहे।

Today, in almost a year, 3 million people (about 45,000 in a day) visit the Taj Mahal. In 2007, it was declared the first winner of the World's New 7 Wonders (2000-2007).

आज, लगभग एक वर्ष में 3 मिलियन लोग( एक दिन में लगभग 45,000) ताजमहल का दौरा करते हैं। 2007 में इसे विश्व के न्यू 7 वंडर्स (2000-2007) पहला विजेता घोषित किया गया।


Time to trip now
Bhangarh-Fort-most haunted place





If you are thinking of walking around the Taj Mahal, then let us tell you that the Taj Mahal is closed on Friday. Time to open the Taj Mahal Time of day: Daily from sunrise to sunset (06:00 to 06:30) except on Friday. The Taj Mahal is closed every Friday and in the afternoon only Muslims are reached to pray. A 20-minute walk from Taj Mahal, you will find many cheap hotels, the best thing about these hotels is that the hotel is very close to the Taj Mahal. From the top of the roof of these hotels, you can see the Taj Mahal which is very beautiful Is visible. Exiting the Taj Mahal, the start of a very beautiful shop starts in which many beautiful small Taj Mahal is being sold. Everybody who came to visit the Taj Mahal would buy a small Taj Mahal from these shops. Just a few more shops of these shops start dressing up, from which you can buy good clothes for yourself at good and cheap prices.

अगर आप ताजमहल घूमने की सोच रहे है, तो हम आपको बता दे की ताजमहल शुक्रवार को बंद रहता है। ताजमहल खोलने का समय। दिन का समय: सूर्योदय से सूर्यास्त तक प्रतिदिन (०६:०० बजे से ०६:३० बजे) शुक्रवार को छोड़कर। हर शुक्रवार को ताजमहल को बंद कर दिया जाता है और केवल दोपहर में मुसलमानों को नमाज़ अता करने के लिए पहुँचा जाता है। ताजमहल से २० मिनट की पैदल दुरी पर आपको बहुत से सस्ते होटल मिल जायेंगे इन होटलों की सबसे अच्छी बात ये है की ये होटल ताजमहल की बहुत ही नजदीक है इन होटलों की छत के ऊपर से भी आप ताजमहल को देख सकते है जोकि बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है. ताजमहल से बाहर निकलते ही बहुत ही सुन्दर दुकानों का सिलसिला शुरू हो जाता है जिनमें बहुत से सुन्दर छोटे ताजमहल बिक रहे होते है ताजमहल घूमने आया हर व्यक्ति इन दुकानो से एक छोटा सा ताजमहल तो खरीद ही लेता। इन्हीं दुकानों के थोड़ा और आगे सुन्दर कपड़ों की दुकाने शुरू हो जाती है जहाँ से आप अपने लिए अच्छे और सस्ते दामों पर अच्छे कपडे खरीद सकते है.


Note:-

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ध्यान दें:-

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Chanakya Neeti

Chanakya-चाणक्य (a great teacher)

Chanakya-a great teacher- whose things people believe in today and still do great things. Chanakya, who made Chandragupta Maurya king by destroying Nandvasha. The economics written by him are the great books of politics, economics, agriculture, social science etc. Economics is considered to be the mirror of Indian society of Mauryan.

चाणक्य-एक महान शिक्षक-जिनकी बातों पर लोग आज भी विश्वास रख कर बड़े-बड़े काम कर जाते है. चाणक्य, जिन्होंने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का महान ग्रंन्थ है। अर्थशास्त्र मौर्यकालीन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता है।

All the things that Chanakya has done centuries ago Today we get to read in many books. If today's people pay attention to all the things told by Chanakya, then they will never have any problem in their life. It will be easy to achieve all the goals of your life. Centuries ago Chanakya had thought of making Chandragupta Maurya the emperor of India. Then Chandragupta Maurya was not convinced. But Chanakya composed a new era with his wisdom and his own words. New indivisible India composition. And made Chandragupta Maurya the emperor.

चाणक्य द्वारा कही सदियों पहले की सभी बातें। आज हमें बहुत सी किताबों में पढ़ने को मिलती है। यदि चाणक्य द्वारा बताई सभी बातें पर आज के लोगों ध्यान दे, तो उनके जीवन में कभी भी कोई मुसीबत नहीं आएगी। उन्हें अपने जीवन के सभी लक्ष्य को प्राप्त करना आसान हो जाएगा। सदियों पहले जब चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य को भारत का सम्राट बनाने की सोची थी। तब चन्द्रगुप्त मौर्य को यकीन नहीं हुआ था। लेकिन चाणक्य ने अपनी बुद्धि और अपनी बातों से एक नए युग की रचना की। नए अखंड भारत रचना की। और चन्द्रगुप्त मौर्य को सम्राट बना दिया।

In today's era, people are quite impressed by reading the ideas given by the great people like Chanakya. Chanakya's ideas have also elevated the lives of many people. A lot of books have been written about Chanakya's diplomacy and its principles. Chanakya's views are considered very precious in India. The idea of ​​Chanakya is very much like teachers, politicians and business people.

आज के युग में चाणक्य जैसे महान लोगो द्वारा बताए गए विचारो को पढ़कर लोग काफी प्रभावित होते है। चाणक्य के विचारो ने भी कई लोगो के जीवन को उन्नत किया है। चाणक्य की कूटनीति और इसके सिध्धांतो के बारे में बहुत सी पुस्तके लिखी गयी है। चाणक्य के विचारो को भारत में बहुत अनमोल माना जाता है। चाणक्य के विचार अध्यापक, राजनीतिज्ञ और व्यवसायिक लोगो को बहुत ज्यादा पसंद है।

Well, there are many old texts in which Chanakya has said a lot of such things that any person can make their life happy and every one can find what they hope for.Chanakya policy or Chanakya ethics is a policy text written by Chanakya. Chanakya is an important place in the history of scriptural texts in Sanskrit literature. In it, useful tips have been given to make life happy and successful in the formative style. Its main theme is to give practical human education to every aspect of life. It has mainly been presented in pics of progress of religion, culture, justice, peace, education and universal human life. This ethical treatise provides a great coordination of life-principle and life-style and ideal and realism.

वैसे तो बहुत से पुराने ग्रन्थ है जिनमे चाणक्य ने बहुत सी ऐसी बात कही है जिनसे कोई भी मनुष्य अपने जीवन को सुखी बना सकता है और हर वो चीज पा सकता है जिसकी वो आशा रखता है. चाणक्य नीति या चाणक्य नीतिशास्त्र, चाणक्य द्वारा रचित एक नीति ग्रन्थ है। संस्कृत-साहित्य में नीतिपरक ग्रन्थों की कोटि में चाणक्य नीति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसमें सूत्रात्मक शैली में जीवन को सुखमय एवं सफल बनाने के लिए उपयोगी सुझाव दिये गये हैं। इसका मुख्य विषय मानव मात्र को जीवन के प्रत्येक पहलू की व्यावहारिक शिक्षा देना है। इसमें मुख्य रूप से धर्म, संस्कृति, न्याय, शांति, सुशिक्षा एवं सर्वतोन्मुखी मानव जीवन की प्रगति की झाँकियां प्रस्तुत की गई हैं। इस नीतिपरक ग्रंथ में जीवन-सिद्धान्त और जीवन-व्यवहार तथा आदर्श और यथार्थ का बड़ा सुन्दर समन्वय देखने को मिलता है।

Chanakya (estimated 375 BC - 283 BC) was the Chief Minister of Chandragupta Maurya. He was the teacher of Taxila University
Chanakya has some very good talks, some of which are given below.

some examples

1. No person should be 'straightforward' than necessary. Go to the forest and look- The straight stem trees are cut, no one touches the crook.

2. Even if no snake is poisonous, even then he should not leave the pimples. In the same way, a weak person should not show any weakness at all times.

3. Never share your secrets with anyone, this tendency will ruin you.

4. Some selfishness is definitely hidden behind every friendship. There is no such friendship in the world behind which people are not hidden from their own interests, it is a bitter truth, but this is the truth.

5. Your child should first cure with five years of caution. The next five years should be kept under surveillance with scolding. But when the child is sixteen, he should behave like a friend.

6. Save money for the crisis period. If there is a crisis on the family, then you should sacrifice wealth. But protecting ourselves, we should do our family and money by putting them on the stake.

चाणक्य (अनुमानतः ईसापूर्व 375 - ईसापूर्व 283) चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। वे तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य थे,

चाणक्य द्वारा कही बहुत सी अच्छी-अच्छी बाते है जिनमे से कुछ नीचे दी गई है

कुछ उदाहरण.

1. किसी भी व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक 'सीधा' नहीं होना चाहिए। वन में जाकर देखो- सीधे तने वाले पेड़ ही काटे जाते हैं, टेढ़े को कोई नहीं छूता।

2. अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

3. कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।

4. हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।

5. अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए।

6. संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन स्वयं की रक्षा हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।

Some good things about Chanakya policy-

1. As the gem is not found on all the mountains, pearls are not produced in the head of all the elephants; there is no sandalwood tree in all forests, so gentlemen do not meet at all places.

2. Lying, showing excitement, scoffing, cheating, foolish actions, greed, profanity and mercilessness - these are all natural faults of women. Chanakya considers the above defects as a natural virtue of women. However, in these educated women of the present age these defects can not be said right.

3. Having good food for food, having the power of digestion, having the ability to be infected with the beautiful woman, the desire to provide wealth along with abundant wealth. All these pleasures are received by people very difficult.

4. Chanakya says that the person whose son lives under his control, whose wife practices according to the command and who is fully satisfied with the money he earns. For such a person, this world is like heaven itself.

5. Chanakya believes that the same family is happy, whose children obey their commands. The father also has the duty to nurture the sons well. Similarly, such a person can not be called a friend, which can not be believed and such a wife is in vain that no pleasure is available.

6. The friend who talks smoothly in front of you and spoils your work behind the back, it is better to sacrifice him. Chanakya says that it is similar to the utensil, on which there is milk in the upper part, but the inside is filled with venom.

7. Chanakya says that the person who is not a good friend should not believe it, but at the same time should not believe in good relations with a good friend, because if he gets annoyed then he can open up all your distinctions. Therefore caution is extremely important.

8. According to Chanakya, the life of trees on the banks of the river is uncertain, because rivers flood their edge trees during floods. Similarly, a woman living in other homes can also go on the path of decline at any time. Similarly, the king who does not have good advice, can not stay safe for a long time. There should not be any doubt in it.

9. Chanakya says that the way a prostitute turns away from a man when the money is over. In the same way, when the king becomes powerless, the people leave him. Likewise, birds living on trees also live on a tree until they get the fruits from there. When the guest is fully welcomed, he also leaves the house.

10. The person who is friendly with the bad character, the harm that causes others harm, and the people living in an impure place, is destroyed soon. Acharya Chanakya says that man should avoid misbehavior. They say that it is in the good of man that he should leave the evil person as soon as he could.

चाणक्य नीति की कुछ और अच्छी बातें -

1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्त्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्त्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंध में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

8. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

9. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

10. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

Keep your thoughts in control because it will become your voice. Keep your voice in control, because this will be your karma. Keep your karmo in control because it will become your habit. Keep your habits in control as it will become your character. Keep your character under control because it will be your destiny.

अपने विचारों को वश में रखो क्योकि यही तुम्हारी वाणी बनेंगे। अपनी वाणी को वश में रखो क्योकि यही तुम्हारे कर्म बनेंगे। अपने कर्मो को वश में रखो क्योकि यही तुम्हारी आदत बनेंगे। अपनी आदतों को वश में रखो क्योकि यही तुम्हारी चरित्र बनेंगी। अपने चरित्र को वश में रखो क्योकि इसी से तुम्हारा भाग्य बनेगा।


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mahabharat karan

KARAN-कर्ण (Karan the Munificent)

महाभारत का महान योद्धा कर्ण — जन्म से सूर्यपुत्र, जीवन से संघर्षपुत्र

महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्षों, रिश्तों, महत्वाकांक्षाओं, वचन, धर्म, अधर्म, भाग्य और कर्म की ऐसी महागाथा है, जिसमें लगभग हर पात्र अपने भीतर एक अलग संसार लिए हुए दिखाई देता है। इन्हीं पात्रों में एक नाम ऐसा है, जिसके जीवन में जितना तेज था, उतना ही अंधकार भी था। वह था कर्ण

कर्ण महाभारत के सबसे जटिल, वीर, दानवीर और त्रासद पात्रों में से एक था। वह जन्म से सूर्यपुत्र था, लेकिन जीवनभर उसे अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। वह महान धनुर्धर था, लेकिन उसकी प्रतिभा को बार-बार उसके जन्म और सामाजिक पहचान के प्रश्नों के सामने खड़ा होना पड़ा।

उसके पास असाधारण शक्ति थी, लेकिन उसके जीवन पर कई श्रापों की छाया भी थी। वह दानवीर था, लेकिन उसी दानशीलता ने उसे युद्ध में असुरक्षित कर दिया। वह दुर्योधन का सबसे विश्वसनीय मित्र था, लेकिन इसी मित्रता ने उसे उस युद्ध के दूसरे पक्ष में खड़ा कर दिया, जिसमें उसके अपने भाई उसके सामने थे। और सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस व्यक्ति को पूरी दुनिया सूतपुत्र समझती रही, वह वास्तव में पांडवों का ज्येष्ठ भाई था। यही कारण है कि कर्ण का जीवन केवल वीरता की कहानी नहीं है। यह पहचान, अपमान, मित्रता, प्रतिशोध, वचन और नियति की कहानी है।


कर्ण का रहस्यमय जन्म

कर्ण की कहानी उसके जन्म से ही रहस्य और असाधारण घटनाओं से शुरू होती है। कर्ण की माता थीं कुंती।

कुंती जब युवावस्था में थीं, तब महर्षि दुर्वासा उनके पिता के घर अतिथि बनकर आए। कुंती ने अत्यंत श्रद्धा और सेवा भाव से उनकी सेवा की। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ऋषि ने उन्हें एक दिव्य मंत्र प्रदान किया। उस मंत्र की शक्ति से कुंती किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थीं और उस देवता से पुत्र प्राप्त कर सकती थीं।

कुंती उस समय अविवाहित थीं। उन्हें उस मंत्र की शक्ति पर विश्वास तो था, लेकिन उसके परिणाम का अनुमान नहीं था। एक दिन जिज्ञासावश उन्होंने सूर्यदेव का आह्वान किया।

सूर्यदेव उनके सामने प्रकट हुए। कुंती ने उनसे वापस जाने का आग्रह किया, क्योंकि वह उस समय अविवाहित थीं और समाज में ऐसी घटना उनके लिए अत्यंत अपमान और संकट का कारण बन सकती थी। लेकिन दिव्य वरदान के प्रभाव से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ।

वह बालक असाधारण था। उसके शरीर पर जन्म से ही दिव्य कवच और कुण्डल विद्यमान थे। उसके चेहरे और शरीर से ऐसा तेज निकल रहा था मानो स्वयं सूर्य का अंश पृथ्वी पर उतर आया हो।

कहा जाता है कि यही बालक आगे चलकर कर्ण कहलाया। कर्ण का एक नाम वासुसेन भी था। लेकिन जन्म के साथ ही उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी शुरू हो चुकी थी।



कुंती का सबसे कठिन निर्णय

कुंती अविवाहित थीं। उन्हें भय था कि समाज उनके चरित्र पर प्रश्न उठाएगा और उनके जीवन के साथ-साथ उनके परिवार की प्रतिष्ठा भी संकट में पड़ जाएगी।

एक माँ के लिए अपने नवजात पुत्र को छोड़ना कितना कठिन होगा, इसकी कल्पना करना भी आसान नहीं है। लेकिन परिस्थितियों और सामाजिक भय के सामने कुंती ने एक ऐसा निर्णय लिया, जिसका पश्चाताप उन्हें जीवनभर रहा।

उन्होंने नवजात बालक को एक पेटी में रखा और उसे नदी की धारा में बहा दिया। वह बालक नदी की लहरों के साथ अज्ञात भविष्य की ओर बहता चला गया।

एक ओर एक माँ अपने पुत्र को खो रही थी और दूसरी ओर नियति उस बालक को महाभारत के सबसे महान योद्धाओं में से एक बनाने की तैयारी कर रही थी।



अधिरथ और राधा को मिला सूर्यपुत्र

नदी की धारा में बहती वह पेटी आगे जाकर अधिरथ को मिली। अधिरथ धृतराष्ट्र के सारथी थे। उनकी पत्नी का नाम राधा था।

जब उन्होंने उस पेटी को खोला तो उसमें एक अद्भुत तेज वाला बालक दिखाई दिया। उसके शरीर पर जन्मजात कवच और कुण्डल देखकर वे आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने उस बालक को अपना पुत्र स्वीकार कर लिया।

यहीं से कर्ण का पालन-पोषण शुरू हुआ। अधिरथ और राधा ने उसे अपने सगे पुत्र की तरह प्रेम दिया।

कर्ण को प्रेम तो मिला, लेकिन समाज ने उसे उसकी वास्तविक पहचान कभी नहीं दी। उसे सूतपुत्र कहा गया। और यही शब्द उसके जीवन का सबसे बड़ा सामाजिक संघर्ष बन गया।


बचपन से ही धनुर्विद्या का आकर्षण

कर्ण बचपन से ही असाधारण प्रतिभा वाला था। जहाँ उसके पिता का जीवन रथ और सारथी के कार्य से जुड़ा था, वहीं कर्ण का मन युद्धकला और धनुर्विद्या में लगता था।

वह महान योद्धा बनना चाहता था। उसकी सबसे बड़ी इच्छा थी कि वह संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बने।

उस समय हस्तिनापुर में आचार्य द्रोण कुरु राजकुमारों—कौरवों और पांडवों—को युद्धकला की शिक्षा दे रहे थे। कर्ण ने भी द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।

लेकिन उसे वह सम्मान नहीं मिला जिसकी उसे अपेक्षा थी। उसकी सामाजिक पहचान उसके सामने दीवार बनकर खड़ी हो गई।

कर्ण के भीतर यह भावना और गहरी होती चली गई कि उसकी प्रतिभा को उसके जन्म के कारण स्वीकार नहीं किया जा रहा है। यही अपमान आगे चलकर उसके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना।


परशुराम से शिक्षा और सबसे बड़ा श्राप

कर्ण ने हार नहीं मानी। उसे पता चला कि भगवान परशुराम महान अस्त्र-शस्त्र और धनुर्विद्या के आचार्य हैं और वे ब्राह्मणों को शिक्षा देते हैं।

कर्ण ने स्वयं को ब्राह्मण बताकर परशुराम से शिक्षा प्राप्त करने का मार्ग खोज लिया। परशुराम ने उसे अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।

कर्ण ने अत्यंत परिश्रम किया और थोड़े ही समय में वह एक असाधारण धनुर्धर बन गया। परशुराम उसकी प्रतिभा से प्रभावित थे। लेकिन नियति ने उसके लिए एक और परीक्षा तैयार कर रखी थी।


बिच्छू का डंक और परशुराम का श्राप

एक दिन परशुराम कर्ण की जांघ पर सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। उसी समय एक कीट ने कर्ण की जांघ में काटना शुरू किया। पीड़ा इतनी तीव्र थी कि सामान्य मनुष्य शायद तुरंत उसे हटा देता।

लेकिन कर्ण ने गुरु की नींद न टूटे, इसलिए पीड़ा सहना जारी रखा। उसके शरीर से रक्त बहने लगा। जब परशुराम की नींद खुली और उन्होंने कर्ण की जांघ से रक्त बहता देखा, तो उन्हें संदेह हुआ।

उन्होंने सोचा कि इतनी असाधारण पीड़ा सहने की क्षमता किसी सामान्य ब्राह्मण में नहीं हो सकती। सच्चाई सामने आने पर उन्हें पता चला कि कर्ण ने अपनी पहचान छिपाई थी। परशुराम क्रोधित हुए और उन्होंने कर्ण को श्राप दिया कि—

जब उसे अपने ज्ञान की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उसी समय वह उस ज्ञान को भूल जाएगा। यह श्राप कर्ण के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बन गया।


कर्ण और दुर्योधन की मित्रता

समय बीतता गया। कौरवों और पांडवों की शिक्षा पूरी होने के बाद एक दिन राजसभा में राजकुमारों की युद्धकला का प्रदर्शन आयोजित किया गया।

अर्जुन ने अपनी असाधारण धनुर्विद्या का प्रदर्शन किया। सभा में उपस्थित लोग उसकी प्रतिभा देखकर आश्चर्यचकित थे। तभी कर्ण ने प्रवेश किया।

उसने अर्जुन को चुनौती दी। कर्ण ने अर्जुन द्वारा किए गए अनेक युद्धकौशल को दोहराकर यह सिद्ध कर दिया कि वह भी किसी से कम नहीं है। लेकिन फिर वही प्रश्न सामने आया—
"कर्ण कौन है?"

उसकी वंश और सामाजिक पहचान पूछी गई। कर्ण के पास उस समय अपने वास्तविक राजवंश का प्रमाण नहीं था। उसी क्षण दुर्योधन आगे आया।

दुर्योधन ने कर्ण की प्रतिभा को पहचाना और उसे सम्मान देने के लिए उसे अंग देश का राजा बना दिया। कर्ण को पहली बार ऐसा लगा कि किसी ने उसके जन्म को नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा को महत्व दिया है।

यहीं से कर्ण और दुर्योधन के बीच ऐसी मित्रता बनी, जिसने महाभारत के युद्ध का इतिहास बदल दिया। कर्ण ने दुर्योधन का साथ जीवनभर निभाने का वचन दिया। दुर्योधन ने उसे सम्मान दिया था। और कर्ण उस सम्मान का ऋणी बन गया।


कर्ण — दानवीर क्यों कहलाया?

कर्ण की सबसे प्रसिद्ध विशेषताओं में से एक थी उसकी दानवीरता। कहा जाता है कि कर्ण सूर्यदेव की पूजा के बाद किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता था।

उसके द्वार से कोई व्यक्ति निराश होकर नहीं लौटता था। कर्ण के लिए दान केवल संपत्ति देने का नाम नहीं था। दान उसके लिए उसके वचन और चरित्र का हिस्सा था। यही कारण है कि भारतीय लोकपरंपरा में आज भी कर्ण का नाम "दानवीर कर्ण" के रूप में लिया जाता है। लेकिन उसकी यही दानशीलता आगे चलकर उसके युद्धजीवन की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई।


इंद्र और कवच-कुण्डल का रहस्य

कर्ण के जन्म के समय मिले कवच और कुण्डल उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से थे। कवच उसके शरीर का अभिन्न हिस्सा था और कुण्डल भी जन्मजात थे।

देवराज इंद्र जानते थे कि यदि कर्ण इन दिव्य कवच-कुण्डलों के साथ युद्ध में उतरा तो उसे पराजित करना अत्यंत कठिन होगा। इंद्र का सबसे बड़ा भय था कि कर्ण उनके पुत्र अर्जुन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई।

एक दिन इंद्र ब्राह्मण के वेश में कर्ण के पास पहुँचे और उससे दान माँगा। कर्ण समझ गया कि याचक साधारण व्यक्ति नहीं है। सूर्यदेव ने भी उसे पहले से सावधान किया था कि कोई उसके कवच-कुण्डल माँग सकता है। लेकिन कर्ण अपने वचन से पीछे नहीं हटा।

इंद्र ने उससे उसके जन्मजात कवच और कुण्डल माँग लिए। कर्ण जानता था कि इन्हें देने के बाद उसकी सुरक्षा कम हो जाएगी। फिर भी उसने अपने शरीर से कवच और कुण्डल अलग कर दिए और उन्हें इंद्र को दान कर दिया। यह प्रसंग कर्ण की दानवीरता का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण बन गया।



कर्ण को मिला इंद्र का दिव्य अस्त्र

कर्ण की दानवीरता देखकर इंद्र भी प्रभावित हुए। उन्होंने कर्ण को एक दिव्य अस्त्र प्रदान किया—वासवी शक्ति।

यह अस्त्र अत्यंत शक्तिशाली था और जिस योद्धा पर इसका प्रयोग किया जाता, उसका बचना लगभग असंभव माना जाता था। लेकिन इसकी एक सीमा थी—

इसका प्रयोग केवल एक बार किया जा सकता था। कर्ण ने इसे अर्जुन के लिए सुरक्षित रखा। लेकिन महाभारत के युद्ध में परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि उसे यह अस्त्र अर्जुन के बजाय घटोत्कच पर प्रयोग करना पड़ा। घटोत्कच के विरुद्ध वासवी शक्ति का प्रयोग करके कर्ण ने उसे मार दिया, लेकिन उसके बाद अर्जुन के विरुद्ध वह दिव्य अस्त्र उसके पास नहीं रहा। यह घटना आगे चलकर कर्ण की पराजय का एक महत्वपूर्ण कारण बनी।


कुंती और कर्ण की सबसे भावुक मुलाकात

महाभारत के युद्ध से पहले कुंती कर्ण से मिलने गईं। यह उनके जीवन का सबसे भावुक क्षण था। कुंती ने कर्ण को बताया कि वह कोई साधारण सूतपुत्र नहीं है। वह उनका पुत्र है।

वह पांडवों का ज्येष्ठ भाई है। यह सुनकर कर्ण के सामने पूरा जीवन जैसे एक क्षण में बदल गया। जिस पहचान की तलाश उसने पूरी जिंदगी की थी, वह उसके सामने खड़ी थी। लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

कर्ण ने कुंती से कहा कि अब वह दुर्योधन को छोड़ नहीं सकता। दुर्योधन ने उस समय उसका साथ दिया था जब पूरी दुनिया उसे उसके जन्म के कारण अपमानित कर रही थी। कर्ण ने कुंती से एक वचन अवश्य दिया—

वह अर्जुन को छोड़कर किसी अन्य पांडव को नहीं मारेगा। इस प्रकार युद्ध के अंत में कुंती के पाँच पुत्र जीवित रहेंगे—या तो अर्जुन जीवित रहेगा या कर्ण। लेकिन कुंती का मातृत्व और कर्ण का वचन—दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे।


श्रीकृष्ण ने भी कर्ण को समझाया

युद्ध से पहले श्रीकृष्ण ने भी कर्ण से मुलाकात की। कृष्ण ने उसे उसकी वास्तविक पहचान बताई। उन्होंने कहा कि वह वास्तव में कुंती का ज्येष्ठ पुत्र है और यदि वह पांडवों का साथ दे तो उसे राज्य और सम्मान मिल सकता है। लेकिन कर्ण ने दुर्योधन का साथ छोड़ने से इनकार कर दिया।

यह निर्णय कर्ण के चरित्र का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष दिखाता है। वह जानता था कि दुर्योधन का पक्ष धर्म की दृष्टि से कमजोर है। फिर भी उसने उस व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ा जिसने कठिन समय में उसे सम्मान दिया था। कर्ण के लिए मित्रता और कृतज्ञता केवल शब्द नहीं थे। वे उसके जीवन का वचन बन चुके थे।


कुरुक्षेत्र का युद्ध और कर्ण

कुरुक्षेत्र में युद्ध आरंभ हुआ। कर्ण ने युद्ध के शुरुआती दिनों में पूरी तरह भाग नहीं लिया, क्योंकि भीष्म पितामह के सेनापतित्व के दौरान उनके और कर्ण के बीच मतभेद थे। भीष्म के पतन के बाद कर्ण युद्ध में सक्रिय रूप से उतरा।

वह कौरव सेना का एक प्रमुख योद्धा बन गया। उसकी धनुर्विद्या, युद्धकौशल और साहस ने पांडव सेना को कई बार कठिन स्थिति में पहुँचा दिया। कर्ण और अर्जुन के बीच संघर्ष धीरे-धीरे महाभारत युद्ध का सबसे बड़ा द्वंद्व बन गया।

दोनों महान धनुर्धर थे। दोनों के पीछे दिव्य अस्त्रों का ज्ञान था। और सबसे बड़ी बात— दोनों अनजाने में भाई थे।


कर्ण और घटोत्कच का युद्ध

कुरुक्षेत्र के युद्ध में एक रात घटोत्कच ने कौरव सेना में भयंकर उत्पात मचा दिया। राक्षसी शक्ति और मायावी युद्धकौशल के कारण कौरव सेना उसके सामने असहाय होती जा रही थी। तब कर्ण को वासवी शक्ति का प्रयोग करना पड़ा।

जिस अस्त्र को उसने अर्जुन के लिए बचाकर रखा था, उसी से उसने घटोत्कच का वध किया। घटोत्कच के गिरते ही कृष्ण प्रसन्न हुए। अर्जुन को आश्चर्य हुआ कि कृष्ण इस मृत्यु पर प्रसन्न क्यों हैं। कृष्ण ने बताया कि अब कर्ण के पास वह दिव्य शक्ति नहीं रही जिससे वह अर्जुन का निश्चित रूप से वध कर सकता था। इस प्रकार घटोत्कच की मृत्यु ने पांडवों को एक बड़ी रणनीतिक राहत दी।



कर्ण का अंतिम युद्ध

आखिर वह दिन आया जिसका इंतजार दोनों योद्धा वर्षों से कर रहे थे। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे। कुरुक्षेत्र की धरती पर दोनों ओर से दिव्य अस्त्रों की वर्षा होने लगी।

कभी अर्जुन भारी पड़ता, कभी कर्ण। युद्ध इतना भयंकर था कि दोनों सेनाएँ भी इस द्वंद्व को आश्चर्य से देख रही थीं। तभी नियति ने अपना सबसे बड़ा खेल खेला।

कर्ण के रथ का पहिया धरती में धँस गया। महाभारत की विभिन्न परंपराओं में इसके कारणों से जुड़े अलग-अलग प्रसंग मिलते हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, कर्ण पर एक ब्राह्मण का श्राप था, क्योंकि अनजाने में उसके बछड़े की मृत्यु हो गई थी। इसी कारण युद्ध के समय उसके रथ का पहिया धरती में धँसने की बात कही जाती है।

कर्ण रथ से उतर गया और पहिया निकालने का प्रयास करने लगा। उसने अर्जुन से युद्ध रोकने के लिए कहा, ताकि वह अपने रथ का पहिया निकाल सके। लेकिन तभी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्ण के पिछले कर्मों और युद्ध में घट चुकी घटनाओं की याद दिलाई।

कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि युद्ध में कर्ण ने भी धर्म की मर्यादाओं का हमेशा पालन नहीं किया था। विशेष रूप से अभिमन्यु के वध में उसकी भूमिका और द्रौपदी के अपमान के समय उसका पक्ष महाभारत की कथा में उसके चरित्र के विवादित पक्षों को सामने लाता है। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि युद्ध के इस निर्णायक क्षण को व्यर्थ न जाने दे।


परशुराम का श्राप सच हुआ

यही वह क्षण था जब कर्ण को अपने दिव्य अस्त्रों के ज्ञान की सबसे अधिक आवश्यकता थी। लेकिन परशुराम का श्राप उसके सामने आ चुका था। कर्ण उस ज्ञान को पूरी तरह याद नहीं कर पाया, जिसकी उसे आवश्यकता थी।

एक ओर रथ का पहिया धरती में धँसा था। दूसरी ओर उसके कवच-कुण्डल उसके पास नहीं थे। उसका सबसे शक्तिशाली दिव्य अस्त्र पहले ही घटोत्कच पर प्रयोग हो चुका था। और अब परशुराम का श्राप भी अपना प्रभाव दिखा रहा था। ऐसा प्रतीत होता था जैसे कर्ण की पूरी जिंदगी के संघर्ष उसी एक क्षण में आकर खड़े हो गए हों।


कर्ण की मृत्यु

श्रीकृष्ण के निर्देश पर अर्जुन ने कर्ण पर प्रहार किया। अर्जुन ने अंजलिका अस्त्र का प्रयोग किया। उसके प्रहार से कर्ण का अंत हुआ।

कुरुक्षेत्र की धरती पर एक महान योद्धा गिर पड़ा। वह योद्धा जिसने जीवनभर सम्मान पाने के लिए संघर्ष किया था। वह योद्धा जिसने दान में अपना जन्मजात कवच तक दे दिया था। वह योद्धा जिसने मित्रता के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था। और वह योद्धा जो अंत तक अपनी वास्तविक पहचान की कीमत चुकाता रहा।


कर्ण की मृत्यु के बाद खुला सबसे बड़ा रहस्यमृत्यु

कर्ण की मृत्यु के बाद पांडवों को जब यह पता चला कि कर्ण वास्तव में उनकी माता कुंती का ज्येष्ठ पुत्र था, तो वे स्तब्ध रह गए। युधिष्ठिर के लिए यह समाचार विशेष रूप से पीड़ादायक था। जिस व्यक्ति से वे युद्ध करते रहे, जिसे वे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते रहे, वह वास्तव में उनका बड़ा भाई था। युधिष्ठिर को इस बात का गहरा दुःख हुआ कि यदि उन्हें पहले से यह सत्य पता होता तो शायद इतिहास कुछ और होता। कर्ण की पूरी कहानी इसी विडंबना पर आकर ठहर जाती है— जिस भाई को पांडव जीवनभर अपना शत्रु समझते रहे, वही वास्तव में उनका सबसे बड़ा भाई था।


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कर्ण महान था या गलत पक्ष में खड़ा था?

कर्ण के चरित्र को केवल "महान" या "अधर्मी" कहकर समझना आसान नहीं है। वह एक ऐसा पात्र है जिसमें महानता और कमजोरी दोनों साथ दिखाई देती हैं।

कर्ण की महानताएँ:-
वह असाधारण धनुर्धर था।
वह अत्यंत साहसी योद्धा था।
वह अपने मित्र के प्रति वफादार था।
वह दानवीर के रूप में प्रसिद्ध था।
उसने कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने लक्ष्य का पीछा किया।
उसने अपमान सहकर भी अपनी प्रतिभा को विकसित किया।
उसने कुंती को वचन दिया कि वह चार पांडवों को नहीं मारेगा।

उसने अपने दान के वचन के लिए अपना जन्मजात कवच-कुण्डल तक दे दिया।

कर्ण के चरित्र की कमजोरियाँ:-
लेकिन कर्ण का चरित्र केवल गुणों से भरा हुआ नहीं था।
उसने दुर्योधन का साथ दिया, जबकि दुर्योधन का संघर्ष कई बार अन्याय के पक्ष में था।

द्रौपदी के अपमान के प्रसंग में कर्ण की भूमिका भी उसके चरित्र पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

अभिमन्यु के वध में भी कर्ण कौरव पक्ष का महत्वपूर्ण योद्धा था।
इसलिए कर्ण को केवल "महानायक" कहना महाभारत के पूरे चरित्र को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।

वह एक त्रासद नायक था—ऐसा व्यक्ति जिसमें असाधारण प्रतिभा थी, लेकिन जिसके निर्णयों और परिस्थितियों ने उसे गलत पक्ष में खड़ा कर दिया।

कर्ण की सबसे बड़ी त्रासदी क्या थी?

कर्ण की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि वह युद्ध में हार गया। उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उसे जीवनभर अपनी वास्तविक पहचान नहीं मिली। जिसे दुनिया सूतपुत्र कहती रही, वह सूर्यपुत्र था।

जिसे समाज ने जन्म के कारण कम समझा, उसमें महान योद्धा बनने की क्षमता थी। जिसे दुर्योधन ने मित्र बनाकर सम्मान दिया, उसी मित्रता के कारण वह पांडवों के विरुद्ध खड़ा हो गया। जिस माँ ने उसे जन्म दिया, उसने उसे बचपन में छोड़ दिया।

जिस गुरु से उसने ज्ञान पाया, उसी गुरु का श्राप उसके अंतिम युद्ध में उसके सामने आ गया। जिस कवच ने उसे जन्म से सुरक्षित रखा, उसे उसने स्वयं दान में दे दिया। जिस दिव्य अस्त्र को उसने अर्जुन के लिए बचाकर रखा, उसे अंततः घटोत्कच पर प्रयोग करना पड़ा।

और जिस भाई अर्जुन को वह अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी समझता रहा, वह वास्तव में उसका छोटा भाई था। कर्ण का जीवन जैसे बार-बार एक ही प्रश्न पूछता है—
"यदि परिस्थितियाँ अलग होतीं, तो क्या कर्ण का भाग्य भी अलग होता?"


कर्ण हमें क्या सिखाता है?

कर्ण की कहानी आज भी इसलिए जीवित है क्योंकि इसमें केवल युद्ध नहीं है। इसमें मनुष्य की वह लड़ाई है जो वह अपने भीतर लड़ता है। कर्ण हमें सिखाता है कि प्रतिभा को पहचान की आवश्यकता होती है, लेकिन प्रतिभा के साथ सही निर्णय लेना भी उतना ही आवश्यक है।

वह सिखाता है कि मित्रता और कृतज्ञता महान गुण हैं, लेकिन किसी व्यक्ति के प्रति वफादारी हमें गलत कार्य का समर्थन करने के लिए बाध्य नहीं करनी चाहिए। वह सिखाता है कि अपमान मनुष्य को शक्तिशाली बना सकता है, लेकिन वही अपमान उसके भीतर प्रतिशोध भी पैदा कर सकता है।

वह यह भी दिखाता है कि दान महान है, लेकिन विवेक के बिना किया गया त्याग कभी-कभी स्वयं के लिए विनाशकारी हो सकता है। और सबसे महत्वपूर्ण—
मनुष्य केवल अपने जन्म से महान या छोटा नहीं होता। उसके कर्म, उसके निर्णय और संकट के समय उसका आचरण ही उसके चरित्र की असली पहचान बनाते हैं।


कर्ण — एक ऐसा नाम जिसे महाभारत कभी भुला नहीं सकती

कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो गया। कौरव हार गए। पांडव विजयी हुए। लेकिन उस विजय की कीमत बहुत बड़ी थी। अनगिनत योद्धा मारे गए।

भाई ने भाई का रक्त बहाया। गुरु और शिष्य आमने-सामने आए। और अंत में वह सत्य सामने आया, जिसने पूरी विजय को भी दुःख में बदल दिया—

कर्ण, जिसे पांडव अपना सबसे बड़ा शत्रु समझते थे, वही उनका ज्येष्ठ भाई था। कर्ण का जीवन इसलिए अमर है क्योंकि वह केवल सूर्यपुत्र की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो सम्मान पाने के लिए जीवनभर लड़ता रहा।

यह उस मित्र की कहानी है जिसने मित्रता के लिए अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया। यह उस दानवीर की कहानी है जिसने मृत्यु की संभावना जानते हुए भी अपना कवच-कुण्डल दे दिया। यह उस योद्धा की कहानी है जिसके पास प्रतिभा थी, साहस था और अद्भुत इच्छाशक्ति थी—लेकिन जिसके जीवन में परिस्थितियाँ बार-बार उसके विरुद्ध खड़ी होती रहीं। और शायद इसी कारण—

महाभारत समाप्त हो गई, कुरुक्षेत्र शांत हो गया, लेकिन कर्ण की कहानी आज भी समाप्त नहीं हुई। क्योंकि जब भी मनुष्य अपने जन्म, पहचान, अपमान, मित्रता, वचन और भाग्य के बीच संघर्ष करता है, कहीं न कहीं उसे अपने भीतर कर्ण की एक झलक दिखाई देती है। कर्ण इसलिए महान नहीं था कि वह कभी गलत नहीं हुआ।

कर्ण इसलिए याद किया जाता है क्योंकि उसके भीतर महान बनने की ज्वाला थी—और उसका पूरा जीवन उस ज्वाला और उसकी कमजोरियों के बीच जलता रहा। यही कर्ण की सबसे बड़ी शक्ति भी थी और उसकी सबसे बड़ी त्रासदी भी।


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mawlynnong day trip

Mavelinong Village-cleanest village in asia
Mavelinong Village

Mavelinong Village, Mewelong Village is a very beautiful village, situated in the eastern hills of Meghalaya. It is also known as 'Gods on Garden', along with the praise of being the cleanest village in Asia in 2003. Many people come from far and wide to visit this beautiful village, the beauty of this village attracts many tourists.

मेवलिनॉन्ग गांव, मेवलिनॉन्ग गांव एक बहुत ही सूंदर गांव है, जो मेघालय के पूर्वी खासी पहाड़ियों में स्थित है। इसे 'गॉड्स ओन गार्डन' के रूप में भी जाना जाता है, साथ ही 2003 में एशिया में सबसे स्वच्छ गांव होने की प्रशंसा हासिल की। दूर-दूर से बहुत से लोग इस सुन्दर गांव में घूमने आते है, इस गांव की सुंदरता बहुत से पर्यटक को अपनी ओर आकर्षित करती है।

A community here has tried to maintain the atmosphere of a clean village, which results in cleanliness in the village, and the village offers picturesque natural beauty, this village is very beautiful, the beauty of this village, especially in the monsoon It appears when there is greenery around trees. There is a trek for the living village of Rivi. Boulder balancing is another rock. The envious envy of the neighbors is jealous of the villagers. This village is located about 90 km from Shillong.

यहाँ के एक समुदाय ने एक स्वच्छ गांव के माहौल को बनाए रखने का प्रयास किया है, जिसके कारण गांव में स्वच्छता बनी रहती है ,और गांव सुरम्य प्राकृतिक सुंदरता प्रदान करता है, यह गाँव बहुत ही सुंदर है, इस गाँव की सुंदरता खासकर मानसून में दिखती है, जब पेड़ों के चारों ओर हरियाली होती है। रिवाई के जीवित गांव के लिए एक ट्रेक है। बोल्डर बैलेंसिंग एक और चट्टान है। ग्रामीणों से ईर्ष्या करने वाले पड़ोसियों के आराध्य ईर्ष्या करते हैं।यह गांव शिलांग से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित है।

If you are going to roam in this village from this Surround you will see that the path to keep the village clean is in the village. For local cleaning of roads, throwing waste and throwing it into the bin is a very common sight. Bamboo waste bins decorate the villagers on every nook. Because of this, Mavelinong is completely clean and green with the streets and streets of the village, which indicates that tourists should maintain uniform during their stay in the village. Hygiene is a centuries old tradition. This village also offers a very breathtaking view of the plains of Bangladesh because it is located on the India-Bangladesh border.

यदि आप इस सूंदर से गाँव में घूमने जा रहे है तो आप देखेंगे की, गाँव को साफ रखने का मार्ग गाँव में है। सड़कों की स्थानीय सफाई के लिए, कूड़ा उठाकर बिन में फेंकना एक बहुत ही आम दृश्य है। बाँस के कचरे के डिब्बे ग्रामीणों के हर नुक्कड़ पर सजते हैं। जिसकी वजह से मेवलिनॉन्ग गांव की गलियों और सड़कों के साथ पूरी तरह से साफ और हरा भरा रहता है जो पर्यटकों को गाँव में रहने के दौरान समान बनाए रखने का संकेत देता है। स्वच्छता एक सदियों पुरानी परंपरा है। यह गाँव बांग्लादेश के मैदानों का बहुत ही लुभावना दृश्य भी प्रस्तुत करता है क्योंकि यह भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित है।

In addition to cleanliness in the Mavelingong village, the people here have built a beautiful treehouse on nearby trees, tourists visiting here are sure to see the treehouse on the trees, to reach the treehouse, made of bamboo above the trees. The high brim of high bridges is to go through the top of these bridges to the treehouse.

मावलिनॉन्ग गांव में साफ सफाई के अलावा, यहाँ के लोगों ने आस पास के पेड़ो पर सुन्दर treehouse बना रखे है, यहाँ पर घूमने आये पर्यटक पेड़ो पर बने treehouse को देखने जरूर जाते है, treehouse तक पहुंचने के लिए, पेड़ो के ऊपर बांस से बने हुए ऊँचे सुन्दर पुल है इन पुलों के ऊपर से होकर treehouse में जाना होता है।

It is very easy for the tourists to visit this village to interact with the people here. Because Hindi and English languages ​​are well spoken to the people of this village. Therefore, a tourist can easily communicate with the people of this village in English. Homestay facilities are also planned for the tourist to stay here. There will also be a lot of food items for the tourists here. There is also adequate parking space for vehicles here.

इस गांव में घूमने आये पर्यटक के लिए यहाँ के लोगों के साथ बातचीत करना बहुत ही आसान होता है। क्योंकि इस गांव के लोगों को हिंदी और इंग्लिश भाषा अच्छी तरह से आती है। इसलिए कोई पर्यटक इस गाँव के लोगों के साथ आसानी से अंग्रेजी में साथ बातचीत कर सकता हैं। पर्यटक के यहाँ रहने के लिए होमस्टे सुविधाओं का भी इंतेजाम है। पर्यटक के लिए यहाँ पर बहुत सी खाने की बुनियादी चीजें भी मिल जाएँगी। साथ ही यहाँ पर वाहनों के लिए पर्याप्त पार्किंग स्थान भी है।

There is a living root bridge in Mavelingong, this bridge is made from the roots of a huge tree, this bridge made from roots of trees is very old, tourists visiting this place are surprised to see this bridge. Located approximately five kilometers away from the living root bridge. A very beautiful Niriang falls. It is situated between the dense green forests, it is not easy to reach the Niriyang Falls. To reach Niriyang Falls, a steep trek has to be taken through a very slippery pathway. Even knowing that the journey is difficult, but even then tourists visiting here go to see Niriang falls, because a view of the waterfall can surprise any visitor.

मावलिनॉन्ग में एक जीवित पुल है, यह पुल एक विशाल पेड़ की जड़ों से निर्मित है, पेड़ों की जड़ों से बना यह पुल बहुत ही पुराना है, यह पर घूमने आये पर्यटक इस पुल के देखकर हैरान रह जाते है। जीवित मूल पुल से लगभग पांच किलोमीटर दूर स्थित है। एक बहुत ही सूंदर निरियांग फॉल्स। यह घने हरे भरे जंगलों के बीच स्थित है इस निरियांग फॉल्स तक पहुंचना आसान काम नहीं है निरियांग फॉल्स तक पहुंचने के लिए एक बहुत ही फिसलन पत्थर के रास्ते के माध्यम से एक खड़ी ट्रेक लेना पड़ता है। जानते हुए भी की यात्रा कठिन है, लेकिन फिर भी यहाँ घूमने आये पर्यटक निरियांग फॉल्स को देखने के लिए जाते है, क्योकि झरने का एक दृश्य किसी भी आगंतुक को आश्चर्यचकित कर सकता है।

There is a natural equilibrium rock in the village, another strange natural phenomenon of boulder balancing on the second rock. Many people come here to see this rock and do many things about this rock. But hardly anyone has yet been able to tell about the natural balance of this rock.

गाँव में एक प्राकृतिक संतुलन वाली चट्टान है, दूसरी चट्टान पर बोल्डर के संतुलन की एक अजीब प्राकृतिक घटना है। बहुत से लोगों इस चट्टान देखने यहाँ आते है और इस चट्टान के बारे में बहुत सी बातें करते है। लेकिन शायद ही कोई आज तक इस चट्टान के प्राकृतिक संतुलन के बारे ठीक से नहीं बता पाया है।

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Eklavya

Eklavya-एकलव्य (A Great Warriors)


By the way, there have been many such great warriors in the ancient times of this world. Whose imagination we can not imagine in today's time Such a warrior who did many great things in his life, because of which he could become great. Today the world is talking about the history of those great warriors. One of the great warriors in history was the name of one of them. Eklavya,

Eklavya is a very small character in the Mahabharata war in India. The war of Mahabharata occurred in 3137 BC. Eklavya is known for his great archery and his love for master, Eklavya was the son of Hiranyudhanu and Sulekha. Eklavya was a dalit living in forests. Eklavya was a very beautiful and skilled child. Eklavya was very quick and intelligent since his childhood. Because of this, Eklavya soon learned all the weapons of his weapon.But Eklavya was not happy with this learned lore. Because Eklavya was very much interested in archery. So Eklavya wanted to learn more archery with weapon. Therefore Eklavya reached near the great Dronacharya for learning archery.

वैसे तो इस दुनिया के बीते हुए प्राचीन समय में बहुत से ऐसे-ऐसे महान योद्धा हुए है। जिनकी कल्पना हम आज के समय में नहीं कर सकते। ऐसे योद्धा जिन्होंने अपने जीवन में बहुत से महान कार्यो किये जिनकी के वजह से वह महान बन पाए। आज उन सभी महान योद्धाओं के इतिहास के बारे में दुनियाँ बात करती है। इतिहास के उन सभी महान योद्धाओं में से एक का नाम था। एकलव्य,

एकलव्य भारत में हुए महाभारत युद्ध का एक बहुत छोटा पात्र है। महाभारत का युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ था। एकलव्य को उसकी स्वयं सीखी गई महान धनुर्विद्या और अपने गुरु के प्रति प्रेम के लिए जाना जाता है, एकलव्य राजा हिरण्यधनु और सुलेखा का पुत्र था। एकलव्य जंगलों में रहने वाला एक दलित था। एकलव्य बहुत ही सूंदर और कुशल बालक था। एकलव्य बचपन से ही अपनी उम्र के बच्चों से काफी तेज और बुद्धिमान था। इसी वजह से एकलव्य जल्द ही अपनी सभी अस्त्र की विद्या को सीख गया। लेकिन एकलव्य अपनी इस सीखी हुई विद्या से खुश ना था। क्योंकि एकलव्य को धनुर्विद्या ज्यादा पसन्द थी। इसलिए एकलव्य को अस्त्र- शस्र के साथ और अधिक धनुर्विद्या को भी सीखना चाहता था। इसलिए धनुर्विद्या सीखने के लिए एकलव्य महान गुरु द्रोणाचार्य के पास जा पहुँचा।

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master Dronacharya was the teacher who taught the greatest archery of the Mahabharata period. Who had promised to make his beloved disciple Arjuna the greatest archer of the world.When Eklavya reached for Dronacharya to learn archery. So Dronacharya refused to teach Eklavya to teach archery. Because Dronacharya taught only Kshatriyas and Brahmins. And Eklavya was from a dalit family living in forests. After refusing the Dronacharya, Eklavya did not give up.Eklavya made a statue of Dronacharya inside the forest. And considering the same idol as his Dronacharya, he started trying to learn archery every day.

गुरु द्रोणाचार्य महाभारत काल के सबसे महान धनुर्विद्या सिखाने वाले गुरु थे। जिन्होंने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को दुनिया का सबसे महान धनुर्धर बनाने का वचन दिया था। जब एकलव्य गुरु द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने के लिए पहुँचा। तो गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। क्योंकि गुरु द्रोणाचार्य केवल क्षत्रिय और ब्राह्मण को ही शिक्षा दिया करते थे। और एकलव्य जंगलों में रहने वाला एक दलित परिवार से था। गुरु द्रोणाचार्य के मना करने के बाद एकलव्य ने हार नहीं मानी। एकलव्य ने जंगल के अंदर गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई। और उसी मूर्ति को अपना गुरु द्रोणाचार्य मानकर उसके आगे रोज धनुर्विद्या सीखने का प्रयास करने लगा।

Gradually the days began to pass. And then gradually changed in the years. One day master Dronacharya was going to the forest with his pupil Arjuna and a dog. Then suddenly his dog saw something And he started going straight into the forest, inside the jungle. For a while, the master Dronacharya and Arjun were heard listening to the sound of the dog. Then suddenly, they stopped listening to the sound of dog barking. On not hearing the voice of the dog, Guru Dronacharya and Arjun went behind the dog and started going inside the jungle. After going into some distance of the forest, master Dronacharya and Arjun saw that someone has attacked his dog with an arrow and closed his dog's mouth. Seeing this, Arjuna got very angry. And began to find the person who killed his dog.

When Arjun was searching for that person. Suddenly, his eyes went towards master Dronacharya. And he saw that master Dronacharya is looking very carefully towards the dog. Arjun came to the master Dronacharya. And the master asked Dronacharya, what are you looking at? On Arjun's request, master Dronacharya said to Arjun, Arjun carefully look. Someone has hit their arrow inside our dog's mouth. Because of which our dog's mouth is closed. And see a drop of blood from the mouth of this dog does not come out. I'm pretty sure. Of course there is someone in this forest that knows archery very well.

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। और फिर धीरे धीरे दिन सालों में बदल गए। एक दिन गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्य अर्जुन और एक कुत्ते के साथ जंगल में जा रहे थे। तभी अचानक से उनके कुत्ते ने कुछ देखा। और सीधे भोक्ता हुआ जंगल के अंदर जाने लगा। कुछ देर तक तो गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन को कुत्ते की भोखने की आवाज़ सुनाई देती रही। फिर अचानक से, उन्हें कुत्ते की भोकने की आवाज़ सुनाई देना बंद हो गई। कुत्ते की भोकने की आवाज़ सुनाई ना देने पर गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन कुत्ते के पीछे जंगल के अंदर जाने लगे। कुछ दूर जंगल के अंदर जाने के बाद गुरु द्रोणाचार्य और अर्जुन ने देखा की किसी ने उनके कुत्ते पर तीर से हमला करके उनके कुत्ते का मुँह बन्द कर दिया है। ये देखकर अर्जुन को बहुत गुस्सा आया। और उस व्यक्ति को खोजने लगा जिसने उनके कुत्ते को मारा था।

अर्जुन जब उस वव्यक्ति को खोज रहा था। तभी अचानक से उसकी नजर गुरु द्रोणाचार्य की ओर गई। और उसने देखा की गुरु द्रोणाचार्य कुत्ते की ओर बहुत ध्यान से देख रहे है। अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य के पास आया। और गुरु द्रोणाचार्य से पूछने लगा, ऐसे क्या देख रहे हो। अर्जुन के पूछने पर गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा, अर्जुन ध्यान से देखो। किसी ने हमारे कुत्ते के मुँह के अन्दर अपना तीर मारा है। जिसके कारण हमारे कुत्ते का मुँह बंद हो गया है। और देखो इस कुत्ते के मुँह से एक बूंद खून भी बाहर नहीं निकला। मुझे पूरा यकीन है। जरूर इस जंगल में ऐसा कोई तो है जो धनुर्विद्या को बहुत अच्छी तरह से जानता है।।

CAN'T ENOUGH SLEEP.?



As it was said by master Dronacharya, Arjun said to Dronacharya, why did not we find that archery? And meet him. As Arjun says so, Dronacharya said, let's find that archer. While searching for the archer, Arjun and Dronacharya were going inside the jungle. Suddenly, his eyes fell on a young man. And he saw a beautiful young man trying to learn archery wearing a tribal dress in front of a statue. Seeing this, Arjun and Dronacharya went to that young man. And began to ask him. Have you killed our dog? Eklavya said, "Your dog was distracting my attention. So I had to kill him.

गुरु द्रोणाचार्य के ऐसा कहते ही, अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा, क्यों ना हम उस धनुर्धर को खोजे। और उससे मिले। अर्जुन के इतना कहते ही गुरु द्रोणाचार्य ने कहा, चलो उस धनुर्धर को खोजते है। धनुर्धर को खोजते हुए अर्जुन और गुरु द्रोणाचार्य जंगल के अन्दर चले जा रहे थे। तभी अचानक से उनकी नजर एक नौजवान पर पड़ी। और उन्होंने देखा की एक सुन्दर नौजवान एक मूर्ति के आगे आदिवासी के कपडे पहने हुए धनुर्विद्या सिखने का प्रयास कर रहा है। ये देखकर अर्जुन और गुरु द्रोणाचार्य उस नौजवान के पास गए। और उससे पूछने लगे। क्या तुम्हीं ने हमारे कुत्ते को मारा है। एकलव्य ने जबाब देते हुए कहा, आपका कुत्ता मेरा ध्यान भंग कर रहा था। इसलिए मुझे उसे मारना पड़ा।


Then master Dronacharya asked that young man, who are you? And where did you learn these archeology? The young man said to Dronacharya, My name is Eklavya. And I live in this forest. And I'm the son of Hiranyandhu and Sulekha. I have learned these archeology from you only. 10 years ago When I came to learn archery, then you refused to teach your archery. Then, as a master, I made an idol here. And then every day I started trying to learn archery in front of your idol.

फिर गुरु द्रोणाचार्य ने उस नौजवान से पूछा, तुम कौन हो। और तुमने ये धनुर्विद्या कहाँ से सीखी। उस नौजवान ने गुरु द्रोणाचार्य के कहा, मेरा नाम एकलव्य है। और मैं इसी जंगल में रहता हूँ। और मैं हिरण्यधनु और सुलेखा का पुत्र हूँ। मैंने ये धनुर्विद्या आपसे ही सीखी है। १० साल पहले। जब मैं आपके पास धनुर्विद्या सीखने आया था तब अपने धनुर्विद्या सीखाने से मना कर दिया था। तब आपको गुरु मानकर मैंने आपकी यहाँ पर एक मूर्ति बनाई। और फिर रोज मैं आपकी उस मूर्ति के आगे धनुर्विद्या सीखने का प्रयास करने लगा।

The Master Dronacharya was shocked to hear this. Dronacharya thought that this young man also knows Arctic archery from Arjun. If it does not stop, then the young man who lives in this forest will become a good archer even than Arjuna. Dronacharya said to Eklavya, I am your master. Will not you give me Donation? Eklavya said to Dronacharya, "You are my master. I will definitely give you whatever you want. master Dronacharya said, no, you can not give it. Eklavya then said to Dronacharya, I will definitely give you once you ask for it. Dronacharya said to Eklavya, If it is so, then I ask for your thumb of your right hand.

यह सुनकर गुरु द्रोणाचार्य हैरान रह गए गुरु द्रोणाचार्य ने सोचा ये नौजवान तो अर्जुन से भी भेतर धनुर्विद्या को जानता है। अगर इसे रोका नहीं तो ये जंगल में रहने वाला नौजवान अर्जुन से भी अच्छा धनुर्धर बन जायेगा। गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा, तेरा गुरु तो मैं ही हूँ। क्या तुम मुझे गुरु दक्षिणा नहीं दोगे। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा, आप मेरे गुरु है। आप जो भी चाहो मांगो मैं आपको जरूर दूंगा। गुरु द्रोणाचार्य ने कहा, नहीं तुम नहीं दे पाओगे। एकलव्य ने फिर गुरु द्रोणाचार्य से कहा, एक बार मांगिए तो मैं आपको जरूर दूँगा। गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से कहा, यदि ऐसा है तो मैं तुमसे तुम्हारे सीधे हाँथ का अँगूठा माँगता हूँ।

As soon as master Dronacharya asked Eklavya's right hand thumb.Arjun was surprised to hear about Dronacharya. And started thinking. What did this Master Dronacharya ask for Eklavya? Arjun felt that perhaps Eklavya would not give his thumb to Dronacharya. If he gave his thumb master Dronacharya. Then how will he run the arrow? Arjun was thinking about all this. Suddenly Eklavya got his knife and cut his right thumb and gave it to master Dronacharya. Arjun was surprised to see this.

गुरु द्रोणाचार्य ने जैसे ही, एकलव्य के सीधे हाँथ का अँगूठा माँगा। अर्जुन गुरु द्रोणाचार्य की बात सुनकर हैरान हो गया। और सोचने लगा। की गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से ये क्या मांग लिया। अर्जुन को लग रहा था की शायद एकलव्य अपना अँगूठा गुरु द्रोणाचार्य को नहीं देगा। यदि उसने अपना अँगूठा गुरु द्रोणाचार्य दे दिया। तो फिर वो तीर कैसे चलाएगा। अर्जुन ये सब सोच ही रहा था। की तभी अचानक से एकलव्य ने अपना चाकू निकला और अपने सीधे हाँथ का अँगूठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य को दे दिया। ये देखकर अर्जुन हैरान रहा गया।

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With the chopped thumb of Eklavya, master Dronacharya started going out of the forest. Then Arjun asked master Dronacharya, what did you do? You took the thumb of Eklavya. Now Eklavya will not be able to run all the arrows. Then Dronacharya said to Arjun, Eklavya is very good archer. If I did not do that. So you can not become the best archers. And I promised you I will make you the best archers in the world. Arjun said, but now whenever someone will call me the best archers. Then the sliced ​​thumb of Eklavya will laugh at me.

एकलव्य का कटा हुआ अँगूठा लेकर गुरु द्रोणाचार्य वापस जंगल से बाहर जाने लगे। तभी अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा, यह आपने क्या किया। आपने एकलव्य का अँगूठा ले लिया। अब एकलव्य सारी जिंदगी तीर नहीं चला पाएगा। फिर गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन से कहा, एकलव्य बहुत अच्छा धनुर्धर है। यदि मैं ऐसा ना करता। तो तुम सबसे अच्छे धनुर्धर नहीं बन पाते। और मैंने तुम्हे वचन दिया था। की मैंने तुम्हे दुनिया का सबसे अच्छा धनुर्धर बनाऊंगा। अर्जुन ने कहा, लेकिन अब जब भी कोई मुझे सबसे अच्छा धनुर्धर कहेगा। तो एकलव्य का कटा हुआ अँगूठा मेरे ऊपर हंसेगा।

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